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होमी व्याराल्ला: जिनका कैमरा बना नारी शक्ति की पहचान

Published At: Friday, 08 March, 2019 Last Modified: Friday, 08 March, 2019

समाचार4मीडिया ब्यूरो।।

महिला दिवस की बात हो और होमी व्याराल्ला का जिक्र न छिड़े, यह तो संभव ही नहीं। होमी देश की पहली महिला फोटो जर्नलिस्ट थीं। उन्होंने उस दौर में कैमरा थामा, जब यह आम लोगों के लिए किसी आश्चर्य से कम नहीं था और महिलाओं के लिए इस क्षेत्र में करियर बनाने के बारे में कोई सोच भी नहीं सकता था। होमी को उनके योगदान के लिए पद्म विभूषण पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया है।

होमी के पिता की एक थिएटर कंपनी थी, जिसके चलते उन्हें बचपन में यात्रा करने के कई मौके मिले। जब होमी के पिता मुंबई आकर बस गए, तो उन्होंने बॉम्बे विश्वविद्यालय और सर जे.जे स्कूल ऑफ आर्ट में पढ़ाई की। हालांकि, फोटोग्राफी की बारीकियां उन्होंने अपने एक दोस्त से सीखीं। 1930 के दशक में होमी ने अपना फोटोग्राफी करियर शुरू किया। दूसरे विश्व युद्ध के शुरू होने पर उन्होंने बॉम्बे स्थित इलेस्ट्रेटिड वीकली ऑफ इंडिया मैगजीन के लिए काम करना शुरू कर दिया था। अपने करियर के शुरुआती सालों में उन्हें कोई नहीं जानता था। यहां तक कि उनकी तस्वीरों को उनके पति के नाम से प्रकाशित किया जाता था। उन्होंने टाइम्स ऑफ इंडिया के एक फोटोग्राफर और अकाउंटेंट से शादी की थी, लेकिन धीरे-धीरे एक पेशेवर और बेहतरीन फोटोग्राफर के रूप में उन्हें पहचान मिलने लगी।

एक स्थापित फोटो जर्नलिस्ट बनने के बाद वह 1942 में वह अपने परिवार के साथ ब्रिटिश सूचना सेवा में काम करने के लिए दिल्ली चली आईं। यहां होमी ने वियतनाम के राष्ट्रपति हो ची मिन्ह, अमेरिकी राष्ट्रपति आइजन हॉवर और जॉन एफ कैनेडी जैसे नेताओं की तस्वीरें खींची। उन्हें महारानी एलिजाबेथ द्वितीय की भारत यात्रा और दलाई लामा के तिब्बत से बच निकलने के फोटो लेने का अवसर भी मिला।

उन्होंने अपनी तस्वीरों के माध्यम से परिवर्तशील राष्ट्र के सामाजिक तथा राजनैतिक जीवन को दर्शाया। होमी ने 16 अगस्त 1947 को लाल किले पर पहली बार फहराये गये झंडे, भारत से लॉर्ड माउंटबेटन के प्रस्थान, महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू तथा लाल बहादुर शास्त्री की अंतिम यात्रा के भी छायाचित्र लिए। उनकी पहली तस्वीमर बोम्बे4 क्रोनिकल में प्रकाशित हुई थी, जिसमें उन्हें प्रत्येक छायाचित्र के लिए एक रुपया मिला था।

वर्ष 1970 में पति के निधन के बाद उन्होंने फोटोग्राफी छोड़ने का निश्चय कर लिया। जिसके बाद साल 1982 में वह अपने बेटे के साथ वडोदरा में बस गईं। वर्ष 2011 में उन्हें भारत सरकार ने पद्म विभूषण से भी सम्मानित किया। कैंसर की बीमारी के कारण 15 जनवरी 2012 में उनका देहांत हो गया और एक बेहतरीन फोटो जर्नलिस्ट हमारे बीच से चली गईं। होमी व्याराल्ला महिलाओं के लिए एक प्रेरणास्रोत हैं, जो यह बताती हैं कि यदि कोई महिला कुछ ठान ले तो कुछ भी नामुमकिन नहीं।



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