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'गड्ढा रिपोर्टिंग' को मान्यता मिले, TRP की होगी बल्ले-बल्ले

Thursday, 19 July, 2018

पीयूष पांडे

व्यंग्यकार व वरिष्ठ पत्रकार ।।

जिस बच्चे के बारे में मालूम है कि वो दो का पहाड़ा भी कैलकुलेटर देखकर लिखता है, उसे उन्नीस सत्ते कितने? जैसे कठिन सवाल देने वाले को कोई अक्लमंद तो नहीं कह सकता। लेकिन ऐसी नादानी सुप्रीम कोर्ट ने कर दी है। सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से कहा कि वो बताए मुंबई और दिल्ली की सड़कों पर कितने गड्ढे हैं। अब सिर के बाल गिनने होते तो सरकार कोई एक समिति बना देती और अलग-अलग टाइप के 21 भत्ते देकर काम करा लेती। लेकिन गड्ढा गिनना किसी समिति के बस का नहीं। सच कहा जाए तो किसी के बस का है ही नहीं। लेकिन सुप्रीम कोर्ट चाहता है कि सरकार ऐसा करे। सरकार कर नहीं सकती तो करेगी नहीं। फिर कोर्ट कहेगा कि सरकार काम नहीं करती। कुल मिलाकर मामला घनघोर झमेलात्मक है, जिसमें काम होगा नहीं और मुश्किल में संविधान फंस जाएगा। भारतवर्ष में ऐसा ही होता है- लफड़ा कोई करे झमेले में संविधान को बेवजह खींच लिया जाता है। 

वैसे, संविधान निर्माताओं को साफ-साफ संविधान में लिखकर जाना चाहिए था कि सड़कों पर गड्ढा पाए जाने पर क्या करना है? गड्ढों को फौरन भरना है या छह-आठ महीने वैसे ही रहने देना है ताकि ठेकेदारों के घर भर सकें? यानी गड्ढो को लेकर मूलभूत सवालों का जिक्र संविधान में ही हो जाना चाहिए था। देश में संविधान की बहुत इज्जत है साहब! कथित सांप्रदायिक से कथित सेकुलर तक और सरकार से लेकर विपक्ष तक सब संविधान की दुहाई देते हैं।

लेकिन मुद्दा संविधान नहीं गड्ढा है। गड्ढा अपार संभावनाओं वाला परिक्षेत्र है, जिसे बेवजह बदनाम किया जाता है। सड़क पर गड्ढे होते हैं तो बंदा धीमी गति से गाड़ी चलाता है, वरना आजकल के छोरे खुद को सुपरमैन से कम नहीं समझते। गड्ढे होते हैं तो सड़क पर पानी भरता है। पानी भरता है तो कुछ घंटे के लिए लोग खुद को वेनिस पहुंचा हुआ मानते हैं। वरना, देश का हर शख्स कहां वेनिस जा सकता है? गड्ढों में भरे पानी से सड़कें नदियों में तब्दील होती हैं, और कुछ लोगों की अंजाने में ही सही तैराकी की प्रैक्टिस हो जाती है। 

मजेदार बात यह कि यमुना में इतना पानी नहीं रहता कि कायदे से नाव भी चल सके और दिल्ली-मुंबई की सड़कों पर बारिश में जहाज चल सकता है। गड्ढों से देश की जीडीपी बढ़ती है। गड्ढों के चलते ज्यादा पेट्रोल-डीजल खर्च होता है। गड्ढों से टायर पंक्चर होते हैं, गाड़ियों के पार्ट जल्दी खराब होते हैं। ठेकेदार गड्डे भरता है तो मजदूरों को लाता है। मजदूरों की कमाई होती है। फिर गड्ढे होते हैं तो फिर मजदूरों को उन्हें भरने के लिए लाता है। इस प्रक्रिया में देश की जीडीपी में गड्ढा अपना अमूल्य योगदान करता है।  

मैं मुद्दे से फिर भटक गया। पत्रकार हूं तो लोगों को समझाने की अजीब बीमारी है। ऐसा लगता है कि ज्ञान कल हो न हो-तो आज ही बांट दो। गड्ढों को लेकर मेरे पास खासा ज्ञान था तो मैंने सोचा बारिश के मौसम में किसी रिपोर्टर को पकड़ा जाए और उसे ज्ञान दे दिया जाए। वो मेरा ज्ञान टीवी पर दर्शकों को बांटेगा तो मेरा सीना भी उसी तरह चौड़ा होगा, जैसा आचरेकर सर का सचिन को खेलते देखते वक्त होता था।

मैं लोकेशन पर पहुंचा। एक उत्साही युवा पत्रकार इंचटेप लेकर गड्ढे की गहराई नाप रहा था।

मैंने गड्ढा पत्रकार से पूछा- ‘भाई ये क्या हो रहा है।’

‘तैयारी’- वो बोला

मैंने कहा- ‘कैसी तैयारी?’

वो बोला- ‘मैं गड्ढा रिपोर्टिंग को नयी ऊंचाइयों पर ले जाना चाहता हूं। बारिश की खबरों को बहुत हल्के में लिया जाता है। किसी भी रिपोर्टर को भेज दिया जाता है बारिश कवर करने। मैं शानदार गड्ढा रिपोर्टिंग कर गड्ढा रिपोर्टिंग को एक खास बीट के रूप में स्थापित कराना चाहता हूं।’

मैंने पूछा- ‘लेकिन क्यों।’

'इसलिए क्योंकि बारिश रिपोर्टिंग को मान्यता दिलाना मेरे जीवन का उद्देश्य है। रिपोर्टर हर साल एक ही अंदाज में, एक ही तरह से, कुछ खास जगह की बारिश में रिपोर्टिंग करते हैं। पिछले साल की रिपोर्ट इस साल दिखा दो तो भी किसी को पता नहीं चलेगा।' उसने जवाब दिया।

'फिर क्या रणीति है?' मैंने पूछा

गड्ढा रिपोर्टर तेज तर्रार था। बोला, 'इस बार एक्सक्लूसिव रिपोर्टिंग करुंगा। गड्ढे का फर्स्ट हैंड एक्सपीरियंस दर्शकों को दूंगा। खुद गड्ढे में घुस जाऊंगा। गड्ढे का आकार-प्रकार सब गर्दन तक डूबकर लोगों को ऐसे बताऊंगा कि सोफे पर बैठे बैठे उन्हें लगेगा कि वो खुद गड्ढे में घुस गए हैं। गड्ढे के भीतर जमा जीव-जंतु आपस में कैसी पॉलिटिक्स खेल रहे हैं- ये डिस्कवरी के पत्रकार की तरह बताऊंगा। मैं गड्ढों की तह तक जाकर लोगों को बताऊंगा कि किस गड्डे में कितने विरोधियों को डंप किया जा सकता है।’ 

‘लेकिन इससे आपका क्या फायदा?’ मैंने नादान सा सवाल किया।

युवा पत्रकार बेलाग था। वो जानता था कि राज सुनने के बाद भी मेरी इतनी एक्सपर्टीज नहीं कि मैं गड्ढा रिपोर्टिंग के क्षेत्र में कुछ कर सकूं। वो बोला- ‘देखिए, आज नहीं तो कल गड्ढा रिपोर्टिंग को मान्यता मिलेगी ही। जब कभी गड्ढा रिपोर्टिंग के मामले में कोई संस्था फेलोशिप देगी तो वो सबसे पहले मुझे मिलेगी। फिर हो सकता है कि सरकार जल्द गड्ढा मंत्रालय खोल दे तो उसके लिए भी मैं दावेदार बन सकता हूं।’

'और गड्ढा मंत्रालय करेगा क्या। गड्ढा भरेगा?' मैंने सहज सवाल दागा।

वो बोला- 'कैसी नादानीभरी बातें करते हैं आप। गड्ढा मंत्रालय गड्ढा भरेगा नहीं, गड्ढा करेगा। और जिस पार्टी की सरकार होगी, उसके कार्यकर्ताओं को गड्ढा भरने का ठेका दिया जाएगा। और ये ठेके बूथ लेवल तक के कार्यकर्ताओं को उठेंगे। इसी से देश का आर्थिक विकास होगा।' 

मैं समझ गया था कि गड्ढा रिपोर्टर बहुत दूर की सोचकर बैठा है। लेकिन अभी वो गड्ढे के उन आयामों से परिचय कराने को बेकरार है, जिन्हें दर्शकों ने अभी तक देखा-समझा नहीं। गड्ढा रिपोर्टर का आत्मविश्वास बता रहा था कि वो उस श्रेणी का रिपोर्टर था, जो भले गड्ढा शब्द लिख न पाएं लेकिन एक बार गड्ढे में घुस गये तो बिना टीआरपी लिए नहीं निकलते। 

व्यंग्यकार का परिचय: पीयूष पांडे उन चुनिंदा पत्रकारों में हैं, जिन्हें प्रिंट, वेब, इलेक्ट्रॉनिक और फिल्म माध्यम में काम करने का अनुभव है। सोशल मीडिया विशेषज्ञ के रुप में उनकी अलग पहचान है। पीयूष ने आजतक, सहारा, आईबीएन-7 (अब न्यूज18 इंडिया) और एबीपी जैसे बड़े न्यूज चैनलों में काम किया है। पीयूष के दो व्यंग्य संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। पहला, राजकमल से 'छिछोरेबाजी का रिजोल्यूशन' और दूसरा प्रभात प्रकाशन से 'धंधे मातरम'। फेसबुक और टि्वटर पर अपने वनलाइनर्स के लिए चर्चित पीयूष कई अखबारों में व्यंग्य लेखन करते हैं।


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