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सुधीर चौधरी: आपके मन में है जो सवाल, उनकी जुबान से सुनिए जवाब...

Published At: Thursday, 20 September, 2018 Last Modified: Monday, 24 September, 2018

Zee मीडिया देश का सबसे पुराना टीवी घराना है। फिलहाल इसकी कमान चर्चित पत्रकार सुधीर चौधरी के पास है। जी न्यूज, WION और DNA के एडिटर-इन-चीफ के तौर पर सुधीर चौधरी लगातार आगे बढ़ रहे हैं।

जी न्यूज के नंबर 1 चैनल बनने के बाद अब सुधीर किन नई चुनौतियों का सामना कर रहे हैं, जिंदल समूह के साथ 6साल तक चले विवाद का पटाक्षेप और उन पर सरकार के पक्षधर होने के आरोपों पर समाचार4मीडिया डॉट कॉम के संपादकीय प्रभारी अभिषेक मेहरोत्रा के साथ बेहद खुलकर बातचीत की।

सुधीर चौधरी ने हर उस सवाल का जवाब दिया, जो लोग उनसे मुख से सुनना चाहते थे। कुछ चुभने वाले सवालों पर भी उन्होंने 'नो कॉमेंट्स' का सहारा न लेते हुए अपने 'मन की बात' कही... पेश है उस बातचीत के प्रमुख अंश...

वो 3 बातें जिस कारण ZEE न्यूज बना नंबर-1 :

मैं सबसे ऊपर ईमानदारी को रखूगां, क्योंकि हम जो भी कॉन्टेंट दिखाते हैं या फिर जो भी रिपोर्ट लोगों के सामने पेश करते हैं, उसकी रिपोर्टिंग होती हैं, उसमें एक ईमानदारी का भाव होता है। मैं अपना शो भी ईमानदारी के साथ करता हूं। जब आप बाहर जाकर लोगों से मिलेंगे, तो मीडिया कीविश्वसनीयता की दिक्कत सबसे ज्यादा है। अब देश में जब लोगों के साथ बात करेंगे तो लोग कहते हैं कि मीडिया की रिपोर्ट पर भी अब विश्वास नहीं होता है। इसलिए मुझे लगता है कि ईमानदारी और विश्वसनीयता को आप जोड़कर चल सकते हैं क्योंकि सबसे बड़ा गैप यही है, जिसे हमने भरने की कोशिश की है।

दूसरा- विषयों का चयन। मीडिया के हीरोज अलग होते हैं और आम जनता के अलग। जब जनता के पास आप जाएंगे तो जनता कहती है कि आप जिस व्यक्ति को अपना हीरो बनाकर मेरे सामने लाए हैं, यानी जिसकी आप लगातार कवरेज कर रहे हैं, मुझे तो वो हीरो जैसा नहीं लगता और जो मुझे हीरो लगता है उसकी मीडिया तक पहुंच नहीं है। इसलिए मीडिया और दर्शकों के बीच दूरियां काफी बढ़ गई है। इसलिए हमने इसे भरने की कोशिश की और दर्शकों की रुचि और उनकी पसंद के हिसाब से अपना कॉन्टेंट बनाया।

तीसरी बात ये की एक चैनल के रूप में आपको बहुत वाइब्रेंट होना है और बहुत ही बेहतर और आसान तरीके से लोगों तक अपनी बात रखनी है, जिसमें प्रजेंटेशन एक हिस्सा है, एफपीसी आपकी कैसी होगी वो इसका हिस्सा है, आपका स्टूडियो कैसा होगा, चैनल का लुक कैसा होगा, आपके चैनल में कितनी तेजी है, आपके पूरे सिस्टम की कितनी पुरानी मशीनरी है और नई चीजों के लिए कितनी तेजी से वह रिएक्ट करती है। इन सब चीजों पर हमने ध्यान दिया। लेकिन फिर भी यहां कहना चाहूंगा कि टेक्नोलॉजी की तो सभी चैनलों के पास एक जैसी ही है, वही ओबी वैन है, वही ग्राफिक्स मशीनें है, वही लाल रंग का पट्टी है और वही लाल रंग का ब्रेकिंग न्यूज। लेकिन कॉन्टेंट क्या है और उस मशीन के पीछे काम करने वाला व्यक्ति कौन है और उसकी सोच क्या है ये उस पर निर्धर करता है। इसलिए मैं यह नहीं कह सकता कि सिर्फ तीन ही वजह रही होंगी, क्योंकि कॉम्प्रिहेन्सिवली हमने उस पर काम किया। और सबसे बड़ी बात ये की आपी इच्छा कितनी तीव्र है। आप वाकई करना चाहते हो या फिर सिर्फ करना चाहते हो, लेकिन वो चीज आपको परेशान नहीं कर रही है, तो नंबर-1 न होना मुझे बहुत परेशान करता था। मुझे नींद नहीं आती थी, इसे लेकर और मैं चाहता था कि मैं इसे प्रूफ करूं और लोगों को बताऊं कि कोई बड़े बदलाव किए बिना ये टीम कर सकती है।     

मीडिया का हुआ ध्रुवीकरण, बंटी दो टीमें:

दुर्भाग्य से पीछे चार-पांच सालों में मीडिया का ध्रुवीकरण हो गया है और इसमें दो टीमें बंट गईं हैं। उस टीम को बांटने का जो तरीका है वो एक विचारधारा और एक पार्टी लाइंस पर। दुर्भाग्यवश, हमारे साथ जो हुआ है, हमारे जो भी चैनल्स हैं, चाहे जी न्यूज हो वो प्रो-इंडियंस हैं। क्योंकि हमारे जो चेयरमैन हैं सुभाष चंद्रा वो हमारे एडिटोरियल डायरेक्टर भी हैं। तो जब मैंने इस कंपनी को जॉइन किया था, तब मुझे जो उनकी ओर से निर्देश मिले थे, वो ये कि जो देश के लिए अच्छा हो, जो भारत के लोगों के लिए अच्छा हो वो करना और जो सही समस्या हो, वो जैसी हो उसे वैसे ही रख देना। मैंने वैसे ही किया। अभी हुआ ये है कि यदि आप कहें कि मैं प्रो-इंडिया हूं, भारत मुझे पसंद है, तो वो आपको राइट-विंगर कह देंगे। आपको भक्त कह दिया जाएगा। और कहीं आपने ये कहा कि भारत में बहुत असुरक्षा की भावना आ गई है, बाहर निकलने में डर लगता है, कुछ अच्छा नहीं हो रहा है, तो आपको सेकुलर, धर्मनिरपेक्ष, बुद्धजीवी होने का सर्टिफिकेट मिलेगा।    

मुझे 'राष्ट्रवादी पत्रकार' मत कहिए:

ये जो ‘राष्ट्रवादी’ शब्द है इस पर मुझे पड़ी आपत्ति है। मैं जब कभी बाहर जाता हूं तो मुझे कई बार लोग कह देते हैं‘राष्ट्रवादी’ पत्रकार। तो मैं सबको कहता हूं कि मुझे राष्ट्रवादी मत कहिए, बल्कि आपको सबको ही राष्ट्रवादी होना चाहिए। राष्ट्रवाद आपके डीएनए में होना चाहिए। आप जिस देश में रहते हो उसे आप प्यार क्यों नहीं कर सकते। अगर नहीं कर सकते तो जिस देश से करते हो, वहां रहिए। उसमें क्या दिक्कत है। एक अजीब सा टर्म बना दिया गया ‘राष्ट्रवादी’। क्या ऐसे भी लोग हैं जो राष्ट्रवादी नहीं है, जो देश को प्यार नहीं करते और देश में रहते हैं। अब दुर्भाग्य से जो लोग देश की आलोचना करते हुए कहते हैं कि कोई भविष्य नहीं है, वे लोग भी कहते हैं कि मैं भी देश से उतना प्यार करता हूं, जितना कि आप करते हैं। तो मैं चाहता हूं कि उनके लिए भी आप राष्ट्रवादी शब्द का इस्तेमाल कीजिए और हमारे लिए भी। लेकिन राष्ट्रवादी के साथ में तो आपने बहुत सारी विचारधारा लपेट दी हैं, बहुत सारी चीजें आपने राष्ट्रवादी के साथ आईडेंडिफाइ कर दी हैं, फिर आपको एक खास विचारधारा, एक खास पार्टी और एक खास स्टैंड के लिए जानने लगते हैं। मुझे ये शब्द निजी तौर पर तो अच्छा लगता है, लेकिन जब इस शब्द को लेकर आपको सिंगलआउट किया जाता बाकियों की तुलना में, तो मुझे ये अच्छा नहीं लगता।   


सरकार की आलोचना को सही मानते हैं या नहीं:

आपने 2014 से पहले का दौर भी देखा होगा, लेकिन जितनी आलोचना सोशल मीडिया पर, बाहर, लिट्रेचर फेस्टिवल्स में, अखबारों में इस सरकार और प्रधानमंत्री की हुई है, मुझे नहीं लगता कि मनमोहन सिंह की, राहुल गांधी की या सोनिया गांधी की हुई होगी, जब 10 साल का उनके यूपीए का शासन था। इसलिए मुझे समझ नहीं आता। मैंने वो दौर भी देखा था, तब मैं एक्टिव जर्नलिज्म में था, जब यूपीए सरकार 10 साल थी और साढ़े चार साल भी मैंने देखे। तो मैं आपको ये अंतर करके बता सकता हूं कि उस समय क्या दबाब होते थे और आज लोग कह देते हैं कि सरकार से फोन आ जाते हैं। लेकिन वे वो दौर कैसे भूल जाते हैं, जब तब सरकार से फोन आ जाते थे। जब सरकार की ओर से कह दिया जाता था कि आप इस स्कैम को दबा दीजिए, आप ऐसा कर दीजिए, आप ऐसा करेंगे तो अच्छा नहीं होगा। ये तो उस दौर में भी होता था। ईवीएम को लेकर इतना हायतौबा कभी पहले मचा है इस देश में।

EVM पर बीजेपी ने भी उठाए थे सवाल:

अब आप ऐसे देखों कि जब बीजेपी ने EVM पर आरोप लगाया तो मीडिया ने उसे कितना उठाया और हमारे देश के बुद्धजीवियों ने, ओपिनियन मेकर्स, पत्रकारों ने उसे कितना उठाया। मीडिया में उसे कितनी जगह मिली, कभी फ्रंट पेज पर नहीं आ पाया। लेकिन जब अब ये मुद्दा उठा, तो वो फ्रंट पेज पर आता है, सब चीज उसके बारे में कही जातीं हैं। इसलिए कहना चाहूंगा कि मीडिया को कहीं न कहीं तब भी इस मुद्दे को अपने हिसाब से उठाना चाहिए था। 

टीवी न्यूज देखनी चाहिए या नहीं? 

भारत का जो मीडिया है डबल स्टैंडर्ड्स का दूसरा नाम है। ईमानदारी से कहूं तो मैं घर जाने के बाद टीवी नहीं देखता, क्योंकि मैं घर पहुंचता ही रात के 12 बजे हूं उसके बाद टीवी देखने की हिम्मत नहीं होती। मैं सिर्फ सोने घर जाता हूं। लेकिन मैं दिनभर टीवी देखता हूं, क्योंकि मेरी रोजी रोटी यही है और मेरा दर्शक भी यही देखता है। मेरा दर्शक मुझे इसी माध्यम की वजह से जानता है। तो मैं ये नहीं कह सकता कि टीवी नहीं देखना चाहिए, टीवी देखना चाहिए। टीवी के साथ हम न्याय करने की कोशिश कर रहे हैं। टीवी न्यूज की जो ग्लोरी थी, जो उसकी रिस्पेक्ट थी उसे हम लाने की कोशिश कर रहे हैं। हमारा चैनल उस रिस्पेक्ट वापस लाने की कोशिश कर रहा है।

आपके चैनल पर सरकार की खबरें ज्यादा क्यों दिखती हैं? 

ये आरोप असल में गलत है कि सरकार की हम बहुत खबरें दिखाते हैं। हम सरकार की खबर नहीं दिखाते हैं, हम खबरें दिखाते हैं देश की, भारत की। अगर आप जी न्यूज की पर्सनैलिटी देखें तो, पता चलेगा कि जी न्यूज नेगेटिव चैनल नहीं है। जी न्यूज मुख्यतौर पर पॉजिटिव चैनल है। हमारे बहुत से प्रोग्राम है ऐसे हैं जो सिर्फ पॉजिटिव बातें करते हैं। मीडिया का पूरा नेचर निगेटिव है। हमारा जो 90% मीडिया है जो कुछ नहीं हो रहा है वो दिखाएगा। हो रहा है तो नहीं दिखाएगा। मान लीजिए किसी गांव में बिजली चलेगी, वो उसके लिए खबर नहीं है, लेकिन किसी गांव में नहीं पहुंची, ये उसके लिए खबर है। तो ये आरोप इसलिए लगते हैं कि देश की प्रशंसा कर दो, तो लोग समझते हैं सरकार की प्रशंसा है। मैं बार-बार ये  कहता हूं कि देश में सरकार को छोड़ पर भी बहुत कुछ है। आज जो पूरा मीडिया बंटा है, वो ये है कि आप सरकार के खिलाफ हैं या सरकार के पक्ष में। पर मैं उसको और आगे लेकर जाना चाहता हूं कि आप देश के खिलाफ हैं या देश के पक्ष में। अब मैं ये आपकी समझे के ऊपर छोड़ता हूं कि आप क्या समझते हो कि देश ही सरकार है या सरकार ही देश है। इसमें बात अलग-अलग हो सकती है। इसलिए मैं नहीं कहूंगा कि हम सरकार की खबरें दिखाते हैं। हम लोगों की खबरें दिखाते हैं।

ZEE MEDIA का नेतृत्व करते हुए आप अपने शो के लिए समय कैसे निकाल लेते हैं? 

असल में ये सबकुछ पैशन से जुड़ा हुआ है। मेरा जो ड्राइविंग फोर्स है अकेले मेरे जीवन का, वो है पैशन। मुझे पैशन है अपने काम के प्रति। मैं काम करना चाहता हूं। पहले मैंने एक घंटे का ये शो (डीएनए) किया था, उसके बाद इसे बढ़ाकर मैंने डेढ़ घंटे का कर दिया। और जब मैं अपने लिए कोई चुनौती लेता हूं तो वहां से शुरू करता हूं कि सबसे मुश्किल चीज क्या है। तो सबसे मुश्किल चीज यही थी। जब मैं ये शो शुरू कर रहा था, तो उससे पहले हम लोगों के बीच गए थे, हमारे प्रमोटर डॉ. सुभाष चंद्रा, हमारी को-टीम।  हम सबने पूरे भारत का दौरा किया था, क्योंकि हम आपस में बात करते थे। डॉ.  सुभाष चंद्रा में हमसे एक बार पूछा कि हमने ये चैनल क्यों खोल कर रखा हुआ है, इसका उद्देश्य क्या है? क्या पैसा कमाना? पैसे तो मेरे पास बहुत हैं पहले ही, मेरे जो बाकी के ग्रुप हैं, जो कंपनियां हैं, वो जी मीडिया से ज्यादा पैसा कमाती हैं। तो मेरा मकसद क्या है, What is the way forward?  लेकिन जब हमें लगा कि इसका जवाब तो लोग दे सकते हैं, तो हम लोगों के बीच गए। तो लोगों ने ये सारी चीजें बताई कि हम ब्रेकिंग न्यूज से परेशान हैं। हम नकली हीरोज से परेशान हैं। हम इन लंबे डिबेट से परेशान हैं। तो जब मैं वापस आया तो मैंने उस डेटा की चर्निंग की और जो-जो लोगों ने हमें बताई थीं कि ये हमें नहीं चाहिए, तो उसे मैंने निकाल दिया, तो लगा कि ये तो बहुत मेहनत और मुश्किल का काम है और मुझे कई लोगों ने कहा भी कि ये नाकाम होने का ये तो शॉर्ट फॉर्मूला है।


TRP भी काफी हद तक नकली रेटिंग्स है...     

एक आम एडिटर और एक ऩॉर्मल न्यूज टीम, वो सिर्फ टीआरपी देखकर ही बात करते हैं। असल में दो अप्रोच हैं उसके एक- आप टीआपी चार्ट देखिए, उस चार्ट में देखिए पिछले हफ्ते या पिछले चार हफ्ते में किस तरह के प्रोग्राम में रेटिंग आ रही है। सस्ती प्रोग्रामिंग में रेटिंग आ रही है, नॉन न्यूज में रेटिंग आ रही है, फास्ट न्यूज में रेटिंग आ रही है, तो चैनल अपना फास्ट न्यूज बढ़ा देता है और डिबेट में रेटिंग आ रही तो वे डिबेट शुरू कर देते हैं। यानी The whole programming is being driven by TRP charts not by your mind or your guts feelings or your viewers response.

दूसरा अप्रोच ये है कि हमारे यहां टीआरपी रेटिंग्स आती हैं, हम देख लेते हैं पर उस पर चर्चा नहीं करते। आप अच्छा कॉन्टेंट बनाइए और यदि आपका कॉन्टेंट अच्छा है तो अपने आप उसकी रेटिंग आएगी। Rating should always be bi-product. जब लोग देखेंगे तो रेटिंग क्यों नहीं आएगी, लेकिन मैं ये नहीं कर सकता कि इसकी रेटिंग आ रही है इसलिए मैं ऐसा क्या करूंगा, फिर चाहे लोग प्रोग्राम देखें या फिर न देखें, क्योंकि ये गलत है। इसलिए मैं कहता हूं कि ये रेटिंग काफी हद तक नकली रेटिंग होती है।              

पत्रकार संगठनों के नाम पर ‘नेतागिरी’ करना चाहते हैं संपादक:

जितनी भी ये संस्थाएं है, असोसिएशंस है, गिल्ड हैं, ये सभी, मुझे लगता है कि इनका उद्देश्य दिखाने के लिए तो यही होता है कि मीडिया में साफ सफाई रहे और डिसिप्लीन व रेगुलेशन रहे, लेकिन असल में ये सारे नेतागिरी के अड्डे हैं। वे पत्रकार जिन्हें राजनीति का शौक है और वे औपचारिक रूप से राजनीति में नहीं जा सकते, लेकिन पत्रकार के तौर पर राजनीति करना चाहते हैं और पत्रकारों के नेता बनना चाहते हैं और वह इसलिए बनना चाहते हैं क्योंकि मैं इतने पत्रकारों का नेता हूं, तो सरकार मुझसे सीधे बात करे। मेरा वजन बढ़ जाए, मेरी सीवी में एक और नई बात जुड़ जाए कि मैं उस असोसिएशन का भी कुछ हूं। जो मुझे समझ में आया कि इसका जो मुख्य एजेंडा यही है।

1000 पत्रकारों की नौकरी जाने पर चुप क्यों रहे 'संपादक' नेता... 

उदाहरण देता हूं, तीन पत्रकारों को निकाल दिया गया। पूरे देश में इतनी चर्चा हो गई। अलग-अलग चैनल्स ने कभी 150 लोगों को निकाला, कभी 250 लोगों को निकाला, तो कभी 300 लोगों को। पिछले पांच साल में हजार लोगों की नौकरी गई होगी। कोई भी पत्रकार ने एक बार भी आवाज नहीं उठाई। जो चैनल डिबेट करते हैं इस पर कि ये तीन पत्रकारों को कैसे हटा दिया, उस चैनल ने ही सैकड़ों पत्रकारों को निकाल दिया और वो भी ऐसे पत्रकार जिनको ईएमआई देनी मुश्किल पड़ रही है। वो सीनियर आईएएस के बच्चे नहीं है। वो साउथ दिल्ली में बड़े-बड़े भवनों में नहीं रहते। ऐसे लोगों को नौकरी से निकाल दिया, पूरे पत्रकारिता जगत में एक व्यक्ति भी खड़ा नहीं हुआ। न कोई पत्रकार, न कोई असोसिएशन और न गिल्ड  और जब तीन लोगों की नौकरियां चली जाती हैं तो वो उसे देश से जोड़ देते हैं। कहते हैं कि वो तीन लोग रह जाते हैं तो पता नहीं क्या कर देते। तीन लोग तो पिछले 20 साल से मीडिया में है, तो उन्होंने क्या कर लिया और तीन लोगों की पहले जब नौकरियां गईं, तो वो कैसे गईं।    

'गरीब' संपादकों का बैंक बैलेंस भी देखिए एक बार : 

जो राजानीति करते हैं, वे कहते हैं कि मैं गरीबों का नेता हूं। लेकिन गरीबों का नेता बनते-बनते आज वो सब बड़े बंगले में रहते हैं, विदेशी गाड़ियों में चलते हैं। बड़े-बड़े विदेशी ब्रैंड्स पहनते हैं और सैकड़ों करोड़ रुपए हैं और राजनीति गरीबों की करते हैं। इसी तरह से मीडिया में भी बहुत से लोग हैं, जो अपने आपको समाजवाद से जुड़ा हुआ बताते हैं। ये भीराजनीति गरीबों की करते हैं, अपने आपको गरीबों का मसीहा बताते हैं। चप्पल पहनकर चलेंगे और ये दिखाएंगे कि वे बहुत ही साधारण सा जीवन जीते हैं। लेकिन असल में जब उनके बैंक-बैलेंस चेक करेंगे, उनकी गाड़ियां चेक करेंगे, उनके तनख्वाह चेक करेंगे तो सारे तीस परसेंट से ऊपर के ब्राइकेट में आज। कोई 10-15 लाख प्रति माह से कम नहीं कमा रहा होगा। तो ये हमारे डबल स्टैंडर्ड हैं। मैं तो हमेशा कहता हूं कि या तो खुलकर राजनीति में आ जाओ और पार्टी जॉइन कर लो, जैसा कि कुछ लोगों ने किया भी। लेकिन पार्टी जॉइन करने की दिक्कत ये है कि मंथली सैलरी खत्म हो जाती है। टीवी पर हर रोज रात को आने का मौका खत्म हो जाता है। उसको छोड़ना भी आसान नहीं है। वो चाहते हैं कि मैं एक कदम राजनीति में रखूं और यहां से मैं तनख्वाह भी लेता रहूं, टीवी पर भी आता रहूं और पत्रकार भी बना रहूं।

संपादक से राजनेता बनना उनकी गलती थी... 

दुनिया सब समझती है। आप दो-तीन साल एक चैनल में रहे नेता बनकर, फिर आपको लगा कि माहौल ऐसा हो रहा है कि मैं नेतागिरी में आ गया तो अच्छे डिविडेंड्स मिलेंगे, जो मिल रहा है इससे ज्यादा मिलेगा। फिर चार पांच साल आपने कोशिश की, वो नहीं मिला। अब वो वापस कहां जाएंगे मैं कह नहीं सकता। लेकिन मेरा मानना है जो भी आप करिए खुलकर करिए। आप बताइए कि मुझे नेतागिरी-राजनीति का शौक है इसलिए मैं जा रहा हूं राजनीति में। फिर यहां मत रहिए और यदि आप वहां है तो वहां से यहां मत आइए। ये गलत बात है। उन दर्शकों के साथ, जो लोग आप पर विश्वास करते हैं उनके साथ ये धोखा है।

मीडिया को क्या एंटी एस्टेबिल्समेंट (anti-establishment) होना चाहिए या नहीं...    

मीडिया का मतलब एंटी एस्टेबिल्समेंट (anti-establishment), मैं इसे नहीं मानता। कुछ खास लोग और पब्लिकेशंस हैं, जिन्होंने इस थ्योरी को आगे बढ़ाया हुआ है। मीडिया का काम क्यों होना चाहिए कि मैं हमेशा एंटी एस्टेबिल्समेंट ही रहूं। जब फ्रीडम मूमेंट चल रहा था, तब मीडिया था, उस वक्त क्या रोल था मीडिया का। उस वक्त मीडिया का रोल था कि जो आजादी की लड़ाई चल रही है उसकी खबरें लोगों तक पहुंचाना। तब प्रो-फ्रीडम मूमेंट था। मेरा विचार है कि एंटीएस्टेबिल्समेंट एक व्यवस्था है। अपने देश की क्या व्यवस्था है, टोटल- उसमें सरकार नहीं। आपके देश की व्यवस्था आज ये है कि आपको आरक्षण चाहिए। आपके देश की व्यवस्था ये है कि आज बेईमानी के बिना काम नहीं चलता। आपके देश की व्यवस्था ये है कि आप अनुशासन में कभी नहीं रह सकते। आपके देश की व्यवस्था ये है कि आप जनसंख्या पर कुछ नहीं कर पाए। अब इसमें सारी सरकारें जिम्मेदार हैं। तो मीडिया का जो रोल होना चाहिए वो प्रो-सिस्टम और एंटी सिस्टम होना चाहिए। व्यवस्था के पक्ष में होना चाहिए या व्यवस्था के खिलाफ होना चाहिए। व्यवस्था में जो कमियां है वो हाईलाइट करना चाहिए। लेकिन लोग कर क्या रहे हैं कि वो व्यवस्था को तो छोड़ देते हैं और सरकार में गलतियां निकालते हैं। 

जी-जिंदल विवाद पर खुद को भाग्यशाली मानता हूं-

जी-जिंदल विवाद को लेकर मेरा पहले दिन से एक ही ये स्टैंड था, हर बार मैंने जितने इंटरव्यूज दिए, मैंने कभी ये नहीं कहा कि मैं इस पर बात नहीं करूंगा। इसलिए पहले दिन से ही मैंने इस पर हमेशा कमेंट्स दिए, क्योंकि मुझे पता था कि मेरी गलती नहीं है। बाकी के लोग क्या सोचते हैं मैं नहीं कह सकता हूं। उस पर मेरा कंट्रोल नहीं है। यदि मुझे लगता है कि मेरी गलती नहीं है, तो मुझे रात में नींद आती है। मेरा आत्मसम्मान बिलकुल ठीक है और मैं सही हूं। मुझे न तो इस पर सवाल और न ही ये इश्यू परेशान करता है। इसे लेकर मुझे कोई असहजता महसूस नहीं होती। ये विवाद 5-6 साल चला और इस पर मुझे कई लोगों को जवाब देने पड़े। हालांकि बहुत फ्रस्टेशन भी होती थी क्योंकि आधे लोग विश्वास करते थे, बाकी लोग नहीं करते थे। कानूनी तौर पर देखें तो ये बहुत कम लोगों को पता है कि 2013 में एक चार्जशीट फाइल हुई थी, वो चार्जशीट कोर्ट ने ये कहते हुए रिजेक्ट कर दी थी कि इसके अंदर सारी धाराएं (सेक्शंस) गलत हैं और इन्वेस्टिगेशन भी ठीक नहीं है, दोबारा से इसकी इन्वेस्टिगेशन की जाए और सहीं धाराएं लगाइ जाए और फिर फ्रेश चार्जशीट दायर की जाए। ऐसा बहुत कम होता है कि जब  किसी केस में चार्जशीट रिजेक्ट हो जाए और वापस आ जाए। कोर्ट उसे एसेप्ट न करे। लेकिन हमारे केस में ऐसा ही हुआ था। मुझे खुशी है कि इस स्टेज पर मुझे न्याय मिला। फिर 2013 से 2018 तक इस केस में पुलिस ने कोई चार्जशीट दाखिल नहीं की। अब 2018 में जो शिकायतकर्ता था वो आकर अपनी चिठ्ठी में ये कहता है कि कोई अपराध हुआ ही नहीं और जो उस समय हुआ था वो गलतफहमी, कन्फ्यूजन और मिसकम्युनिकेशन की वजह से हुआ था। तो एक बार को मुझे दुख लगता है कि मेरे ऊपर इतने झूठे आरोप लगे, मेरा नाम खराब हुआ, बदनामी हुई। जगह-जगह अपमान सहने पड़े। ऐसे में आत्मा के ऊपर एक बोझ तो रहता ही है कि लोग मेरे बारे में ऐसी बाते कर रहे हैं। अब अच्छा है, खुशी है कि 6 साल बाद ही सही मुझे न्याय मिला। मैं खुद को भाग्यशाली मानता हूं कि 6 साल के अंदर मुझे न्याय मिल गया, वरना हमारी न्याय व्यवस्था ऐसी है कि लोगों के 60 साल में भी दाग नहीं धुलते। 

क्या अगले साल आपका नाम पद्म सम्मान की सूची में होगा? 

2014 से पहले पत्रकारों को, डॉक्टरों को और वकीलों को, जो भी प्रधानमंत्री के करीब हैं, उन्हें मिला (पद्म सम्मान) करता था। दिल्ली के ज्यादातर लोग ही ये ले लिया करते थे। जो भी सरकार, मंत्री-प्रधानमंत्री के करीब है उसको ये सारी चीजें आराम से मिल जाती थी। पत्रकार ये सोचते थे कि पद्म श्री उनके जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि है। मुझे लगता है कि जब आप दफ्तर के बाहर जाएंगे, तो लोग पहचानते हैं, प्यार करते हैं तो यही सबसे बड़ा अवॉर्ड है। पद्मश्री लेकर यदि दर्शक आपको पहचाने नहीं, आपको प्यार नहीं करे, तो उसका कोई फायदा नहीं है।   

 

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‘नेटफ्लिक्स’ और ‘हॉटस्टार’ जैसे प्लेटफॉर्म्स को रेगुलेट करने की मांग को लेकर क्या है आपका मानना?

सरकार को इस दिशा में तुरंत कदम उठाने चाहिए

इन पर अश्लील कंटेट प्रसारित करने के आरोप सही हैं

आज के दौर में ऐसे प्लेटफॉर्म्स को रेगुलेट करना बहुत मुश्किल है

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