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दक्ष भारद्वाज ने समझाया ब्रह्मचर्य का सही अर्थ

Published At: Tuesday, 27 November, 2018 Last Modified: Tuesday, 27 November, 2018

दक्ष भारद्वाज ।।

ब्रह्मचारी शब्द का अर्थ जो निर्मित समझा जाता है वो व्यक्ति जिसका विवाह नहीं हुआ हो। वेद की भाषा के अनुसार ये अर्थ सीमित नहीं हो सकता। केवल सामाजिक विषय में इसका प्रयोग करना सही है।

इस शब्द के अर्थ ब्राह्मण cosmos के विषय में भी उपयोग होते हैं। अथर्ववेद 11-5 का एक पूरा सूक्त ब्रह्मचारी में हैं। उसके अनुसार इस शब्द के कई अर्थ निकलते हैं। उदाहरण के तौर पर 5 मंत्र में-

पूर्वो जातो ब्रह्म्णों ब्रह्म्चारी (अथर्ववेद 11-5)

ब्रह्मचारी शब्द के दो भाग होते हैं। ब्राह्मण का मूलरूप।

जिसका अर्थ है कि जिसकी वृद्धि हो और पूर्ण या अधिक वृद्धि हो (पाणनि) इस अर्थ का इस प्रकार से वर्णन करते हैं। बृ उणादिकोसा 4/147 बृंहति वर्धते तद् ब्रह्म, ईश्वरो वेदस्तत्व तपो वा।

चर का अरथ धातुपाठ             चर गत्यर्था : चरति भक्षणेsपि।

अर्थात गति में।

इन दोनों शब्दों के अनुसार इसका अर्थ इस प्रकार से बनता है कि ब्रह्मचारी जिसके द्वारा किसी चीज की गति से गति या गति के द्वारा पूर्ण वृद्धि या महावृद्धि पहुंचे, सम्पूर्ण वृद्धि पहुंचे। (बृह+चर)

इसका अभिप्राय ये भी है कि किसी भी कारण या किसी के द्वारा वृद्धि हो किसी भी क्षेत्र में हो, वह मनुष्य या योजना जिसके कारण वृद्धि हो वह व्यक्ति। योजना ब्रह्मचारी कहलाता है।

ये मंत्र अगर प्रसामान्य संस्कृति में देखें तो उसका अर्थ ये निकलता है कि cosmos ब्राह्म्ण के जन्म से पहले ब्रह्मचारी का जन्म हुआ (ये अर्थ मंत्र का किसी प्रकार भी भाता नहीं)।

जो हमारे ध्यान में इस मंत्र का अर्थ है यह है-

अर्थ सबसे पूर्ण ब्राह्मण cosmos को बनाने के लिए वृद्धि का सबसे पहले एक नियोजन हुआ और जिसमें गति का होना बहुत आवश्यक था, उसके उपरान्त ब्राह्मण का जन्म हुआ।

 



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