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हम घाटे में अखबार बेचने के मॉडल पर नहीं है, कॉस्ट प्राइस ही सेलिंग प्राइज है: हेमंत शर्मा

Published At: Saturday, 13 October, 2018 Last Modified: Saturday, 13 October, 2018

समाचार4मीडिया ब्यूरो।।

गांधी जयंती के दिन दो अक्टूबर को इंदौर में दो अखबार ‘प्रजातंत्र’ और ‘फर्स्ट पॉइंट’ एक साथ लॉन्च हुए। इंदौर के भगवती होटल में आयोजित समारोह में लॉन्च हुए दोनों अखबार ब्लैड ऐंड वाइट मीडिया ग्रुप के है।‘प्रजातंत्र’ हिंदी में 12 पेज का अखबार है, जबकि ‘फर्स्ट पॉइंट’ अंग्रेजी में 16 पेज का टैब्लॉयड है। दोनों अखबारों की संयुक्त कीमत 10 रुपए रखी गई है और यह 3600 रुपए के सालाना सबस्क्रिप्शन पर पाठकों को उपलब्ध है।

इस मौके पर 'समाचार4मीडिया' के डिप्‍टी एडिटर अभिषेक मेहरोत्रा ने अखबार के कर्ताधर्ता वरिष्ठ पत्रकार हेमंत शर्मा से बातचीत की। प्रस्‍तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश: 

यह पहला ऐसा अखबार है, जिसकी लॉन्चिंग पर कहा गया कि इसकी 10 हजार-15 हजार कॉपियां ही बिक जाएं तो बहुत है। आप इससे संतुष्ट होंगे, जबकि देश में अखबार तो लॉन्च ही इसलिए होते हैं कि उनकी पांच लाख, दस लाख और करोड़ कॉपियां बिक जाएं, वे पैसा कमाएं और देश की आवाज व धड़कन बन जाएं, ऐसे में अखबार को लेकर आपका तो लक्ष्य ही बड़ा छोटा सा है, आखिर इसकी क्या वजह है ?

देखिए, इसमें बहुत ही सीधा सा फंडा है। सारे बड़े अखबार, जो दो लाख-पांच लाख सर्कुलेशन का दावा करते हैं, असल में वो बड़े सर्केलेशन फिगर के जरिए बड़े ऐडवरटाइजर्स को लुभाना चाहते हैं। चाहे वह बीएमडब्ल्यू हो यो कोई और  बड़े एडवर्टाइजर्स हों, उनको लुभाने के लिे नंबन वन या फिर सबसे ज्यादा बिकने का दावा सब करते हैं। कहने का मतलब है कि सारी लड़ाई नंबरों को लेकर इसी लिए है। हम जो टार्गेट कर रहे हैं, वो 10-15 हजार के नंबरों को लेकर नहीं हैं बल्कि हम इंदौर के समझदार, संपन्न और प्रयोगधर्मिता क पक्षधर पाठकों को ध्यान में रखकर चल रहे हैं।

सबसे पहले तो आपको बता दूं कि यह किसी व्यापारिक घराने का अखबार नहीं है, कुछ पत्रकारों ने मिलकर इसकी शुरुआत की है, जिसमें हमारा अपना पैसा लगा हुआ है। इसके अलावा इसमें हमारे एडवर्टाइजर्स के साथ ही ऐसे स्टेकहोल्डर्स का पैसा लगा हुआ है, जिनका मीडिया से कोई नाता नहीं है। ऐसे चुनिंदा लोग हैं जो हमसे निजी तौर पर जुड़े हुए हैं। यहां यह भी बता दूं कि इस अखबार में हमारे साथ कोई राजनेता या बिजनेस हाउस शामिल नहीं है। सिर्फ पत्रकार और गिने-चुने ऐसे लोग शामिल हैं, जिनका मीडिया से सरोकार नहीं हैं, बस वे निजी संबंधों के आधार पर हमसे जुड़े हुए हैं।

आजकल जितने भी अखबार मार्केट में है, उनकी एक सी ही दशा है। 14-16 रुपए के अखबार को चार रुपए में बेचा जा रहा है तो इस घाटे को भरकर कोई भी नहीं चल सकता है। देश के बड़े अखबार भी इस घाटे से बच नहीं पा रहे हैं। इंदौर में तो यह मार्केट इतना बड़ा है कि यहां पर लोकल एडवर्टाइजिंग से जो भी पैसा मिलता है, वह पूरा का पूरा इस घाटे को भरने में चला जाता है। यह ऐसा मॉडल होता है, जिसके कारण ज्यादातर अखबार बंद होते हैं, इसलिए अखबार के इस मॉडल के साथ जाने की हमारी कोई रुचि नहीं थी।

अब समस्या यह थी कि इस घाटे को कैसे भरा जाए। या तो इसकी पूरी कीमत पाठक से ली जाए लेकिन जब पाठक को नंबर वन अखबार पांच रुपए का मिल रहा है तो वो नए अखबार के लिए दस रुपए क्यों चुकाएगा, इसलिए यह संभव नहीं है। इन्हीं सब स्थितियों को देखते हुए ही हमने अखबार को दो भागों में विभाजित किया है। इनमें 12 पेज का एक अखबार ब्रॉडशीट में हिंदी में है, जबकि दूसरा अखबार 16 पेज का टैब्लॉयड अंग्रेजी में है। लेकिन दोनों अखबारों की टीम हमने अलग बनाई है। दोनों अखबारों की डिमांड अलग है, उनकी सोच अलग है और उनकी खबरें भी अलग हैं। यानी दोनों अखबारों में एक-दूसरे की एक भी खबर नहीं मिलेगी। अंग्रेजी टैब्लॉयड अखबार को पूरी तरह यूरोपियन तर्ज पर तैयार किया गया है। यह सब कवायद घाटे से निपटने के लिए की गई है। हम अखबार की कीमत से कम पर नहीं बेच रहे हैं, जितना हमारा खर्च हो रहा है, वो कीमत पाठक से ले रहे हैं।

इसके अलावा हिन्दी और अंग्रेजी दोनों में शुरू करने का मतलब है कि इसमें रीडरशिप की समस्या नहीं रहेगी। यदि हम केवल हिंदी में शुरू करते हैं तो अंग्रेजी का पाठक कहीं छूट जाता है और यदि हम सिर्फ अंग्रेजी में शुरू करते हैं तो पाठक संख्या सीमित होती है। लेकिन इस कदम से हम दोनों तरह के पाठक वर्ग में अपनी जगह बना सकते हैं।


क्या आपने इसी वजह से अखबार की टैगलाइन में एलीट शब्द का इस्तेमाल किया है ?

इसका मतलब यह नहीं है कि यह अखबार सिर्फ एलीट क्लास के लोगों के लिए ही बना है। यह तो लोगों का सोचने का नजरिया है, जबकि यह एलीट रीडरशिप एक्सपीरिएंस है। अखबार में यह साफ-साफ लिखा हुआ है।

जैसा कि आप 3600 रुपए के वार्षिक सब्सक्रिप्शन की बात कर रहे हैं, तो ऐसे में कैसे यह ज्यादा से ज्यादा पाठकों तक पहुंच बना पाएगा ?

मुझे नहीं लगता कि दो अखबारों पर दस रुपए रोजाना यानी महीने में 300 रुपए खर्च करना किसी भी पाठक के लिए ज्यादा बड़ी बात है। ऐसे में निश्चित रूप से यह अपना टार्गेट पूरा करेगा। हमारी जो थ्योरी है, उसके अनुसार हम दस रुपए रोजाना के हिसाब से पूरे साल का सबस्क्रिप्शन यानी 3600 रुपए पहले ही अपने पाठकों से एक साथ ले रहे हैं। यह देश का पहला ऐसा अखबार है, जिसका 100 प्रतिशत सबस्क्रिप्शन है और यह पैसा एडवांस में लिया जा रहा है।

सवाल ये है कि जब आपका अखबार मात्र 10-15 हजार लोगों तक पहुंच रहा है, जबकि दूसरी ओर बड़े अखबार लाखों-करोड़ों कापी की बात कर रहे हैं तो ऐसे में आप इस अखबार को जन-जन तक कैसे पहुंचाएंगे ?

बिल्कुल पहुंचाएंगे, हम इसके लिए सोशल मीडिया का सहारा भी लेंगे। हम वॉट्सऐप एडिशन का भी सहारा लेंगे। ऐसे में जो लोग हमारा अखबार नहीं खरीद सकते हैं, वे वॉट्सऐप एडिशन से पढ़ सकते हैं। यह एक अच्छा मॉडल है, जिसके द्वारा अच्छी खबरें लाखों पाठकों तक पहुंच जाती हैं। आप यूट्यूब चैनल लाकर भी अपनी खबरों को पाठकों तक पहुंचा सकते हैं।

आजकल खबरें सभी अखबारों और चैनलों के पास हैं। ऐसे में आपके अखबार का कंटेंट दूसरे अखबारों से किस तरह अलग होगा ?

सबसे पहली बात तो यह है कि सारे अखबार एक जैसे हैं। सारे अखबारों में 80 प्रतिशत खबरें एक जैसी होती हैं। उनके फ्रंट पेज पर भी 80 प्रतिशत खबरें एक जैसी होती हैं, लेकिन हमने पहले दिन ही यह तय कर लिया कि इस 80 प्रतिशत को 20 प्रतिशत पर लेकर आना है। लेकिन यह भी सही है कि आप रोजाना फ्रंट पेज की 10-15 खबरें नहीं तैयार कर सकते हैं। लेकिन आप पांच खबरें तो तैयार कर सकते हैं। आप कोई खबर दूर यानी श्रीनगर से तैयार करवा लें अथवा एक खबर सबरीमाला से तैयार करवा लें। फ्रंट पेज पर यदि आपकी कोई एक खबर भी दमदार है तो समझो आपका काम हो गया। ‘इंडियन एक्सप्रेस’ अखबार भी इसी तरह करता है। ऐसा नहीं है कि इंदौर, भोपाल अथवा कहीं और उनकी नंबर संख्या ज्यादा है, लेकिन वह फिर भी अपनी ब्रैंड वैल्यू के कारण चल रहा है। 

आपने इसे मॉर्निंग अखबार के तौर पर शुरू किया है। क्या आपको नहीं लगता कि यदि आप इसे मिड-डे अथवा शाम के अखबार के तौर पर शुरू करते तो दूसरों से आपकी लड़ाई नहीं होती? क्योंकि यदि कोई पाठक पहले से अखबार ले रहा है तो क्या वो उसे छोड़कर आपका 10 रुपए का अखबार लेगा अथवा दो अखबार खरीदेगा ?

हमारी किसी से कोई लड़ाई नहीं है। अभी अखबार के बारे में पाठकों को पूरी तरह पता नहीं है, फिर भी वे भरोसा दिखाते हुए पूरे साल का सबस्क्रिप्शन ले रहे हैं। ऐसे में यदि वे मेरा पूरे साल का आधा टार्गेट भी पूरा कर दे रहे हैं तो मेरा आधा काम तो वैसे ही हो गया। बाकी मार्केट में प्रॉडक्ट आने के बाद ही रेस्पॉन्स को आप जान पाएंगे।

आपको यह भी बता दूं कि जो बड़े अखबार होने का दावा करते हैं, उनमें से भी से किसी में इतनी हिम्मत नहीं थी कि एक साथ पूरे साल का 500 रुपए भी सबस्क्रिप्शन ले सकें। मुंबई में जब ‘डीएनए’ और ‘एचटी’ लॉन्च हुआ तो उनका 160 रुपए और 225 रुपए सालाना सबस्क्रिप्शन शुल्क था। दूसरे अखबार किसी और राज्य में जाते हैं और नया अखबार निकालते हैं तो वे चाय की पत्ती से लेकर प्लास्टिक की बाल्टी तक फ्री देते हैं। जबकि मैं एक रुपए भी डिस्काउंट नहीं दे रहा हूं। जो भी लागत आएगी, सिर्फ वही ली जाएगी। पूरे साल के 3650 रुपए की जगह 3600 रुपए भी इसलिए लिए जा रहे हैं, क्योंकि पांच दिन छुट्टी रहेगी, इसलिए उन पांच दिनों का पैसा भी नहीं लिया जा रहा है। तीन महीने बाद ही पूरी प्रिंट मीडिया इंडस्ट्री की कहानी बिल्कुल अलग होगी। यह न सिर्फ एक मॉडल बनेगा, बल्कि दूसरे अखबारों को भी इस बात पर सोचने के लिए मजबूर होना पड़ेगा कि कीमतें बढ़ाएं।

हम जब भी लोगों से मिल रहे हैं तो हम एक बात पहले ही स्पष्ट कर देते हैं कि अभी तो हमने एक साल का पैसा ले लिया है, इस बीच यदि न्यूज प्रिंट अथवा अन्य किसी कारण से अखबार की कीमत बढ़ती है तो उसका पैसा कंपनी देगी लेकिन एक साल के बाद यदि अखबार की लागत 14 रुपए हुई तो पाठकों से 15 रुपए और भविष्य में लागत बढ़कर यदि 18-19 रुपए हुई तो 20 रुपए लिए जाएंगे। अभी हमारा पूरा जोर कंटेंट पर है। फ्रंट पेज पर हम चार से पांच खबरें लाना चाहते हैं लेकिन हम इस बात का भी ध्यान रखेंगे कि अन्य अखबारों में फ्रंट पेज पर जो खबरें हों, उनमें से 20-40 प्रतिशत हमारे यहां भी हो लेकिन उनकी पैकेजिंग, लेआउट और प्रस्तुतीकरण बिल्कुल अलग हो और वह ऐसा हो कि उसके बाद पाठक को किसी और अखबार को देखने की जरूरत ही महसूस न हो।

साल भर से आप लोगों से मिल रहे हैं। आपने लोगों से फीडबैक भी लिया है। क्या आपको लगता है कि हिंदी का पाठक ठीकठाक पैसा देकर खबर पढ़ना चाहता है ?

बिल्कुल, अब लोगों की सोच बदल रही है। मेरे पास विदेश से कई फोन आ रहे हैं और वे जानना चाहते हैं कि यह अखबार उन्हें कैसे मिलेगा, वे इसके लिए भुगतान करने के लिए भी तैयार हैं, जबकि अखबार अभी बाजार में आया ही नहीं है। कहने का मतलब यह है कि यह आपको तय करना है कि आप पैसा देकर कंटेंट पढ़ना चाहते हैं अथवा नहीं। 50 हजार लोगों को फ्री में कंटेंट देने के बजाय पांच हजार लोग भी यदि इसे सबस्क्राइब करते हैं तो मेरे लिए यह बहुत बड़ी बात है। 

कई लोगों का मानना है कि चूंकि चुनाव नजदीक हैं, इसलिए अखबार शुरू किया गया है। आखिर लोगों की इस सोच को आपका अखबार किस तरह बदलेगा ?

देखिए, यदि चुनाव को ध्यान में रखकर अखबार निकाला गया होता तो इस कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रदेश के मुख्यमंत्री, जनसंपर्क मंत्री अथवा किसी अन्य नेता से करवाई जाती। लेकिन हमने जानबूझकर राजनेताओं के इस लॉन्चिंग कार्यक्रम से दूर रखा।

जब मुझे आपके अखबार की लॉन्चिंग की खबर मिली, उस समय मेरे साथ दिल्ली प्रेस क्लब में बैठे हुए कई लोगों का कहना था कि यह विजयवर्गीय का अखबार होगा। हालांकि मुझे इस बारे में नहीं पता था लेकिन जब मैं यहां आया तो ये अकेले नेता मंच पर थे। आखिर ऐसा क्यों ?

विजयवर्गीय मेरे पारिवारिक मित्र हैं। यही नहीं, जबसे मैं पत्रकारिता में आया हूं, तब से उनसे मेरी पारिवारिक मित्रता है। दूसरी बात ये कि जब मैं इंदौर में दैनिक भास्कर का संपादक बनकर आया तो उनके खिलाफ सबसे ज्यादा खबरें हमारे यहां ही छपीं। इससे पहले भास्कर में उनके खिलाफ इतने प्रभावी ढंग से निगेटिव खबरें नहीं छपी थीं। आपकी मित्रता किसी से क्यों नहीं हो सकती है, बशर्ते उनका आप में कोई हित न हो। यदि मुझे इस अखबार में विजयवर्गीय जी को साथ ही लाना है तो फिर दस रुपए कीमत की जरूरत ही नहीं हैं, दो रुपए कीमत ही बहुत है। इस अखबार का किसी भी राजनीतिक दल से कोई लेना-देना नहीं है।

यदि कंटेंट की बात करें तो इंदौर में तो आपने टीम तैयार की है लेकिन चूंकि अब तो सारी दुनिया ही एक हो गई है, ऐसे में आप देश और ग्लोबल कंटेंट कैसे जुटाएंगे, इसके लिए आपने किस तरह की नेटवर्किंग तैयार की है ?

पिछले करीब चार महीनों से हम इस दिशा में लगे हुए थे। हम विभिन्न राज्यों और खास स्थानों पर जाकर लोगों से बातचीत कर रहे हैं। यूपी की बात करें तो लखनऊ, कानपुर, बनारस में फ्रीलॉन्सरों की टीम बनाई जा रही है, जिन्हें हम अच्छे पैसे देंगे। जैसे यदि बनारस में कुछ हुआ है तो हम खबर लखनऊ से न लेकर सीधे वहीं से लेंगे। मान लीजिए कि आप एक महीने में 50 एक्सक्लूसिव रिपोर्ट देते हैं और इसके लिए प्रति रिपोर्ट 3000 का भुगतान करते हैं तो आपके सिर्फ डेढ़ लाख रुपए खर्च होते हैं। यदि श्रीनगर में शोएब अहमद की हत्या होती है तो मैं यह खबर दिल्ली से नहीं बल्कि सीधे श्रीनगर से करवाऊंगा। यदि बारामूला में कोई घटना होती है, तो मैं ग्राउंड रिपोर्टिंग के लिए वहीं के किसी पत्रकार को कहूंगा। 

टीवी का पिछलग्गू हो गया है अखबार, दो उदाहरणों मैं आपको दूंगा। अभी पिछले दिनों जब श्रीदेवी की मौत हुई रात करीब डेढ़ बजे, उस समय हम सभी को टीवी चैनलों के माध्यम से इस खबर के बारे में पता चल गया। तब तक अखबार छप चुके थे और वे इसमें कुछ कर नहीं सकते थे। पर अगले दिन अधिकांश अखबारों ने उसी खबर को पहली लीड बनाया, जब तक शायद पूरी दुनिया उस खबर के बारे में जान गई थी। इसी तरह का एक मामला हालिया लखनऊ एंनकाउंटर केसा में हुआ, रात का मामला था। इसमें भी सभी को स्टोरी पता चल गई, लेकिन इस मामले में भी अखबारों ने 36 घंटे बाद हत्या की खबर छापी। ऐसे में आपका अखबार इन परिस्थितियों से कैसे जूझेगा, क्योंकि टीवी और डिजिटल से बचाकर खबरें लाना बहुत मुश्किल होता है?

 जैसा कि आपको पता ही है कि टीवी चैनल की सुबह की खबरों की लिस्ट प्रिंट यानी अखबार देखकर ही बनती है। अभी तक अखबार भी सिर्फ पारंपरिक रिपोर्टिंग कर रहे हैं। कोई भी घटना हो जाती है, बस वे रिपोर्ट दे देते हैं। लेकिन मैं पहले ही बता चुका हूं कि हम इस तरह नहीं करेंगे, हमें इससे आगे बढ़कर काम करना होगा। इसलिए हम अपने यहां टीवी से भी लोग लेकर आए हैं। अखबार निकलने के 24 घंटे के बाद हम देश का बड़ा मेडिकल घोटाला खोलने जा रहे हैं, जिसके बारे में किसी भी मीडिया हाउस को कोई जानकारी नहीं है। इसलिए हमने लोगों को ढूंढ-ढूंढकर रखा है। हम टीवी के लोग भी लेकर आए है और फ्रेशर्स के साथ कुछ खास कामों के लिए विशेषज्ञ भी लाए हैं। सबसे बड़ी बात है कि हमारे यहां कोई बीट सिस्टम नहीं है। क्राइम बीट को छोड़ दें तो हमने अन्य कोई बीट रखी ही नहीं है। इसके बजाय हम सोचते हैं कि इंफ्रॉस्ट्रक्चर का एक रिपोर्टर हो, जैसे इंदौर विकास प्राधिकरण, नगर निगम और इसी तरह के विभागों को एक ही रिपोर्टर देखेगा।

 आजकल नए मीडिया वेंचर्स आते हैं और छह महीने बाद ही सैलरी को लेकर पेंच फंस जाता है। फिर लोगों के छोड़ने का सिलसिला शुरू होता है। फिर देखते ही देखते एडिटर बदल दिया जाता है। आपका भी नया अखबार है और आप ये सब चीजें देख ही रहे हैं तो इस बारे में कुछ बताएं?

ऐसा नहीं है। हमारे साथ जितने भी लोग जुड़े हैं, सबको सैलरी मिल रही है। कर्मचारियों की संख्या भी लगातार बढ़ती जा रही है। पिछले एक साल से तो हम नियमित तौर पर सैलरी दे ही रहे हैं।

आपने अपने लॉन्चिंग के संबोधन में 'विचार' की बात भी कही थी। लेकिन आज की लड़ाई भी तो यही हो गई है कि आजकल ज्यादातर संपादक और पत्रकार विचारधारा वाले हो गए हैं। सबके अपने-अपने विचार हैं, न्यूज पर व्यूज हावी हो गए हैं। इस बारे में आपका क्या कहना है ?

देखिए, मैं विचार के पेज की बात कर रहा हूं। अमूमन सभ हिंदी और अंग्रेजी अखबारों की बात करूं तो सभी ने हफ्ते के सातों दिनों के लेख कौन-कौन से लेखक लिखेंगे, पहले से तय हैं कि सोमवार को यह आएगा और मंगलवार को इन्हें छापेंगे। मैं कई साल से इन्हीं लोगों को पढ़ रहा हूं। अब तो ऐसा हो गया है कि मैं यदि नाम पढ़ता हूं कि ये क्या लिख रहे होंगे, मोटा-मोटा मैं बता सकता हूं कि इस शनिवार को उन्होंने लिखा है तो क्या लिखा होगा। हमने इस स्थिति को पूरी तरह बदल दिया है। हमारे यहां कोई तय नहीं है कि हम किसको छापेंगे। इसके लिए हमने 100 लोगों की लिस्ट बनाई है और उसे लगातार अपडेट कर रहे हैं। हमें जब भी किसी टॉपिक पर लिखवाना होगा, हम इस लिस्ट के अनुसार तय कर लेंगे। हमारे अखबार में विचार के लिए दो पेज हैं। हम विचार की महत्ता को समझते हैं और अपने पाठकों को भी इसका लाभ देने की पूरी कोशिश कर रहे हैं।   

देश के बड़े हिंदी संपादकों से जब बात होती है तो कहते हैं कि एडिट पेज की दिक्कत ये है कि बड़े विषयों जैसे- आर्मी अथवा पर्यावरण पर हिंदी में लोग नहीं लिख पाते हैं, इसलिए अंग्रेजी में लिखवाकर हिंदी में उसका अनुवाद कराना पड़ता है? माना जाता है कि अनुवाद में वह भावना नहीं आ पाती है। आपके अखबार में विचार के पेज की बात करें तो इसमें भी होगा कि अंग्रेजी से हिंदी में अनुवाद होगा, इस बारे में बताएं ?

हमारी कोशिश है कि हम हिंदी में ही लिखवाएं। हमारे साथ जितने भी ऐसे लोग जुड़े हैं, उनमें से अधिकतर हिंदी में लिखते हैं। हमारी कोशिश यही रहेगी कि अंग्रेजी में लिखकर हिंदी में अनुवाद करने वालों से दूर रहें। मैं अपने यहां लिखने के लिए नॉर्वे से लोगों को लेकर आ रहा हूं। नॉर्वे के प्रवीण झा हिंदी में हमारे लिए लिख रहे हैं। आप सोशल मीडिया पर देखिए तो सही, एक से एक ब्लॉगर्स और काम करने वाले भरे हुए हैं, लेकिन समस्या यह है कि संपादकों ने अपनी आंखों पर पट्टी बांध रखी है।

आजकल के समय में बड़े-बड़े मीडिया हाउस इंटीग्रेशन पर काम कर रहे हैं यानी हिंदी और अंग्रेजी को एक कर रहे हैं लेकिन आप हिंदी और अंग्रेजी को अलग कर रहे हैं। इंटीग्रेशन से रेवेन्यू के मामले में बहुत फायदा होता है, लेकिन आप ऐसा नहीं कर रहे हैं। आप अपने खर्च बढ़ा रहे हैं, आखिर इसकी क्या वजह है ?

ऐसी बात नहीं है। हमारा न्यूज रूम एक ही है। यही नहीं, दोनों के संपादक भी लगभग एक ही हैं। हिंदी के संपादक ही अंग्रेजी का पूरा काम भी देख रहे हैं। पंकज, अफसाना जैसे पत्रकार है, जो इटीग्रेशन का महत्व समझते हैं।

फेस्टिव सीजन में अखबारों में विज्ञापनों की जैकेटों की भरमार होती है, आप कम पेज के अखबार में कैसे इतने ऐड एडजस्ट करेंगे?

आप देखिए कि मेरे पास दो फ्रंट पेज हैं और दो लास्ट पेज हैं। मेरे पास दोनों अखबारों को मिलाकर पेजों की संख्या भी ज्यादा है। आज यदि कोई 16 या 20 पेज का भी अखबार है तो विज्ञापन तो शुरू के चार और आखिरी के चार पेजों में ही है। ऐसे में आप तो आठ पेज ही दे रहे हैं। ऐसे में मेरे पास तो काफी पेज हैं।    

 यह वो दौर है जब मीडिया की क्रेडिबिलिटी पर सवाल उठ रहे हैं। खासकर 2014 के बाद मीडिया की क्रेडिबिलिटी में काफी कमी आई है। ऐसे में आपने अखबार लॉन्च करने का साहस दिखाया है। कैसे आप इसे करेंगे। एक पत्रकार के रूप में आपको क्या लगता है?

 मैं मानता हूं कि ये वे दौर है कि जहाम मीडिया किी जिम्मेदारी ज्यादा बढ़ी है। किसी पत्रकार या एंकर का प्रवक्ता बन जाना बहुत खतरनाक होता है। इसके लिए हम एक कैंपेन भी लेकर आ रहे हैं। उसमें इस तरह की तमाम चीजें हैं। हम सभी लोगों को पत्रकारिता की शुचिता बनाए रखनी होगी। सभी मीडिया संस्थानों को भी नंबर गेम से बाहर निकलना होगा।

 ये तो रही प्रिंट की बात, डिजिटल पर आप क्या और कैसे काम शुरू कर रहे हैं ?

डिजिटल पर हमारा काम शुरू हो चुका है। वरिष्ठ पत्रकार प्रकाश हिन्दुस्तानी डिजिटल की टीम को देख रहे हैं। प्रकाश जी उन लोगों में से हैं, जिन्होंने वेबदुनियाडॉटकॉम को स्थापित किया था। आपको बता दूं कि हमारा अखबार ही शायद पहला ऐसा अखबार होगा, जिसका पहले दिन से ही ई-पेपर सबस्क्राइब करना ही होगा। हालांकि अभी इसे लेकर कीमत तय नहीं की गई है, लेकिन पहले दिन से ही इसके लिए भुगतान करना होगा। यह सिर्फ हमारे सबस्क्राइबर्स के लिए फ्री होगा, जिन्होंने एकमुश्त 3600 रुपए दिए हैं। सबस्क्राइबर्स की सुविधा को ध्यान में रखते हुए इसमें हम सिर्फ टॉप विज्ञापन ही देंगे। हम वॉट्सऐप एडिशन भी सिर्फ इसलिए दे रहे हैं, क्योंकि हम जनता तक पहुंचना चाहते हैं। आखिर महत्वपूर्ण खबरें सभी लोगों तक पहुंचनी चाहिए। यह फ्री भी होगा और इस पर सिर्फ तीन या चार खास खबरें ही दी जाएंगी।



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‘नेटफ्लिक्स’ और ‘हॉटस्टार’ जैसे प्लेटफॉर्म्स को रेगुलेट करने की मांग को लेकर क्या है आपका मानना?

सरकार को इस दिशा में तुरंत कदम उठाने चाहिए

इन पर अश्लील कंटेट प्रसारित करने के आरोप सही हैं

आज के दौर में ऐसे प्लेटफॉर्म्स को रेगुलेट करना बहुत मुश्किल है

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