आज न्यूज चैनलों के स्टूडियो वॉर रूम बन गए हैं, बोले वरिष्ठ पत्रकार राजदीप सरदेसाई

आज न्यूज चैनलों के स्टूडियो वॉर रूम बन गए हैं, बोले वरिष्ठ पत्रकार राजदीप सरदेसाई

Monday, 13 November, 2017

समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।

आज पत्रकारिता जगत के सामने सबसे बड़ी चुनौती संवादहीनता है। पहले पत्रकारों और नेताओं के बीच संवाद होता था और अब आलोचनात्मक स्टोरी करने वालों को दुश्मन समझा जाता है’ ये कहा वरिष्ठ पत्रकार राजदीप सरदेसाई ने।   

रविवार को चंडीगढ़ के प्रेस क्लब में मीडिया के समक्ष चुनौतियां विषय पर बोलते हुए वरिष्ठ पत्रकार राजदीप सरदेसाई ने कहा कि आज चैनलों के स्टूडियो वॉर रूम बन गए हैं। मीडिया भी दो धड़ों में बंटा हुआ है। चैनलों में सिर्फ सनसनीखेज खबरों और मुद्दों को तरजीह दी जा रही है। उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया ने आज हर आदमी को सिटीजन रिपोर्टर बना दिया है। इसलिए मीडिया का स्वरूप बदलता जा रहा है। अब वॉट्सऐप चैनल भी मीडिया के सामने एक चुनौती होंगे। 

अपने संबोधन में सरदेसाई ने आगे कहा कि मौजूदा समय में सिद्धांतों के साथ-साथ तकनीकी के क्षेत्र में भी मीडिया को चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है, लेकिन फिर  भी बदलते समय में पत्रकारों को नई तकनीक से दोस्ती करनी होगी। उन्होंने कहा कि सही पत्रकारिता की राह चुनने पर धमकी और मुकदमे का भय दिखाया जा रहा है। ऐसे में नए दौर की पत्रकारिता का समय आ गया है। पत्रकारों को संगठित होना होगा और अपनी समझ बढ़ानी होगी।

पत्रकारों की सुरक्षा के लिए कानून बनाए जाने की वकालत करते हुए सरदेसाई ने कहा कि पत्रकारों की सुरक्षा के लिए कठोर कानून बनाए जाने की जरूरत है। यही नहीं क्रिमिनल डेफेमेशन कानून को भी खत्म करने की जरूरत है। इस समय पत्रकारों को भी नेशनलिस्ट और एंटी नेशनलिस्ट के नजरिए से देखा जा रहा है। किसी के खिलाफ स्टोरी करने का यह तात्पर्य नहीं कि हम उसके दुश्मन है। उन्होंने पत्रकारों को जवाबदेह होने को कहा, लेकिन इसका अभिप्राय यह नहीं कि राजस्थान सरकार की तरह उन्हें दबाया जाए। सोशल मीडिया के जोर पकड़ने के कारण पत्रकारों के सामने चुनौती यह है कि वह फेक न्यूज को पहचाने। सोशल मीडिया को कंट्रोल केवल ऐसे सिस्टम से हो सकता है जोकि कंटेंट को रेगुलेट करें।

उन्होंने कहा कि पत्रकार कोई परफॉर्मर नहीं है, जोकि परफॉर्म करें। पत्रकारों का काम सिर्फ घटनाओं को देखकर उन्हें रिपोर्ट करना है न कि पार्टी बनना।

सरदेसाई ने कहा कि पत्रकारिता मुनाफे का नहीं अपितु लोकतंत्र की रक्षा का मंत्र है। पत्रकारिता मिशन है, प्रतिबद्धता है। आज पत्रकार के वेतन, बीमा, जोखिम के समय में सामाजिक सुरक्षा समय की बड़ी आवश्यकता है। ऐसे में डिजिटल युग की पत्रकारिता के लिए पारंपरिक रास्ते का मोह छोड़ना होगा। पत्रकारों को रविंद्र नाथ टैगोर की कविता पर चलना होगा- जोदि तोर डाक शुने केऊ ना आसे तोबे एकला चलो रे।

उन्होंने कहा कि अभी भी प्रिंट मीडिया का काम ठीक है क्योंकि इसमें तथ्यों पर ध्यान दिया जाता है। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में तो अब केवल विवाद किया जाता है। हमें समाज की हित की बात करनी होगी।

अंत में राजदीप सरदेसाई ने कहा कि पत्रकारों का जीवन तभी बच सकता है जब वे समाज की हित की बात करें परंतु अभी समाज मूक है। केवल दर्शक बना हुआ है समाज। पत्रकारों को सरकार के खिलाफ लिखना होगा। एक उदाहरण देकर उन्होंने कहा कि एटमी युद्ध में केवल कॉकरोच ही जीवित रहेगा। इसलिए तितली न बनें, कॉकरोच बनें।


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