Share this Post:
Font Size   16

जानें, 'मैं हिन्दू क्यों हूं' पर शशि थरूर के बोल...

Published At: Tuesday, 04 December, 2018 Last Modified: Tuesday, 04 December, 2018

समाचार4मीडिया ब्यूरो।।

विख्यात आलोचक, स्तम्भकार और कांग्रेसी नेता डॉ. शशि थरूर की किताब 'मैं हिन्दू क्यों हूं' का लोकार्पण तीन दिसंबर को दिल्ली के ‘इंडिया इंटरनेशनल सेंटर’ (IIC) में किया गया। 'वाणी प्रकाशन' की ओर से प्रकाशित किताब के लोकार्पण के दौरान शशि थरूर ने धर्म की बहुलता और सहिष्णुता को रेखांकित किया और स्वामी विवेकानंद की दार्शनिक विचारधारा को याद किया।

उन्होंने हिन्दूवादी, हिन्दुत्व और राष्ट्रवाद के आशय को स्पष्ट करते हुए राजनीतिक हिन्दूवाद के रास्ते संविधान पर उठते हुए संकट को भी रेखांकित किया। इसके साथ ही उन्होंने अयोध्या मसले के कारण उत्पन्न हुए राजनीतिक माहौल में एकध्रुवीय बनती सोच पर भी चर्चा की।  

इस मौके पर वरिष्ठ पत्रकार राहुल देव ने हिन्दूवाद को हिन्दूइज़्म का अनुवाद उपयुक्त न मानते हुए कहा यह किताब कथ्य और संप्रेष्य के स्तर पर विचार करने को प्रेरित करती है। उन्होंने बदलते हुए परिदृश्य में साम्प्रदायिकता के परिणामों पर सचेत किया ओैर किताब को महत्त्वपूर्ण माना।

इस दौरान वरिष्ठ नेता देवी प्रसाद त्रिपाठी ने कहा कि हिन्दू धर्म की मूल भावना बहुलता, सहिष्णुता व सरकार है। उन्होंने कहा कि दूसरों का उपकार ही धर्म है और दूसरों का अपकार पाप है। इसके अलावा उन्होंने धर्म में नवीन धारणाओं और आस्थाओं को भी महत्त्वपूर्ण मानते हुए धर्म को सतत गतिशील कहा।

प्रोफेसर अभय कुमार दुबे की राय में हिन्दुत्ववादियों का मूल मक़सद एक नस्लीय और जातिवादी राजनैतिक कम्युनिटी बनाना है। सावरकर के राजनीतिक उद्देश्यों को तार्किक रूप से सामने रखते हुए उन्होंने बताया कि उनका उद्देश्य बहुलतावादी भारतीय दृष्टि के विपरीत है और वे हिन्दू राष्ट्रवाद के समर्थक हैं। लोकतान्त्रिक सरकारों में उपस्थित बहुसंख्यक आवेश की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि इसमें वोट के लिए तुष्टिकरण सभी सरकारों की नीति रही है। जो खासतौर पर मुस्लिम वोट पाने के लिए अपनायी गयी। अभय कुमार दुबे ने बहुसंख्यकवाद के सौम्य ख़तरों के प्रति आगाह किया।

तसलीमा नसरीन ने मुस्लिम समाज और राजनीति में कट्टरता को पाकिस्तान और बांग्लादेश के सन्दर्भ में उजागर करते हुए मुस्लिम स्त्रियों के अधिकारों के अपवंचन का मुद्दा उठाया। अभिव्यक्ति के बन्धनों के सन्दर्भ में भी उन्होंने सवाल उठाये और अपने निर्वासन को याद करते हुए भारत के उदात्त स्वरूप, धर्म के बौद्धिक लचीलेपन को भी रेखांकित करते हुए शशि थरूर की किताब को महत्त्वपूर्ण निरूपित किया।

लोकार्पण में अरुण माहेश्वरी प्रबन्ध निदेशक वाणी प्रकाशन, लीलाधर मंडलोई, मुख्य कार्यकारी अधिकारी, लेखक व आलोचक तथा अदिति माहेश्वरी-गोयल कार्यकारी निदेशक वाणी प्रकाशन, के साथ दामिनी माहेश्वरी कार्यकारी निदेशक भी उपस्थित थे।



पोल

मीडिया में सर्टिफिकेशन अथॉरिटी को लेकर क्या है आपका मानना?

इस कदम के बाद गुणवत्ता में निश्चित रूप से सुधार आएगा

मीडिया अलग तरह का प्रोफेशन है, इसकी जरूरत नहीं है

Copyright © 2018 samachar4media.com