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नौकरी जाने पर पत्रकारों को भी बेरोजगारी भत्ता मिलना चाहिए: केजी सुरेश, DG, IIMC

Saturday, 26 August, 2017

ईआईएमसी के डायरेक्टर जनरल केजी सुरेश खुद जमीन से जुड़े पत्रकार रहे हैं। आज पत्रकारिता के प्रमुख संस्थान के डीजी हैं जहां से प्रशिक्षण प्राप्त कर पत्रकार देशभर के मीडिया हाउसेस में काम कर रहे हैं। आज देश में मीडिया और पत्रकारिता किस दिशा में जा रहे हैं, क्या रंगरूप ले रहे हैं? मीडिया, पत्रकारिता और पत्रकारों से जुड़े कुछ करंट इश्यूज पर उनसे बातचीत कर जानने का प्रयास किया सीनियर जर्नलिस्ट नरेश तनेजा ने- 

आज पत्रकारिता की दिशा और दशा के बारे में क्या कहेंगे?

भारत में पत्रकारिता की यात्रा स्वतंत्रता-संग्राम से शुरू हुई थी। आज उसमें अनेक कमियां आ गई हैं। एक तरफ पेड-न्यूज है तो दूसरी तरफ राडिया-टेप-कांड जैसी घटनायें, जिनमें मीडियाकर्मी शामिल पाये जाते हैं। आज मीडिया पर तलवार लटकी हुई है। मीडिया का कॉर्पोरेटीकरण हो गया है। कुछ ही कंपनियों ने वेजबोर्ड का पालन किया है। कॉन्ट्रैक्ट-सिस्टम के कारण मीडिया के लोग मजबूर हैं, तनख्वाहें कम हैं। कई जगह मीडियाकर्मियों को विज्ञापन लाने और डील तक करवाने के लिए मजबूर किया जाता है। इससे पत्रकारिता की तटस्थता पर खतरा आ गया है। इसका एक कारण है कि पत्रकार खुद अपने हितों को लेकर एकजुट नहीं हैं। बंटे हुए हैं। खेमेबाजी व लामबंदी का शिकार हो रहे हैं। पहले वे सबसे समान दूरी बनाए रखते थे। पर, आज वे कुछ बिजनेस और राजनीतिक हितों को पूरा करते दिखाई देते हैं। राह भटक गए हैं। कुछ अच्छे लोग भी हैं पर, अपवादस्वरूप।

क्या इससे खबरों व मीडिया कंपनियों की विश्वसनीयता पर सवाल नहीं उठता ?

पहले लोग अखबार में छपे को वेदवाक्य मानते थे। पर, आज आम लोग मीडिया की खबरों पर सवाल उठाते हैं, आरोप लगाते हैं। पहले लोग देखते थे कि पत्रकार क्या लिख रहा है। अब देखते हैं कि क्यों लिख रहा है। शक करते हैं। यह ट्रस्ट-डेफिसिट है।

टीवी की न्यूज में इतना हो-हल्ला, शोर-शराबा। नेताओं की बाइट के पीछे भागना, फिर लड़वाना। विदेशी चैनलों में तो ऐसा देखने में नहीं आता। क्या यही न्यूज की प्रेजेंटेशन है?

शो बिजनेस की वजह से आज न्यूज एक तमाशा बन गई है जिसका मकसद है पब्लिक का एंटरटेनमेंट, एंटरटेनमेंट और सिर्फ एंटरटेनमेंट। टीवी वाले पॉलिटिक्स से ऑब्सेस्ड हैं। शाम छह बजते ही टीवी पर सूचना नहीं मनोरंजन की नौटंकी शुरू हो जाती है। देश-दुनिया में बहुत कुछ हो रहा है। पर, ग्रासरूट लेवल की पत्रकारिता हो कहां रही है। राष्ट्रीय मुद्दों को दरकिनार करके किसी एक ट्वीट या टिप्पणी को दिनभर चलाया जाता है। बयानबाजी की न्यूज ज्यादा है। हो-हल्ला करके आकर्षित करने की नीति होती है एंकर की। समाचारों के साथ चुपके से विचारों का मिश्रण कर दिया जाता है। कुछ लोग आज पत्रकार कम और एक्टिविस्ट ज्यादा नजर आने लगे हैं। लोग भी ऐसे प्रोग्रामों को गंभीरता से नहीं लेते। टाइमपास करने के लिए देख लेते हैं। मीडिया कंपनियों का अपना मकसद होता है। स्टूडियो में कुछेक गेस्ट को बुलाया चर्चा निपटा दी जाती है। रिपोर्टिंग में खर्च ज्यादा आता है, पैनल डिस्कशन सस्ते मे हो जाता है। विदेशी चैनलों पर आज भी ग्राउंड रिपोर्टिंग होती है।

रिपोर्टिंग के स्तर व उनकी भाषा का अक्सर लोग या फिर कॉमेडी सीरियलों में मजाक उड़ाया जा रहा है। खासकर किसी भी मौके पर पूछना- कैसा महसूस कर रहे हैं, जैसे जुमलों का...

यह प्रशिक्षण व तजुर्बेकार पत्रकारों की कमी की स्पष्ट निशानी है। गैर-तजुर्बेकार पत्रकार भेजकर मीडिया हाउस अपना मजाक उड़वा रहे हैं। जिम्मेदारी उन्हें दी जा रही है जिन्हें इतना तजुर्बा ही नहीं है। बड़ी जिम्मेदारियां तक ऐसे लोगों को मिल रही हैं।

आईआईएमसी के जरिये ज्यादा रिक्रूटमेंट नहीं हो पाती?

मैं इससे सहमत नहीं हूं। 2015-16 के दौरान ज्यादातर छात्रों का रिक्रूटमेंट हुआ। हां, 2016-17 कुछ कम हुआ। इसकी वजह आईआईएमसी की गुणवत्ता में कमी नहीं बल्कि इंडस्ट्री में अवसरों की संख्या में कमी होना है।

संस्थान के परिसर में हवन वगैरह आयोजित हुआ, आप पर आरोप लगे कि राइटिस्ट हैं?

मैंने संस्थान में हवन नहीं कराया। 20 मई, 2017 के लिए मीडियाकर्मियों की संस्था मीडिया स्कैन ने राष्ट्रीय पत्रकारिता पर सेमीनार के लिए जगह मांगी थी। हमने तो उन्हें बस जगह दी थी। वह भी तब जब संस्थान का सत्र समाप्त हो चुका था। कार्यक्रम में कुछ लोग दीप प्रज्जवलित करते हैं, कुछ सरस्वती पूजा। इस कार्यक्रम के आयोजकों ने इसकी जगह हवन करने का कार्यक्रम रखा था। मैं तो वहां गया ही नहीं। तो मुझ पर ये आरोप सही नहीं हैं।  

आज डिजिटल युग में प्रिंट अखबारों की संभावनाएं सिकुड़ नहीं गईं?

बेशक! पर, बावजूद इसके आज इंटरनेट देखने वाले हैं कितने। 30 प्रतिशत, बस। वह भी शहरों में। गांव-देहात में कितने लोग बोबाइल में अखबार देखते हैं। विश्व में चाहे अखबारों का सर्कुलेशन घटा हो पर, भारत में बढ़ रहा है। हो सकता है 10-15 साल बाद लोग इंटरनेट के जरिये अखबार पढ़ें पर, अखबार खत्म होने वाला नहीं है क्योंकि अखबार नवशिक्षितों के लिए सशक्तीकरण का एक प्रतीक है। अखबारों व टीवी को कॉन्टेंट के नए पहलुओं को सामने लाना होगा तभी लोगों की रूचि पैदा होगी।

पहले लोग फ्रंट-पेज शौक से पढ़ते थे। आज फ्रंट-पेज पर जैकेट और विज्ञापन ही विज्ञापन होते हैं तो फ्रंट-पेज की अहमियत इससे कम नहीं हो जाती?

आज सबको पता है कि बिजनेस चलाने के लिए यह करना पड़ता है। आज के दौर में अब विज्ञापन का बड़ा हिस्सा डिजिटल व टीवी ले जा रहे हैं तो ऐसे में प्रतियोगिता तो है पर, आपको अपना कॉन्टेंट जोरदार रखना होगा क्योंकि कॉन्टेंट इज द किंग। सबकुछ इस बात पर निर्भर करता है कि आपके कॉन्टेंट की क्वॉलिटी क्या है। आपकी न्यूज में है क्या?

आज ट्रेंड मीडियाकर्मियों की संख्या बढ़ रही है, पर नौकरियां कम हो रही हैं, क्या करें?

आज प्रशिक्षण के नाम पर दुकानें खुल गई हैं। बेहतर उम्मीदवार कम हैं। मार्केट बेस्ट मांगती है। उन्हें ही जॉब मिलेगी। फिर, जरूरी नहीं कि सभी को न्यूज क्षेत्र में ही जॉब मिले। एनिमेशन, विजुअल इफैक्ट्स, कॉमिक्स, गेमिंग आदि भी मीडिया की ही फील्ड हैं जहां बड़ी संख्या में लोगों की जरूरत है। तो मीडिया के नए आयाम भी खुल रहे हैं जहां जॉब के अवसर हैं।

इसी को देखते हुए आईआईएमसी मुम्बई के फिल्म सिटी, गोरेगांव में पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप में नेशनल सेंटर फॉर एक्सीलेंस इन एनीमेशन, विजुअल इफेक्ट्स, गेमिंग एंड कॉमिक्स स्थापित करने जा रही है।

जिस तरह मीडिया हाउस से लोग निकाले जा रहे हैं खासकर, एक्सपीरियंस्ड लोग, उससे नये लोग हतोत्साहित भी होते हैं और खबरों की विश्वसनीयता भी कम हो रही है?

उससे भी बड़ा खतरा है अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का। इन चैनलों या मीडिया हाउसेस के मालिकों पर जब सरकारी एजेंसियां शिकंजा कसती हैं तो मालिक अपनी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर तो हो-हल्ला मचाते हैं। पर, जब कॉन्ट्रेक्ट सिस्टम को आधार बनाकर अपने पत्रकारों व कर्मचारियों को रातोरात निकाल देते हैं तब अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता कहां खो जाती है। आज पत्रकारों की नौकरियां सुरक्षित नहीं हैं।

हर सरकार चुनाव में मीडिया के कंधों पर बैठकर आती है। पर, किसी ने भी कोई मीडिया सहायता कोष या फंड नहीं बनाया, जहां मुसीबत पड़ने पर मीडियाकर्मियों की सहायता की जा सके?

दो पहलू हैं। हम सरकार से लाभ लें, उस पर निर्भर रहें और यह भी चाहें कि हम स्वतंत्र बने रहें तो दोनों बातें एक साथ कैसे हो सकती हैं। आप फिर सरकार के खिलाफ कलम कैसे उठा सकेंगे?

मीडिया वेल्फेयर को लेकर लगभग हर सरकार उदासीन दिखाई देती है, ऐसा क्यों?

जर्नलिस्ट वेल्फेयर फंड अटलजी की सरकार के समय उस दौरान बनाया गया था जब सुषमा स्वराज सूचना व प्रसारण मंत्री थीं। आज उसकी क्या स्थिति है इस बारे में मुझे जानकारी नहीं है।

वैसे तो हर सरकार रोजगार देने को चिंतित दिखाई देती है। पर, इतने मीडिया वालों की नौकरी चली जाती है, लेकिन उनके रोजगार के कोई इंतजाम नहीं किए जाते हैं। उनके भी परिवार और जीवनयापन के खर्च हैं।

मेरा मानना है कि अगर ऐसा कोई फंड बने तो उसमें मीडिया इंडस्ट्री या मीडिया हाउसेस का योगदान भी होना चाहिए। सरकार को मीडिया कंपनियों के साथ मिलकर ऐसा करना चाहिए। जर्नलिस्ट वेल्फेयर फंड में कंपनी एक्ट में सीएसआर फंड का कानून लागू होना चाहिए। हां, एक बात और अगर बेरोजगारी भत्ता अन्य लोगों को मिलता है तो पत्रकारों को भी मिलना चाहिए। हमारे देश में बहुत से ऐसे मीडियाकर्मी हैं जिनकी नौकरी एकाएक किसी न किसी कारण से चली जाती है।


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