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परिचर्चा: क्या लाइब्रेरी पर हावी हो रही है सोशल मीडिया...

Saturday, 07 April, 2018

समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।

सोशल मीडिया के युग में लाइब्रेरी में बैठकर अध्ययन और पठन-पाठन की प्रवृत्ति में आई कमी है, लिहाजा इससे चिंतित होकर आराधना संस्था ने लोगों में जागरूकता के उद्देश्य से एक संगोष्ठी का आयोजन किया है। यह संगोष्ठी 7 अप्रैल को यूपी की ताजनगरी आगरा के पालीवाल पार्क स्थित जॉन्स पब्लिक लाइब्रेरी में दोपहर साढ़े तीन बजे आयोजित की जाएगी।


संगोष्ठी का संचालन डॉ ह्रदेश चौधरी  करेंगी, जो एक सामाजिक शख़्सियत हैं, वे आराधना लेखिका मंच की अध्यक्ष और घुमंतु समाज के बच्चों को शिक्षित करने के लिए कई राज स्तरीय अवार्ड पा चुकी हैं। आराधना भवन में संचालित घुमंतु पाठशाला की वो संस्थापक भी हैं।

इस कार्यक्रम के संयोजक पवन 'आगरी' ने कहा कि एक समय हुआ करता था जब पढ़ाई के लिए शोर-शराबे से दूर जाकर छात्र-छात्राएं लाइब्रेरी का रुख करते थे, लेकिन आज लाइब्रेरी

वीरान होने लगी हैं और इसकी सबसे बड़ी वजह सोशल मीडिया ही है।लाइब्रेरी पर हावी सोशी ल मीडिया’ इस संगोष्ठी का विषय है। वहीं कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ साहित्यार, विचारक डॉ. राजेंद्र मिलन द्वारा की जाएगा। मुख्य अतिथि प्रख्यात उद्यमी और समाजसेवी पूरन डाबर होंगे। मुख्य वक्ता के तौर पर इस संगोष्ठी में समाचार4मीडिया के संपादकीय प्रभारी आभिषेक मेहरोत्रा शामिल होंगे। संगोष्ठी के संचालन की जिम्मेदारी डॉ. हृदेश चौधरी की  होगी।  


राजेंद्र मिलन: एक परिचय

आगरा में 16 नवंबर 1937 में जन्मे डॉ. राजेंद्र मिलन साहित्य की दुनिया की चिर-परिचत शख्सियत है। वे समानांतर संस्था के संस्थापक है और संगीत संगम के चेयरमैन का भूमिका निभा रहे हैं। उन्हें देश के साथ-साथ विदेशों में भी कई बार सम्मान से नवाजा गया है, उन्हें लंदन, पोर्ट ब्लेयर, काठमांडू, बर्मिंघन में सम्मानित किया जा चुका है। उनके तीन उपन्यास- नागफनी और धुआं, कांच के तन-मोम के मन और वीरांगना भीमाबाई बुले प्रकाशित हो चुके हैं। उनके लंदन के वे दिन एंव काला पानी जैसे यात्रा वृतांत भी प्रकाशित हो चुके हैं। इसके अलावा उनके तीन नाट्य संग्रह, एक बालगीत संग्रह, एक कहानी संग्रह, तीन काव्य संग्रह भी प्रकाशित हो चुके हैं।  

पूरन डावर: एक परिचय
आजाद हिन्दुस्तान के बाद कई परिवारों को भारत और पाकिस्तान पलायन होने पर मजबूर होना पड़ा था। इन्हीं 
पलायन करने वाले परिवारों में से एक था स्वर्गीय चौधरी लाल चंद डावर का परिवार। पाकिस्तान से डेरा खाजीखान से भाग कर भारत आए डावर परिवार को आगरा के मलपुरा में शरण मिली। पूरन डावर इन्हीं लाल चंद डावर के द्वितीय पुत्र हैं, जिन्होंने डावर फुटवियर इंडस्ट्रीज की स्थापना की। उनके प्रॉडक्ट दुनिया के 40 से अधिक देशों में निर्यात हो रहे हैं, जो एक बड़ी उपलब्धि है।

आगरा के शाहगंज में जन्में पूरन डावर की कहानी जिंदगी की कठोर धरातल पर लिखी गई एक अविस्मरणीय कहानी भी है और कुछ कर गुजरने की तमन्ना की सच्चाई भी। पूरन डावर का जन्म 1953 में हुआ था। पाकिस्तान से भारत आने के बाद सरकार की तरफ से उनके परिवार को शाहगंज में बसाया गया और पाकिस्तान में छोड़ी गई जमीन के बदले उन्हें हरियाणा के पलवल में खेती करने को जमीन दी गई। लेकिन इन सबके बावजूद भी उनके परिवार का संघर्ष कम नहीं हुआ, लिहाजा पूनम डावर को कक्षा छह से दूध बेचने का काम करना पड़ा। 1963 में उन्हें कोयला बेचने का लाइसेंस मिला और कोयला वितरण का काम भी पूरन डावर को करना पड़ा। लेकिन इतने संघर्षों के बाद भी उन्होंने अपनी पढ़ाई बदस्तूर जारी रखी। उनकी शुरुआती पढ़ाई गवर्मेंट मॉडल स्कूल में हुई और इंटर तक की पढ़ाई जीआईसी कॉलेज, आगरा से की। फिर 1969 से लगातार 7 वर्षों तक आगरा कॉलेज के विद्यार्थी रहे और यहीं से अर्थशास्त्र में पोस्ट ग्रेजुएट करने के साथ ही कानून की पढ़ाई भी की। पूरन डावर छात्र राजनीति से भी जुड़े रहे और अखिल विद्यार्थी परिषद के केंद्रीय प्रतिनिधि सभा में भी रहे। लेकिन 1974 में पिता जी के लीवर कैंसर की वजह से निधन के बाद पूरन डावर की जिंदगी में बड़ा बदलाव आया। इस घटना के तीन साल बाद पूरन डावर और उनके बड़े भाई जवाहर डावर ने आगरा के सदर में जूते के व्यवसाय की शुरू किया।

पूरन डावर भाजपा नेता और जूता व्यवसायी राजकुमार सांमा को अपना प्रेरणाश्रोत मानते हैं। कुछ वर्षों के बाद 1983 में उन्होंने जूते के मैन्युफैक्चरिंग की शुरुआत डावर फुटवियर इंडस्ट्री के नाम से की। कठिन मेहनत के चलते वे सफलता की सीढ़ियां चढ़ने लगे और वर्ष 1987 से 1992 तक अपने उत्पाद को घरेलू से विदेशों तक पहुंचाने की कोशिश की। आज डावर फुटवियर इंडस्ट्री का पूरा उत्पाद विदेशों में निर्यात ही होता है।  

पूरन डावर समाज के कामों में भी बढ़चढ़ कर हिस्सा लेते आए हैं। 1998 में अपने बेटे सक्षम डावर के एक हादसे में हुए निधन के बाद उनके नाम पर सक्षम मेमोरियल ट्रस्ट का गठन किया, जो आज शिक्षा, स्वास्थ्य और खेलों को बढ़ावा देने के काम करता है। उनके दूसरे बेटे संभव डावर व्यापार में उनका हाथ बंटाते हैं।    हाल में यूपी के गर्वनर रामनाइक और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सम्मानित भी किया है। इससे पहले यूपी के पूर्व सीएम अखिलेश यादव ने भी उनकी उद्यमशीलता के लगातार तीन वर्षों तक सम्मानित किया था।

अभिषेक मेहरोत्रा- एक परिचय
खबरों को खोजने का पैशन रखने वाले अभिषेक मेहरोत्रा ने अपना करियर आगरा के स्वराज्य टाइम्स से मास्टर ऑफ जर्नलिज्म की पढ़ाई के दौरान शुरू किया। उसके बाद उन्होंने दिल्ली का रुख किया। दिल्ली में ही अमर उजाला, दैनिक जागरण और नवभारत टाइम्स के जरिए अपनी पत्रकारिता की पारी को आगे बढ़ाया। वे उन चुनिंदा पत्रकारों में है जो आज के युग के मीडिया यानी वेब जर्नलिज़म के अच्छे जानकार माने जाते हैं।

 
नवभारतटाइम्स ऑनलाइन के साथ वेब पत्रकारिता शुरू करने वाले अभिषेक मेहरोत्रा का जागरण डॉट कॉम को एक बड़ी ऊंचाई तक पहुंचाने में अहम योगदान रहा है। पिछले चार सालों से वे मीडिया स्ट्रीम से जुड़ी वेबसाइट समाचार4मीडिया डॉट कॉम में संपादकीय प्रभारी का दायित्व सफतलापूर्वक निर्वाह कर रहे हैं। एक दशक से भी ज्यादा समय से सक्रिय पत्रकारिता कर रहे अभिषेक मीडिया जगत और वहां के बिजनेस मॉडल पर उनकी पैनी नजर के चलते वे मीडिया विश्लेषक के तौर पर भी जाने जाते हैं।  
साथ ही व्यंग्य लिखने की उनकी रुचि के चलते अमर उजाला, आउटलुक हिंदी, चौथी दुनिया में बतौर व्यंग्यकार निरंतर प्रकाशित होते है। राज्यसभा डॉट कॉम और दैनिक जागरण के लिए वे विदेशी और समसमायिक मुद्दों पर लिखने वाले स्थापित कॉलमिनिस्ट हैं।
 आम से लेकर खास लोगों की बात सुनने और उसमें छिपे गूढ़ रहस्यों को जानने की जिज्ञासा ने जीवन में बहुत-कुछ सिखाया। बस ज़िंदगी से रूबरू होने वाले इन्हीं पलों आप 'रूबरू जिंदगी' के उसके फलसवां के जरिए उनके लेखन में पाते हैं। 


 

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पोल

क्या इंडिया टीवी के चेयरमैन रजत शर्मा का क्रिकेट की दुनिया में जाना सही है?

हां, उम्मीद है कि वे वहां भी उल्लेखनीय कार्य कर सुधार करेंगे

नहीं, जिसका काम उसी को साजे। उनका कर्मक्षेत्र मीडिया ही है

बड़े लोगों की बातें, बड़े ही जाने, हम तो सिर्फ चुप्पी साधे

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