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इन तीन ‘C’ से जुड़ी हुई है टीवी एंकरिंग: सुशांत सिन्हा

Published At: Tuesday, 05 March, 2019 Last Modified: Wednesday, 06 March, 2019

समाचार4मीडिया ब्यूरो।।

बहुप्रतिष्ठित ‘एक्‍सचेंज4मीडिया न्‍यूज ब्रॉडकास्टिंग अवॉर्ड्स’ (enba) 16 फरवरी को दिए गए। इनबा के 11वां एडिशन के तहत नोएडा के होटल रेडिसन ब्लू में एक समारोह में ये अवॉर्ड्स दिए गए। कार्यक्रम से पहले आयोजित NewsNextConference के अंतगर्त कई पैनल डिस्कशन भी हुए, जिसके द्वारा लोगों को मीडिया के दिग्गजों के विचारों को सुनने का मौका भी मिला।

कार्यक्रम में ऐसे ही एक पैनल डिस्कशन का टॉपिक ‘Anchoring is it an art or a science or is it just energy’ रखा गया था। इसमें ‘इंडिया न्यूज़’ के डिप्टी एडिटर सुशांत सिन्हा,‘न्यूज एक्स’ की सीनियर एग्जिक्यूटिव एडिटर प्रिया सहगल,‘न्यूज24’ की सीनियर एंकर साक्षी जोशी, ‘आजतक’ के एडिटर निशांत चतुर्वेदी ने शामिल होकर अपने व्यूज लोगों के सामने रखे। ‘एक्सचेंज4मीडिया’ (exchange4media) में एडिटोरियल लीड के तौर पर कार्यरत रुहैल अमीन ने बतौर सेशन चेयर इस सेशन को मॉडरेट किया।

पैनल डिस्कशन के दौरान रुहैल अमीन द्वारा यह पूछे जाने पर कि टीवी एंकरिंग कोई आर्ट है, साइंस है अथवा यह सिर्फ एनर्जी है? ‘इंडिया न्यूज़’ के डिप्टी एडिटर सुशांत सिन्हा ने कहा, ‘इस विषय पर लोगों की अलग-अलग राय हो सकती है। मौजूदा दौर की बात करें तो मेरे ख्याल से यह साइंस इस लिहाज से है कि एंकर कितने डेसिबल पर चिल्लाएगा। आर्ट इस लिहाज से है कि आजकल आप डिबेट को अंत में कहां ले जाना चाहते हैं। यह एंकर के ऊपर निर्भर करता है और वो पूरी बातचीत को घुमाते-घुमाते उसी दिशा में ले जाता है, जिसे वो पसंद करता है। इसलिए यह एक आर्ट भी है और यह दोनों काम करने में आपकी एनर्जी भी लगती है, इसलिए हम कह सकते हैं कि ये तीनों चीजें आजकल की एंकरिंग में हैं। लेकिन मोटे तौर पर यदि मुझसे पूछा जाए तो मेरे हिसाब से टीवी एंकरिंग तीन ‘सी’ (C) से जुड़ी हुई है।’

उन्होंने कहा, ‘पहले ‘सी’ की बात करें तो इसका मतलब कंटेंट से है और एंकर के पास कंटेट होना चाहिए, क्योंकि दर्शक जब एंकर को देखता है और एंकर के पास कंटेंट नहीं है, वह सिर्फ चिल्ला रहा है तो दर्शक पता नहीं कैसे रिएक्ट करेगा, और यदि कंटेंट नहीं है तो वह बार-बार लौटकर उस एंकर के पास नहीं आ सकता। दूसरे ‘सी’ को हम करेज (Courage) या निर्भीकता से जोड़ते हैं। यदि एंकर सवाल पूछते समय निर्भीक नहीं है तो भी दिक्कत होती है, इसलिए वह भी होना बहुत जरूरी है और एंकरिंग में तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण ‘सी’ मुझे कनेक्ट यानी संवाद लगता है। दर्शक और एंकर के बीच टेलिविजन होता है, बेशक वो डायरेक्टली एक-दूसरे से नहीं जुड़ रहे हैं, लेकिन हमारा संवाद कनेक्ट स्थापित नहीं कर पा रहा है, तो फिर कोई फायदा नहीं है। दर्शक एक टीवी एंकर के माध्यम से वह दुनिया देख रहा होता है, जो उसने नहीं देखी है। इसलिए न्यूज एंकरिंग में इन तीन ‘सी’ का होना बहुत जरूरी है।

क्या एंकर पर टीआरपी का प्रेशर होता है, के जवाब में सुशांत कहते हैं कि चूंकि चैनल पर परफॉर्मेंस का दबाव होता है, ऐसे में यह एंकर्स पर भी होता ही है। इसलिए, दोनों को अलग करके नहीं देखा जा सकता है। बीच में एक दौर ऐसा भी था कि जब एडिटर बुलाकर आपको बोलते थे कि यार तुम बहुत ठंडी डिबेट कर रहे हो, उस एंकर को देखो कि वो कैसे चिल्लाता है। तुम्हारी एंकरिंग में वो मजा नहीं आ रहा है।’

सुशांत सिन्हा के अनुसार, ‘अब हम मजा देने के लिए तो बैठे नहीं हैं, मजे के लिए अलग चैनल है, जबकि हम वहां बैठे हैं कि जहां हमें सवाल पूछने हैं और दर्शक हमसे तभी कनेक्ट होगा कि जब उसे लगेगा कि एंकर वही सवाल पूछ रहा है, जो वह पूछना चाहता है। ये सवाल धीरे से भी पूछे जा सकते हैं, इनके लिए बेवजह चिल्लाने की जरूरत नहीं होती है। ये अपनी एक सोच हो सकती है। हमें परफॉर्मेंस के साथ-साथ इस बात का निर्णय भी लेना होता है कि हमें क्या करना है, घुटने टेकने हैं अथवा बता देना है कि मैं इतना नहीं चिल्ला सकता हूं। मेरे सवाल तीखे होने चाहिए, मेरी आवाज तीखी नहीं होनी चाहिए। यह एक चैलेंज रहता है कि एंकर अपने एडिटर को और अपने चैनल को कैसे समझाएगा। ऐसे में परफॉर्मेंस के साथ ये प्रेशर ज्यादा होता है, जो मुझे लगता है कि यह धीरे-धीरे कम होगा अथवा इसमें बदलाव आएगा। पहले बहुत जोशीले एंकर्स का दौर था, मुझे लगता है कि वह धीरे-धीरे कम हो जाएगा और फिर कहीं यह बीच के स्तर पर आ जाएगा। मुझे लगता है कि हम वापस पुराने दौर में लौटेंगे और थोड़ सैटल होंगे। चीजीं बेहतर होंगी और हां, आने वाले समय में सोशल मीडिया का प्रभाव बढ़ेगा।’

नीचे दिए गए विडियो पर क्लिक कर आप इस पूरी चर्चा को देख सकते हैं-



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