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Interview: अकु श्रीवास्तव, संपादक, नवोदय टाइम्स से खास बातचीत...

Published At: Tuesday, 16 October, 2018 Last Modified: Monday, 22 October, 2018

‘पंजाब केसरी’ ग्रुप का हिंदी अखबार 'नवोदय टाइम्‍स' लगातार सफलता की सीढ़ियां चढ़ रहा है। इसके एडिटर अकु श्रीवास्तव किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। देश के बड़े पत्रकारों में उनकी गिनती होती है। बहुत कम समय में ‘नवोदय टाइम्स’ ने अपने आप को एक अच्छी स्थिति में स्थापित कर लिया है। अखवार का सफर कब और कैसे शुरू हुआ और बहुत कम समय में ही कैसे इसने इतनी सफलता हासिल की? भविष्य के लिए इस अखबार की क्या प्लानिंग है? इन्ही सब सवालों के लेकर 'समाचार4मीडिया' के डिप्‍टी एडिटर अभिषेक मेहरोत्रा ने अकु श्रीवास्तव से विस्तार से बातचीत की। प्रस्‍तुत हैं प्रमुख अंश :

सबसे पहले नवोदय टाइम्स के बारे में कुछ बताएं ? कैसे इसका सफर शुरू हुआ और अब तक यह कहां पहुंचा है ?

वर्ष 2013 में हमारे चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर विजय चोपड़ा, अमित चोपड़ा और अविनाश चोपड़ा जी ने इसकी कल्पना की थी कि दिल्ली के मार्केट में अभी भी ऐसे अखबार की जरूरत है, जो आम आदमी की सुनता हो, आम आदमी के लिए काम करता हो और राजनीति की नब्ज को ठीक से समझे और उसे कम्युनिकेट कर सके। हमारे आने से पहले तक यहां कम्युनिटी रिपोर्टिंग का कोई रास्ता नहीं नजर आ रहा था। हमने आने के बाद धीरे-धीरे बहुत सोच समझकर काम शुरू किया। आज आप देख ही रहे हैं कि पांच साल में हमने कितना विस्तार किया है। कई लोगों को तो पता ही नहीं चला कि अचानक हम कैसे इतना ऊपर आ गए।

सच कहूं तो पहले साल में हमने सर्कुलेशन पर कोई काम नहीं किया। दूसरे साल में भी सर्कुलेशन में ज्यादा काम नहीं किया। तीसरे साल में धीरे-धीरे हमने सर्कुलेशन के बारे में सोचना और इस पर काम करना शुरू किया और फिर धीरे-धीरे हमारी रफ्तार बढ़ती चली गई। हमारा जोर पूरी तरह से कंटेंट, डिजाइनिंग और लोकल कवरेज पर था। राजनीति में क्या हो रहा है? के साथ-साथ आगे क्या होने वाला है? इस पर भी हमारा जोर था। इसमें चूक भी होती है,  हमसे भी हुई होंगी,  लेकिन इसका एक फायदा ये हुआ कि हम जो काम करते थे,  हमारे प्रतिद्वंद्वियों ने उसे पकड़ने की कोशिश की।  इसमें वे कभी हमसे अच्छा,  कभी हमसे खराब और कभी हमारे बराबर करते थे। इससे एक स्वस्थ प्रतिद्वंद्विता बनी। उस स्वस्थ प्रतिद्वंद्विता की वजह से हम आज काफी अच्छे स्थान पर हैं और  उससे भी अच्छी बात है कि यहां के जो अन्य अखबार हैं, उन्होंने भी अपने आप को बदला और फाइन ट्यून किया, यह अपने आप में बहुत बड़ी बात है।

अपने बारे में थोड़ा बताएं। आपने किस तरह और कहां से पत्रकारिता की शुरुआत की। आपका सफर कैसा रहा और आज आप इस मुकाम पर पहुंचे हैं, इसके बारे में कुछ बताएं ?

यह एक लंबी यात्रा है। मेरी शुरुआत लखनऊ से हुई। जब मैं पढ़ता था, उसी दौरान पढ़ना-लिखना और कुछ सुनना इसी तरह की संगत में हम शामिल हो गए। हालांकि, उस समय यह अच्छी संगत नहीं मानी जाती थी। आपको शायद यकीन नहीं होगा कि यूनिवर्सिटी तक आते-आते उस समय क्षेत्र के जो सबसे बड़े अखबार हुआ करते थे,  उनमें मैं इतना छप गया था कि जब मैं यूनिवर्सिटी पहुंचा तो उस दौरान लखनऊ में ‘दैनिक जागरण’ आ रहा था। जब मेरी वहां पर ‘दैनिक जागरण’ के मालिक नरेंद्र मोहन जी से मुलाकात हुई तो उन्हें बस इतना बताना पड़ा कि मैं अकु श्रीवास्तव हूं। पहले तो वे चौंके और जो सज्जन मुझे उनसे मिलाने के लिए ले गए थे, उनसे कहा कि ठीक है, काम कराओ। उस समय नरेंद्र मोहन जी के साथ बस इतना सा परिचय हुआ। इसका बड़ा लाभ ये हुआ कि सीधे यूनिवर्सिटी की रिपोर्टिंग करने लगे। जब आप इतने कम समय में यूनिवर्सिटी जैसी जगह की रिपोर्टिंग करने लगते हैं तो कई बार पढ़ाई पर ज्यादा ध्यान नहीं रहता है। मेरा तो कम से कम नहीं रहा। मुझे बीए ऑनर्स करना था। यह तब की बात है जब ज्यादातर लोग बीए ऑनर्स नहीं करते थे। सामान्य बीए हुआ करता था दो साल का। साइकोलॉजी का मुझे चस्का था। मैथ मेरी ठीक-ठाक थी। उस समय साइकोलॉजी में एक सब्जेक्ट स्टेटस का हुआ करता था। मुझे अभी तक याद है कि मुझे 36 नंबर मिले थे पहले साल में 40 नंबर में से। यह एक अच्छी बात थी। साइकोलॉजी मुझे इसलिए अच्छी लगती थी कि इसमें समाज के बारे में जानने और उसके बारे में पढ़ने को मिलता था। उस समय मैं चार घंटे सिर्फ साइकोलॉजी की क्लास में दिया करता था। बाकी सब्जेक्ट्स जैसे हिंदी और पॉलिटिकल साइंस की क्लास भी हुआ करती थी तो मुझे नहीं लगता कि मैंने वह 10 प्रतिशत भी अटैंड की होंगी। इस तरह हमारा बीए ऑनर्स पूरा हुआ। उस समय होता यह था कि यदि आपको एमए करना है तो स्पेशल एमए करना पड़ेगा, लेकिन उस समय तक हम पत्रकारिता में इतने रम गए थे कि हिम्मत ही नहीं हुई, क्योंकि वहां पर बहुत समय देना पड़ता था, खासकर साइकोलॉजी जैसे विषय में,  इसलिए मैंने सामान्य रूप से सोशियोलॉजी में एडमिशन ले लिया। दैनिक जागरण की यात्रा अपने आप में अलग तरह की रही। वहां काफी काम सीखा।

शुरुआत में कितने समय तक आप दैनिक जागरण में रहे ?

यही कोई चार-साढ़े चार साल रहा होऊंगा,लखनऊ में। ‘दैनिक जागरण’ का वह दौर काफी क्रांति का दौर हुआ करता था। उस क्रांति के दौर में बहुत सी ऐसी चीजें हुईं,  जो नहीं होनी चाहिए थीं। लेकिन लखनऊ की पत्रकारिता की क्रांति का जो दौर था, वह काफी अद्भुत था। आज हम वो कल्पना भी नहीं कर सकते। 

उस दौर के अपने साथियों के बारे में कुछ बताएं ?

उस दौर में हमारे एक मित्र हुआ करते थे संजीव शुक्ला,  वह अभी, चंडीगढ़ में हैं। वीरेंद्र सक्सेना जी, चीफ इंफॉर्मेशन कमिश्नर होकर रिटायर हुए। एक ज्ञानेंद्र नाथ जी थे। वे बहुत ही शानदार व्यक्ति और शानदार दोस्त थे,  वह पटना चले गए और फिर वहां से अभी रिटायर हुए। सुकीर्ति श्रीवास्तव जी थे,  सुधांशु श्रीवास्तव जी थे। सुधांशु जी अभी हिंदुस्तान में हैं। पत्रकारिता में आने का श्रेय मैं उन्हीं को देता हूं,  क्योंकि उन्होंने ही मुझे सबसे पहले नरेंद्र मोहन जी से मिलवाया था। उसके बाद मैं ‘नवभारत टाइम्स’,  लखनऊ में आ गया। वहां प्रमोद जोशी,  नवीन जोशी, रामगोकृपाल जी,  नकवी जी और संतोष तिवारी जी थे। ये सब हमसे दो-चार साल बड़े थे और आज पत्रकारिता में सभी लोग इनका नाम बड़े सम्मान से लेते हैं। इनमें से कई लोग अभी भी बड़े-बड़े पदों पर हैं या रिटायर हो चुके हैं और लिखने-पढ़ने का काम अभी भी कर रहे हैं।

‘नवभारत टाइम्स’ के दौर में मैं बहुत लिखता था। मैंने ‘हिंदुस्तान’ के लिए इतना लिखा कि जितना पैसा मुझे ‘नवभारत टाइम्स’ से मिलता था उससे ज्यादा पैसा मैं ‘हिंदुस्तान’ से लेता था। यानी कह सकते हैं कि फ्रीलॉन्सिंग में मुझे ज्यादा पैसे मिलते थे लेकिन उसके लिए जूझना पड़ता था। ‘धर्मयुग’ से पैसा मिल जाता था। साप्ताहिक हिंदुस्तान बहुत पैसा देता था। ‘पंजाब केसरी’ के लिए भी लिखा। कहानी वगैरह का जो दौर था,  वह ‘पंजाब केसरी’ से ही शुरू हुआ। उस समय ‘पंजाब केसरी’ की बहुत लोकप्रियता थी। वहां पर पहला पन्ना कहानी और कविताओं से ही शुरू होता था। वो पहला अखबार था,  जो रंगीन हुआ करता था। मेरी कहानी ‘दायित्व बोध’ जब छपी थी तो मुझे याद है उस समय 70-80 चिट्ठी आई थीं मेरे पास। उन चिट्ठियों के जवाब में मुझे पारिश्रमिक भी मिला,  जो शायद उन दिनों आमतौर पर नहीं मिलता था। वो एक अलग तरह का दौर था, जिसमें खूब मेहनत करते थे। कई बार ऐसा होता था खासकर लखनऊ में तो,  क्योंकि उस समय कोरियर नहीं हुआ करता था। फैक्स भी ज्यादा चलन में नहीं था।साप्ताहिक हिंदुस्तान में तो कई बार एक-एक कवर इश्यू में मेरे दो-दो आर्टिकल हुआ करते थे।

उस जमाने में जब डाकू फूलन देवी आदि का दौर हुआ करता था, तब दिन भर रिपोर्टिंग करके रात भर लिखते थे। चाय के लिए एक भगोना रख लेते थे और उसी में चाय बनाकर पीते रहते थे। वो कोरियर का जमाना था नहीं, इसलिए लेख पहुंचाने के लिए सुबह सुबह गोमती एक्सप्रेस का सहारा लेते थे, जो सुबह करीब 5:30 बजे लखनऊ से चलती थी। ऐसे में हम स्टेशन चले जाते थे और वहां देखते रहते थे कि कोई ऐसा संगी साथी मिल जाए, कोई नेता मिल जाए या कोई विश्वसनीय व्यक्ति मिल जाए जो हमारा लेख वहां तक पहुंचा दे। ऐसा मैंने कई बार किया। कई बार ऐसा होता था कि कोई विश्वसनीय व्यक्ति नहीं मिलता था तो ऐसे में खुद ही चले जाते थे। 30-32 रुपए का टिकट होता था, घरवालों को भी ये अंदाजा हो गया था कि दोपहर तक यदि नहीं आया तो दिल्ली चला गया होगा। ऐसे में खुद दिल्ली आते थे और लेख देकर वापस चले जाते थे। वही ट्रेन वापस जाती थी,  बीच में दो-ढाई घंटे का समय होता था तो उसमें दिल्ली घूम लेते थे।

एक बड़ी मजेदार घटना है कि जब मैं पहली बार दिल्ली आया तो उस समय मनोहर श्याम जोशी जी एडिटर हुआ करते थे। मैं उनसे मिलने के लिए चला गया। उस समय तक मेरे सात-आठ आर्टिकल वहां छप चुके थे। मनोहर श्याम जोशी जी का व्यक्तित्व बहुत बड़ा था, जब उनसे कमरे में मिलने गए तो सेक्रेटरी ने नाम पूछा,  मैंने अपना नाम बता दिया।

जब मैं मनोहर श्याम जोशी जी के पास पहुंचा और उन्हें बताया कि मैं अकु श्रीवास्तव हूं तो उन्हें सहसा विश्वास नहीं हुआ। वे मुझसे बहुत प्रभावित हुए। इसके बाद उन्होंने मुझे चाय-नाश्ता भी करवाया,  तब से यह एक क्रम सा बन गया। जब साप्ताहिक हिंदुस्तान छूट भी गया तो उन्होंने मुझे अंग्रेजी में छापना शुरू कर दिया, यह एक बहुत बड़ा काम था। उसमें भी पैसा मिलता था। उसके बाद भी जितने संपादक वहां आए, 10-15 साल तक उनके साथ मेरा यह क्रम चलता रहा। मैं अक्सर एक शब्द इस्तेमाल करता हूं कि ‘हिन्दुस्तान’ के लिए मैंने ‘बोरों’ में या साधारण शब्दों में कहें तो बहुत ज्यादा लिखा है।

इसके बाद मैं लखनऊ ‘नवभारत टाइम्स’ छोड़कर ‘राजस्थान पत्रिका’ जयपुर में चला गया। वहां प्रकाश कोठारी जी ने मेरा इंटरव्यू लिया था। यहां कुछ समय बाद मुझे एडिट लिखने का काम सौंप दिया गया। उस समय तक मेरी शादी हो चुकी थी और मैं एक बच्चे का पिता भी बन चुका था लेकिन मैंने अपने परिवार को जयपुर शिफ्ट नहीं किया था। मैं सुबह आठ बजे ही दफ्तर पहुंचकर काम शुरू कर देता था। वहां सुबह करीब साढ़े दस बजे 'राजस्थान पत्रिका' के संस्थापक कर्पूरचंद्र कुलिश जी आ जाया करते थे। हफ्ते में तीन-चार दिन वहां पर भैरोंसिंह शेखावत जी भी आते थे। वहां चाय-नाश्ते के दौर के बीच काफी बातचीत होती थी। लेकिन जयपुर के पानी की वजह से मुझे पेट में कुछ समस्या हुई। इसके बाद मैं दिल्ली में प्रभाष जोशी जी के पास’चला आया। वहां से उन्होंने मुझे चंडीगढ़ भेज दिया। 1993 का यह वो दौर था, जब पंजाब में आतंकवाद धीर-धीरे कम हो रहा था। फिर चंडीगढ़ में जीवन के सात-आठ साल ‘एक्सप्रेस ग्रुप के साथ’ बहुत अच्छे से बीते। पंजाब से प्रेम की शुरुआत भी चंडीगढ़ से ही हुई। बीच में ‘जनसत्ता’ में मुझे विशेष प्रोजेक्ट के तहत मुंबई में काम करने का मौका मिला। वहां महीने भर काम करने के बाद मुझे रुकने के लिए कहा गया। लेकिन वहां मकान बहुत महंगे थे, इसलिए वहां से मैं वापस आ गया। चंडीगढ़ के बाद वर्ष 2000 में कोलकाता जाना पड़ा।

एक बात कहूं तो इस दौर में आगे बढ़ रहा था लेकिन परिवार पीछे छूट रहा था। उस समय बहुत दिक्कत होती थी। मुझसे ज्यादा दिक्कत मेरे परिवार को होती थी। अपने बच्चे को मैंने बढ़ते हुए नहीं देखा। कई बार हम पति-पत्नी ने सोचा कि बाहर जितनी तनख्वाह मिलती है, इतने में तो लखनऊ में ही कुछ कर सकते हैं फिर सोचते कि चलो यहीं ठीक है। पत्नी लगातार संबल देती रहीं और इस तरह माता-पिता के आशीर्वाद से चीजें चलती रहीं। कोलकाता में काम करने के दौरान ही मेरी मुलाकात अतुल माहेश्वरी जी से कराई गई। अतुल जी ‘अमर उजाला’ के मालिक तो थे ही, साथ ही वे एक आकर्षक व्यक्तित्व के स्वामी भी थे। उनसे बातचीत के बाद मैंने वर्ष 2000 में ‘अमर उजाला’ मेरठ में बतौर संपादक काम शुरू कर दिया। वर्ष 2000 के आखिर में शुरू हुई ये यात्रा 2008 तक चली। यहां मैं चार जगह- मेरठ, बनारस, जालंधर और इलाहाबाद का संपादक रहा। यहां काम करने के दौरान बहुत कुछ सीखने का मौका भी मिला। लेकिन कहते हैं कि हर यात्रा का अंत होता है, तो वर्ष 2008 में मैं ‘हिन्दुस्तान टाइम्स’ ग्रुप में आ गया। उस समय ‘हिन्दुस्तान’ चंडीगढ़ से निकलने वाला था। हालांकि वह कम समय का दौर था लेकिन वहां हमने काफी काम किया। इसके कुछ महीनों बाद ही मुझे पटना जैसे बड़े संस्करण का काम सौंपा गया, वहां 39 एडिशंस निकलते थे। नीतीश कुमार वहां पर मुख्यमंत्री थे, चीजें काफी बदलने लगी थीं। यहां काफी चुनौतियां थीं और काम करने के दौरान राजनीति का गंदा स्वरूप भी मुझे वहीं देखने को मिला। वहां हमने एक नए तरीके से पत्रकारिता करने की शुरुआत की। इस दौरान मुझे बहुत ज्यादा राजनीतिक दबाव का भी सामना करना पड़ता था। वहां तनाव बहुत होता था। कई तरह से धमकी भी मिलती थी। एक बार तो मुझे काट डालने की धमकी दी गई। यह मामला राजनीतिक रूप से काफी तूल पकड़ गया। जिसने ऐसा काम किया था, बाद में उस पर कानूनी कार्रवाई हुई और तीन-साढ़े तीन साल की सजा हुई। इस तरह की धमकियों के बावजूद मैं अपने हिसाब से अपना काम करता रहा। इसके बाद मेरा ट्रांसफर दिल्ली हो गया। यहां मेरे पास ज्यादा काम नहीं था, इसलिए मैंने यहां से जाने की सोच ली। इसके बाद अमित चोपड़ा जी से बातचीत हुई और मैंने नई मंजिल की शुरुआत कर दी।

दिल्ली जैसे मार्केट में नए अखबार को लॉन्च करना काफी बड़ी जिम्मेदारी होती है, फेल होने का रिस्क भी रहता है। ऐसे में तमाम सवाल आपके मन में होंगे, इन सबको आपने किस तरह से लिया और तय किया कि नया काम करना है ?

मुझे जीवन में रिस्क लेना अच्छा लगता रहा है। मुझे मेहनत करना आता है। आइडिया पर भी काम कर लेता हूं। मैंने कभी अपनी जरूरतें ज्यादा नहीं रखीं और न किसी खास विचारधारा का प्रवर्तक हूं तो फिर मुझे कभी खोने का डर नहीं लगा, तो फिर मैं क्यों परेशान होऊं।

दिल्ली में नवोदय टाइम्स ने काफी अच्छी पकड़ बना ली है और कुछ जमे-जमाए अखबारों पर काफी प्रभाव डाला है, आखिर इसके पीछे वो कौन से प्रमुख कारण हैं ?

पहले काफी सामान्य ढर्रे की पत्रकारिता होती रही है। लोगों को जो अच्छा लगना होता था, उस पर बहुत काम अखबार नहीं करते थे। हमने कम्युनिटी रिपोर्टिंग पर काम किया। उससे शुरुआत करने के बाद हमने फॉलोअप स्टोरी पर काम करना शुरू किया। कुछ स्टोरीज नए तरीके से प्लान कीं। इसके अलावा अखबार के ले-आउट पर बहुत काम किया, उसने हमें बहुत फायदा पहुंचाया।

वर्ष 2014 के बाद की बात करें तो पत्रकारिता दो खेमों में बंट गई है। आपकी नजर में ये पत्रकारिता का कौन सा दौर है, जहां पर खेमों में बंटकर पत्रकारिता होती है ?

यह स्थिति 2014 से नहीं, बल्कि 2011 के बाद से कह सकते हैं। सोशल मीडिया के दबाव ने मीडिया को बांटना शुरू कर दिया। हालांकि, ये चीजें पहले भी थीं लेकिन उजागर नहीं हुई थीं, लेकिन आज सब कुछ साफ-साफ उजागर हो गया है। आज अखबार तो इतने नहीं, लेकिन टीवी और वेबसाइट साफ-साफ खेमों में बंटे नजर आते हैं।  

आज के समय में एक चैनल कहता है कि देश में सबकुछ अच्छा चल रहा है जबकि दूसरा चैनल कहता है कि कुछ भी अच्छा नहीं है। ऐसे में लोग दुविधा में रहते हैं कि कौन सा चैनल सही बोल रहा है और वे कौन सा चैनल देखें ?

ये चैनलों में काफी होता है। मैं चैनलों पर जाता रहता हूं, तो वहां पर मुझसे पहले ही पूछ लिया जाता है कि आप भाजपा के समर्थन में बोलेंगे अथवा विरोध में। वहां मैं कहता हूं कि ऐसी बात करने का क्या फायदा, जो अच्छा है, वो अच्छा है और जो बुरा है, वो बुरा। कई बार तो मैं चैनलों में इस वजह से नहीं गया कि मुझे कहा गया कि या तो आपको इनके समर्थन में बोलना होगा अथवा विरोध में।

क्या आपको लगता है कि टीवी पत्रकारिता की वजह से मीडिया में हल्कापन आया है ?

नहीं, ऐसी बात नहीं है। ऐसा नहीं है कि टीवी सब चीजें खराब ही कर रहा है। टीवी कुछ चीजें ब्रेक भी कर रहा है। अखबार और पत्रकारों का काम सवाल पूछना होता है और वही करना चाहिए, न कि जांच आयोग की तरह काम करना चाहिए।

मीडिया में इतनी बड़ी संख्या में #Metoo के मामले नजर आ रहे हैं, क्या है आपका मानना?

एक जिम्मेदार पद पर होते हुए मैं ये स्वीकारता हूं कि मीडिया में इस तरह के कई मामले घटित हुए हैं और मेरा मानना है कि #Metoo मूवमेंट के जरिए कई शैतानों के चेहरे सामने आ रहे हैं। मुझे लगता है कि अगर तात्कालिक तौर पर इस अभियान का बड़ा असर नहीं दिखता है, तो भी भविष्य में ये अभियान एक बड़ा असर दिखाएगा।

आज का दौर डिजिटल मीडिया का दौर कहलाता है। इसमें डिजिटल मीडिया काफी तेजी से आगे बढ़ रहा है, इसका अखबार और मैगजींस पर क्या प्रभाव देखते हैं ?

आने वाला दौर डिजिटल का दौर है। मुझे हिंदी में प्रिंट पत्रकारिता के भविष्य पर अगले 10-12 वर्षों तक तो कोई संकट नजर नहीं आता है। लेकिन अंग्रेजी में धीरे-धीरे गिरावट हो रही है। कह सकते हैं कि आज के युवा वर्ग का रुझान अखबार की तरफ से हटकर डिजिटल की तरफ जा रहा है। लेकिन अखबार आज भी और कल भी बने रहेंगे। किसी भी घटना की पुष्टि करने के लिए अखबार ही काम आएगा। एक बहुत पुराना शेर है कि अखबार में पढ़ लेंगे कि कहां आग लगी थी... यानी अखबारों की क्रेडिबिलिटी ज्यादा है और यह बनी रहेगी।

कहा जाता है कि आजकल का जो दौर है, वह कहीं न कहीं 'अघोषित सेंसरशिप' का दौर है। इसको लेकर आप क्या महसूस करते हैं?

मैं इस बात को नहीं मानता हूं। थोड़े- बहुत दबाव हो सकते हैं। बिहार मैं जब मैं था तो वहां पर काफी दबाव होता था। यदि आप की रीढ़ की हड्डी मजबूत नहीं है तो आप साष्टांग प्रणाम करेंगे ही। सिर्फ राज्यसभा की एक कुर्सी के लिए कुछ मीडिया घरानों में यह स्थिति साफ दिखाई पड़ती है। 


आप लंबे समय से पत्रकारिता कर रहे हैं और सोशियोलॉजी के छात्र रहे हैं तो मैं ये जानना चाहता हूं कि राजीव गांधी, अटल बिहारी वाजपेयी जी और नरेंद्र मोदी के दौर को आप किस नजरिये से देखते हैं ?

जनता पार्टी के दौर की बात करें तो उसमें लोकतंत्र की एक नई खुली हवा थी, लेकिन वह सरकार चल इसलिए नहीं पाई कि क्योंकि उसमें आपसी मतभेद ज्यादा थे। इसके बाद इंदिरा गांधी का युग आया। पत्रकारिता के लिहाज से देखें तो उनकी सरकार सामान्य ढंग से चलती रहीं। राजीव गांधी के दौर की बात करें तो वहीं से तकनीकी क्रांति की शुरुआत हुई थी। वाजपेयी जी की बात करें तो उनके कार्यकाल में देश के लिए न्यूक्लियर टेस्ट जैसे बहुत काम हुए। लेकिन कई काम जैसे नदियों को जोड़ने की बात हो, इंफ्रॉस्ट्रक्चर को बढ़ाने की बात हो, वह सब काम अधूरे रह गए। शाइनिंग इंडिया से देश को कोई फायदा नहीं हुआ और देश दो हिस्सों में बंट गया। फिर यूपीए सरकार के दो दौर बहुत दबाव के दौर थे, लेकिन मनमोहन सिंह की सरकार को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। इसके बाद नरेंद्र मोदी और अमित शाह का दौर आया है। इस सरकार में हो तो बहुत अच्छा रहा है, लेकिन कई बार उसकी मॉनीटरिंग सही नहीं होती है। कह सकते हैं कि यह एनर्जेटिक गवर्मेंट है लेकिन इसे कहीं न कहीं अपनी परफॉर्मेंस दिखानी होगी।   

आजकल इस तरह के आरोप लगते हैं कि अखबार इन दिनों सोशल मीडिया, इंटरनेट मीडिया और टीवी के पिछलग्गू हो गए हैंसुबह जब अखबार देखो तो उसमें वही सब होता है जो आप रात को टीवी में देख चुके होते हैं, मोबाइल पर देख चुके होते हैं। एक अखबार के संपादक के तौर पर इस बारे में आपका क्या कहना है ?

मुझे लगता है कि ये बात तो कही जा सकती है, लेकिन ये सही नहीं है। अखबार बहुत ज्यादा स्थानीय है, अखबार में जो छप जाता है, उसे आप बदल नहीं सकते हैं। टीवी पर ऐसा नहीं होता है। मैं यह नहीं कह रहा हूं कि अखबार गलती नहीं करते हैं लेकिन टीवी के मुकाबले इसकी स्थिति अलग है। आजकल बेव पोर्टल अच्छा काम कर रहे हैं और मुझे उम्मीद है कि वे आगे भी करेंगे। रही बात टीआरपी की, तो आप इस नजरअंदाज नहीं कर सकते हैं।

 विडियो के जरिए यहां देखें इंटरव्यू- 

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सरकार को इस दिशा में तुरंत कदम उठाने चाहिए

इन पर अश्लील कंटेट प्रसारित करने के आरोप सही हैं

आज के दौर में ऐसे प्लेटफॉर्म्स को रेगुलेट करना बहुत मुश्किल है

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