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अमेरीकी राष्ट्रपति चुनाव पर सोशलमीडिया भारी

Published At: Friday, 01 January, 2016 Last Modified: Tuesday, 27 February, 2018

समाचार4मीडिया.कॉमब्यूरो 

अमेरिका मे होने वाले राष्ट्रपति चुनाव अन्तराष्ट्रीय चर्चा का विषय होते है। कमोवेश हर देश की मेन-स्ट्रीम मीडिया अपने न्यूज कार्यक्रमों में से हरएक दिन थोडा बहुत समय उनके चुनावी दंगल पर भी देती है। यदि मेन-स्ट्रीम मीडिया नें अपने ठंग से उम्मीदवारों के प्रचार में तथा आमने सामने होने वाले राजनैतिक बहसों में एक बडी भूमिका निभाई है तो सोशल मीडिया ने भी कम बडी भूमिका नहीं निभाई है।
मेनस्ट्रीम मीडिया के अपने कार्पोरेट हित होते हैं इसलिये उनके प्रचार भी उसी ठंग से होते हैं लेकिन सोशल मीडिया में अमेरीकी राष्ट्रपति के चुनाव पर जो परिचर्चाये और बहसे होती हैं वह सीधे जनता की समझ और नकार इंकार को प्रतिबिंबित करती हैं। 

 यदि कल रयूटर्स की यह खबर रही की राष्ट्रपति ओबामा को 49% समर्थन मिला है तथा मिट रोमनी को 46% मिला तो यह अवधारणा सोशलमीडिया मे हो रही बहसों तथा ओनलाईन मीडिया पोल के आधार पर बनाई गई थी। अमेरीकी संस्थाओं द्वारा किये विश्लेषणो में यह बात सामने आई है कि फेसबुक, ब्लांग, टंबलर इत्यादि का राष्ट्रपति चुनाव में उतना बडा प्रभाव नहीं पडा है जितना ट्वीटर मीडिया का है। इसकी एक वजह यह है कि ट्वीटर मशीन पर बाराक ओबामा और मिट रोमनी में कई बार रीयल टाईम बहसें ट्वीट्स के द्वारा होती देखी जाती हैं। उनके द्वारा मुद्दों पर किये गये ट्वीट्स पर तमाम सोशल मीडिया में बहसो का सिलसिला चल निकलता है जो अन्ततोगत्वा ट्वीटर पर ही प्रवाहित होता है ।

अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव पर सोशलमीडिया में हुई बहसों तथा बातचीत दौर का प्रतिशत ट्वीटर पर सबसे अधिक 77 प्रतिशत तक रहा है जबकि अन्य सोशलमीडिया प्लेटफार्म्स जैसे फेसबुक, टम्बलर, गूगल,आर्कुट तथा ब्लाग्स पर हुये संवाद का प्रतिशत अधिकतम सात प्रतिशत रहा है। सोशलमीडिया में अन्यों का वह प्रभाव नही रहा जितना गहरा प्रभाव ट्वीटर मीडिया का रहा है‍‍। इसकी एक बडी वजह है प्लेटफार्म पर रीयलटाईम टाईमलाईन का होना तथा सूचनाओं का सर्कुलेशन की गत्यात्मकता ।
सोशलमीडिया में अन्य प्लेटफार्म्स पर राष्ट्रपति चुनाव में संवाद कम हुआ अपेक्षाकृत ट्वीटर मशीन के। मेन-स्ट्रीम मीडिया की खबरों और बहसों को सर्कुलेट कर जो बहसे की गई या करवाई हुईं उनका उतना प्रभाव सोशल मीडिया पर हुई बहसो और समर्थन पर नहीं पडा है। भारत में भी सोशलमीडिया राष्ट्रीय चुनाव को अमेरीकी चुनाव की तरह ही प्रभावित करेगा। सोशल मीडिया बहसों का अपना एक अलग स्वरूप विकसित हुआ है जिसे समझने की जरूरत है।



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ये पेड आईटी सेल द्वारा पत्रकारिता को बदनाम करने की साजिश है

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