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'पत्रिका' के AMD सिद्धार्थ कोठारी ने बताई ग्रुप की प्राथमिकताएं

Published At: Saturday, 13 October, 2018 Last Modified: Saturday, 13 October, 2018

निशांत सक्‍सेना ।।

'पत्रिका' ग्रुप के एएमडी सिद्धार्थ कोठारी, डिप्‍टी एडिटर भुवनेश जैन और नेशनल हेड (मार्केटिंग) सौरभ भंडारी ने ग्रुप के विजन, इसकी फ्यूचर प्‍लानिंग और अन्‍य कई महत्‍वपूर्ण बातों पर कुछ महीने पहले हमारे साथ विस्‍तार से बातचीत की। प्रस्‍तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:

सबसे पहले हमें पत्रिका के विजन और इसके दृष्टिकोण के बारे में कुछ बताएं?

सिद्धार्थ कोठारी : 'राजस्‍थान पत्रिका' की शुरुआत मेरे दादाजी कर्पूर चंद्र कुलीश द्वारा की गई थी। दरअसल, वह ऐसे संस्‍थान का निर्माण करना चाहते थे जो जुनून के साथ पत्रकारिता करे व समाज के हितों की रक्षा के लिए हमेशा तैयार और जागरूक रहे। हमने भी अपने दादाजी के सिद्धांतों को अपना रखा है। पत्रिका ग्रुप की कोई भी शाखा हो, जैसे-प्रिंट या डिजिटल, हम उन्‍हीं के बताए रास्‍तों पर चलते हैं और हमने यहां भी यही कल्‍चर लागू किया हुआ है। पत्रिका ग्रुप हमेशा अपने पाठकों के हितों को प्राथमिकता देता है।   

अपने लंबे इतिहास के बावजूद पत्रिका तेजी से आगे बढ़ता हुआ समाचार पत्र ग्रुप है। यह नई-नई टेक्‍नोलॉजी और इनोवेशन को सबसे पहले अपनाने वालों में शामिल रहा है। हम देश के चुनिंदा ऐसे मीडिया हाउसों में शामिल हैं, जिन्‍होंने 360 डिग्री इंटीग्रेटिड न्‍यूजरूम को अपनाया है। हमने सैटेलाइट टीवी चैनल लॉन्‍च किया है, जो पूरी तरह मोबाइल जर्नलिज्‍म (MOJO) पर आधारित है।

क्‍या आपको लगता है कि एक समाचार पत्र समूह वास्तव में एक सार्थक तरीके से व्‍यवस्‍था पर एक अंतर या प्रभाव डाल सकता है?

भुवनेश जैन : नॉमिनेशंस की बात करें तो 'चेंज मेकर्स' और 'वॉलंटियर्स' दोनों रूप में हमें मात्र दो हफ्ते में जबरदस्‍त प्रतिक्रिया मिली। यह इस बात का स्‍पष्‍ट संकेत है कि हमने सही नस पर हाथ रखा है। लोग क्षेत्र में बदलाव लाने और स्‍थानीय विकास को लेकर किए गए वादों की सच्‍चाई जानने का इंतजार कर रहे हैं। हमने उन्‍हें इसके लिए एक मंच प्रदान किया है, जहां पर आकर वे अपनी बात रख सकते हैं। हमने यह भी देखा है कि लोग जरूरत पड़ने पर सही कदम उठाने को लेकर मीडिया की ओर कैसे देखते हैं। हमारे दिमाग में सिर्फ लोगों की समस्‍याएं और उनका एजेंडा रहता है। हमारा काम लोगों को जागरूक करना भी है और इससे उनके दिमाग में लंबे समय तक प्रभाव बने रहने की उम्‍मीद भी रहती है।  

इस समय अपने देश में पत्रकारिता की जो स्थिति है, उसके बारे में आप क्‍या सोचते हैं। ऐसे में 'राजस्‍थान पत्रिका' कैसी भूमिका में है ?

भुवनेश जैन : मुझे यह कहने में काफी दिक्‍कत हो रही है कि स्थिति ज्‍यादा उत्‍साहजनक नहीं है। सिर्फ कुछ लोग ही पत्रकारिता के सही मूल्‍यों का पालन कर रहे हैं। पत्रकारिता निर्भीक होनी चाहिए, लेकिन जब इसी निर्भीक पत्रकारिता के रास्‍ते में बिजनेस हित आड़े आ जाते हैं तो दुर्भाग्‍य से यह काफी प्रभावित होती है। सरकारें भी कई बार अपनी आलोचना को बर्दाश्‍त नहीं कर पाती हैं और अक्‍सर वे दबाव डालने लगती हैं। पत्रिका ऐसा मीडिया हाउस है, जो हमेशा लोकतंत्र और जनता के हितों के पक्ष में खड़ा रहता है।

पिछले साल नवंबर में 'राजस्‍थान पत्रिका' ने निर्णय लिया था कि अखबार राज्य सरकार के बारे में नहीं लिखेगा। आखिर इसकी जरूरत क्‍यों पड़ी, इसके बारे में विस्‍तार से बताएं?

भुवनेश जैन : राजस्‍थान सरकार ने कुछ समय पूर्व क्रिमिनल लॉ (राजस्थान अमेंडमेंट) ऑर्डिनेंस 2017 प्रस्‍तावित किया था। यदि यह बिल कानून बन जाता तो राज्य के किसी जज, मजिस्ट्रेट और सरकारी कर्मचारी के खिलाफ उनसे जुड़े किसी मामले में जांच से पहले संबंधित अधिकारियों से इजाजत लेना जरूरी होता। इसके अलावा कोई भी चैनल, अखबार या वेबसाइट अधिकारियों के खिलाफ आरोपों पर खबर पब्लिश नहीं कर सकता था, जब तक कि उस विभाग के आला अफसरों से इसकी मंजूरी नहीं मिल जाती। इसके विरोध में 'राजस्‍थान पत्रिका' के चीफ एडिटर गुलाब कोठारी ने पहले पेज पर एडिटोरियल प्रकाशित कर साफ कर दिया कि सरकार जब तक ये बिल वापस नहीं ले लेती है, तब तक पत्रिका राज्‍य सरकार की कोई न्‍यूज नहीं छापेगी। इसके बाद अखबार ने 'जब तक काला, तब तक ताला' की घोषणा रोजाना प्रकाशित करनी शुरू कर दी थी। हालांकि, राजस्‍थान पत्रिका ने सरकारी नोटिस, न्‍यूज और जरूरी सूचनाएं प्रकाशित करना जारी रखा था ताकि पाठकों को इस तरह की सूचनाओं से वंचित न होना पड़े। आखिर में यह लोकतंत्र की ही जीत थी कि प्रदेश सरकार को अपना वह प्रस्‍ताव वापस लेना पड़ा।

यहां मैं आपको यह जरूर बताना चाहूंगा कि राजस्‍थान पत्रिका के किसी भी सरकार से न तो बहुत ज्‍यादा अच्‍छे संबंध हैं और न ही बहुत ज्‍यादा खराब। अखबार तो सिर्फ लोकतंत्र के चौथे स्‍तंभ के रूप में पत्रकारिता के सिद्धांतों का पालन करते हुए अपना काम कर रहा है। पत्रिका की रिपोर्टिंग हमेशा निष्‍पक्ष और शीशे की तरह साफ रही है। पत्रिका के साथ इस तरह के मामले वैसे कभी-कभार ही होते हैं, जब छत्‍तीसगढ़ में हमारे पत्रकारों को विधानसभा कवर करने से रोका गया था। पत्रिका के कार्यालयों पर हमला किया गया और कागजात जलाए गए, लेकिन लोकतंत्र के हितों के लिए हमारी प्रतिबद्धता और निष्‍पक्षता के सामने यह चीजें ज्‍यादा मायने नहीं रखती हैं। 

सौरभ भंडारी : कई बार सरकारी विज्ञापनों के मामले में पत्रिका को तमाम तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ा और बहुत प्रतिबंध लगे लेकिन इससे पत्रिका की संपादकीय नीतियों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा है। अदालत के दखल के बाद हमें दोबारा से सरकारी विज्ञापन मिलने शुरू हुए हैं। हमने हमेशा अपनी संपत्तियों और मार्केट में विस्‍तार ही किया है, उसे कभी भी घटाया नहीं है। इसलिए हमारे विज्ञापनदाताओं का हमारे ऊपर दृढ़ विश्‍वास है।

पत्रिका को हमेशा अपनी फायरब्रैंड यानी तेजतर्रार पत्रकारिता के लिए जाना जाता है। क्‍या आप हाल ही की कोई स्‍टोरी अथवा कैंपेन के बारे में कुछ बताना चाहेंगे?

सौरभ भंडारी : आपकी बात सही है। अपने 62 साल के सफर में पत्रिका समूह ने हमेशा निर्भीक और निष्‍पक्ष पत्रकारिता में विश्‍वास रखा है। हमने हमेशा लोगों को जागरूक करने का काम किया है, ताकि वे आगे बढ़ सकें। 'क्‍लीन पॉलिटिक्‍स' एजेंडा के तहत चार अप्रैल 2018 को हमने 'चेंजमेकर्स' (Changemakers) नाम से बहुत बड़ा अभियान शुरू किया है, ताकि ज्‍यादा से ज्‍यादा लोग इसमें अपनी भागीदारी निभा सकें। इस कैंपेन में तीन राज्‍यों राजस्‍थान, मध्‍य प्रदेश और छत्‍तीसगढ़ पर फोकस किया गया है, जहां पर साल के आखिर में विधानसभा चुनाव होने हैं। इस कैंपेन का उद्देश्‍य राजनीति में साफ सुथरे लोगों को लेकर आना है और इस कैंपेन पर लोगों ने तुरंत प्रतिक्रिया भी दी है। 

पिछली बार शुरू किया गया इस तरह का एडिटोरियल कैंपेन कितना सफल रहा था ?

भुवनेश जैन : जिन लोगों को हमारी पृष्‍ठभूमि के बारे में पता है, वे अच्‍छी तरह जानते हैं कि पॉलिटिकल सिस्‍टम को सही करने के मुद्दों को हम किस तरह प्रभावी तरीके से उठाते हैं। जागो जनमत के तहत हम विभिन्‍न मामलों को जनता के सामने ले जाते हैं। पिछले चुनावों में इस अभियान के लिए हमें चुनाव आयोग की तरफ से प्रतिष्ठित 'नेशनल मीडिया अवॉर्ड' से सम्‍मानित किया गया था। वर्ष 2013 में चुनाव के बाद राष्‍ट्रपति ने हमें यह अवॉर्ड दिया था।   

तीन राज्‍यों (राजस्‍थान, मध्‍य प्रदेश और छत्‍तीसगढ़) के चुनावों को ध्‍यान में रखते हुए इस साल हमने डिजिटल पर केंद्रित एक अभियान शुरू किया। इस अभियान का उद्देश्‍य चुनावों के प्रति लोगों को जागरूक करना है, ताकि सही लोग राजनीति में आ सकें।

अपने एडिटोरियल कैंपेन 'चेंजमेकर' के द्वारा आप क्‍या हासिल करना चाहते हैं। इसके पीछे आपकी क्‍या योजना है ?

भुवनेश जैन : सीधी सी बात है कि हम इस कैंपेन के द्वारा लोगों को जागरूक करना चाहते हैं, उनहें जिम्‍मेदारी का अहसास दिलाना चाहते हैं और उनके क्षेत्र के प्रमुख मुद्दों को सामने लाना चाहते हैं। हम समर्पित लोगों की ऐसी टीम भी बनाना चाहते हैं जो अपने क्षेत्र के मुद्दों को उठा सकें और अपने क्षेत्र में हो रही तमाम तरह की गतिविधियों पर नजर रख सकें। इस कैंपेन का उद्देश्‍य ऐसे लोगों का सामने लेकर आना है, जो सामाजिक बदलाव के लिए बड़ी जिम्‍मेदारी उठाने के लिए तैयार हैं।

आखिर आप वास्तव में किस तरह कार्य कर रहे हैं। इस अभियान के बारे में और विस्‍तार से बताएं ?

यह कैंपेन डिजिटल रूप से चल रहा है। इससे जुड़ने के लिए किसी भी व्‍यक्ति को 'www.patrika.com', 'changemakers.patrika.com'  और 'patrika app' पर लॉगइन करना होगा। इस कैंपेन में तीन राज्‍यों (राजस्‍थान, मध्‍यप्रदेश और छत्‍तीसढ़) के 520 वि‍धानसभा क्षेत्रों को शामिल किया गया है। लोगों से अपील की गई है कि यदि वे यह महसूस करते हैं कि राजनीति को साफ-सुथरा होना चाहिए और इसमें जिम्‍मेदार लोग आने चाहिए और यदि उन्‍हें लगता है कि वे ऐसे लोगों में से एक हैं तो उन्‍हें अपने विधानसभा क्षेत्र का प्रतिनिधि बनने के लिए खुद को चेंजमेकर्स के रूप में नॉमिनेट करना चाहिए।

जिन लोगों को लगता है कि वे उम्‍मीदवार के रूप में नहीं बल्कि वॉलंटियर्स के रूप में इसका हिस्‍सा बन सकते हैं तो ऐसे लोगों के लिए भी हमने कई कैटेगरी बनाई हैं। एक बार नॉमिनेशन होने के बाद, क्रॉस वेरिफिकेशन की प्रक्रिया होती है। इसमें आवेदक के दावों की जांच की जाती है। आवेदनों को वेरिफाई करने के लिए प्रत्‍येक विधानसभा क्षेत्र के लिए जूरी है, जिसमें समाज के विभिन्‍न वर्गों के लोगों को शामिल किया गया है। यहां सभी लोगों के लिए समान अवसर हैं और कोई भी व्‍यक्ति इनका हिस्‍सा बन सकता है। ऐसे चेंजमेकर्स अर्थात वॉलंटियर्स सिर्फ विधानसभा क्षेत्र के लिए काम करते हैं। इससे हमें भी स्‍थानीय स्‍तर पर पहुंच बढ़ाने में आसानी होती है। यह बहुत छोटा सा प्रयास है जिसके द्वारा लोगों में राजनीतिक रूप से भी जागरूकता लाई जा सकती है।      

क्‍या यह मल्‍टीमीडिया एडिटोरियल ड्राइव बनने जा रहा है?

भुवनेश जैन : निश्चित रूप से। हम कनवर्जेंस का सही इस्‍तेमाल कर रहे हैं। न्‍यूज, क्रिएटिव मास्‍टहेड, इंफो ग्राफिक्‍स व क्रिएटिव मैसेजिंग के द्वारा लोगों को सूचनाएं देने के लिए हम अखबार का इस्‍तेमाल कर रहे हैं। चेंजमेकर्स और वॉलंटियर्स के रूप में क्षेत्रवार विधानसभा के नॉमिनेशंस के लिए हम लोगों को डिजिटल रूप से अपने साथ जोड़ रहे हैं। टीवी कवरेज के लिए हम लोगों के बीच जाकर उनके साथ बैठक कर रहे हैं। इसके अलावा रेडियो, सोशल मीडिया प्‍लेटफॉर्म और मोबाइल टेक्‍नोलॉजी के द्वारा हम लोगों को जागरूक कर रहे हैं। उदाहरण के लिए- हमने अक्षय तृतीया पर, जिस दिन तमाम मांगलिक कार्य किए जाते हैं, लोगों को स्‍वच्‍छ राजनीति के लिए काफी प्रेरित किया और उन्‍होंने इसकी शपथ भी ली। हमारी इस मुहिम में 38 हजार से ज्‍यादा लोग शामिल हुए।

इस प्रकार हम प्रत्‍येक मीडिया प्‍लेटफार्म का हरसंभव इस्‍तेमाल कर रहे हैं। अब तक चेंजमेकर्स और वॉलंटियर्स के रूप में 16 हजार से ज्‍यादा लोग हमसे जुड़ चुके हैं और रोजाना यह संख्‍या बढ़ती जा रही है।

'राजस्‍थान पत्रिका' के लिए आपने क्‍या फ्यूचर प्‍लानिंग की है?

सौरभ भंडारी : पत्रिका ग्रुप के अखबार को सभी लोग जानते हैं और इंडस्‍ट्री में भी इसका काफी नाम है। पत्रिका की मल्‍टीमीडिया ग्रोथ भी काफी तेजी से हो रही है। रेडियो की बात करें तो जम्‍मू- कश्‍मीर से बिहार तक हमने चार रेडियो स्‍टेशन से बढ़ाकर इनकी संख्‍या 18 की है। डिजिटल रूप में भी हमने पूरे देश में अपना खासा स्‍थान बनाया है। 'Comscore online' के अनुसार, डिजिटल में हमारे 25 मिलियन से ज्‍यादा यूनिक व्‍युअर्स हैं। वहीं, 'Crowdtangle' के अनुसार, हमारे पास 2,78,12,297 यूनिक विजिटर्स और  286  मिलियन विडियो व्‍यूज हैं। पत्रिका टीवी बहुत ही अच्‍छी टेक्‍नोलॉजी का इस्‍तेमाल करती है और हम मोबाइल जर्नलिज्‍म (MOJO) का सहारा भी लेते हैं। अपनी विविधता और खास रणनीति की बदौलत हमने आशाजनक ग्रोथ की है।'



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