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Exclusive: जागरण प्रकाशन के MD महेंद्र मोहन गुप्‍त से खास बातचीत

Monday, 21 May, 2018

  

 


रुहैल अमीन व अभिषेक मेहरोत्रा ।।

इन दिनों डिजिटल का जमाना है। जिधर देखो डिजिटल की बात हो रही है, लेकिन इसके बावजूद देश में प्रिंट मीडिया भी मजबूती से अपनी जगह पर जमा हुआ है। एक ओर डिजिटल पर फेक न्‍यूज के मामले बढ़ते जा रहे हैं लेकिन प्रिंट ने पुराने जमाने की तरह अभी भी अपनी विश्‍वसनीयता बनाए रखी है।

ऐसी ही कुछ बातों को लेकर हमने 'जागरण प्रकाशन' (Jagran Prakashan) के चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्‍टर महेंद्र मोहन गुप्‍त से बातचीत की। इस बातचीत के दौरान हमने उनसे देश में प्रिंट की बढ़ोतरी से लेकर पत्रकारिता के क्षेत्र में आ रही चुनौतियों के साथ ही अखबारों की बढ़ती कीमतों को लेकर भी चर्चा की।

प्रस्‍तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश-  

दुनियाभर में प्रिंट की स्थिति ज्‍यादा अच्‍छी नहीं है और इसके ग्राफ में गिरावट आई है। हालांकि भारत में ऐसा नहीं है। लंबे समय तक प्रासंगिक बने रहने के लिए प्रिंट प्‍लेयर्स द्वारा किस तरह के कदम उठाए जा रहे हैं ?

यदि हम अपने देश में प्रिंट की बात करें तो पिछले कुछ वर्षों में अंग्रेजी न्‍यूज रीडरशिप घटी है। लंबे समय से इसमें बढ़ोतरी नहीं हो रही है। हालांकि, प्रादेशिक भाषा की रीडरशिप में बढ़ोतरी हो रही है। इसका कारण यह है कि भारत में अभी साक्षरता बढ़ रही है और यहां की अधिसंख्‍य आबादी हिन्‍दी भाषी क्षेत्रों में रहती है। मेरा मानना है कि अगले 15 वर्षों में क्षेत्रीय पत्रकारिता के कारण प्रिंट इसी तरह आगे बढ़ता रहेगा।      

आजकल डिजिटल और प्रिंट को लेकर देश में काफी बहस हो रही है, आप इसे किस रूप में देखते हैं ?

व्‍यक्तिगत रूप से मेरा मानना है कि डिजिटल कभी भी प्रिंट की जगह नहीं ले सकता है। किसी भी खबर के बारे में विस्‍तृत और ज्‍यादा विश्‍लेषणात्‍मक जानकारी देने के मामले में अखबार काफी महत्‍वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। डिजिटल सिर्फ जल्‍दी इनफॉर्मेशन देने के मामले में ठीक है। आप 'वॉट्सएप' को ही देख लें। यह भी डिजिटल मीडिया का ही एक हिस्‍सा है लेकिन इसने फेक न्‍यूज को लेकर लोगों की चिंताएं बढ़ा दी हैं। इस परिदृश्य को देखते हुए प्रिंट की प्रासंगिकता कभी भी खत्‍म होने वाली नहीं है।

पिछले दिनों 'इंडियन रीडरशिप सर्वे' (IRS) के डाटा आए थे। आपको क्‍या लगता है, ये परिणाम अपेक्षाओं के अनुरूप थे ?

बिल्‍कुल इसी तरह के परिणामों की उम्‍मीद थी। इसमें आश्‍चर्य करने वाली जैसी कोई बात नहीं है। पिछले 20 वर्षों से हमने मार्केट में अपनी लीडरशिप पोजीशन बनाई हुई है। इmसे पहले, डाटा में कुछ गड़बडि़यां थीं, लेकिन उसका हमारे ऊपर कोई प्रभाव नहीं पड़ा, क्‍योंकि हमारा रीडरशिप बेस बहुत ही अच्‍छा है। 

क्‍या मीडिया की स्‍वतंत्रता पर पाबंदी लगाने का कोई प्रयास किया जा रहा है?

मेरा मानना है कि कोई भी सरकार मीडिया को कंट्रोल नहीं कर सकती है। हालांकि हमेशा इसके लिए प्रयास जरूर किए जाते हैं, क्‍योंकि जो कोई भी सत्‍ता में होता है, वह अपने खिलाफ कोई भी न्‍यूज नहीं देखना चाहता है। मुझे नहीं लगता कि मीडिया को कंट्रोल किया जा सकता है। हम एक स्‍वतंत्र राष्‍ट्र हैं और आगे भी बने रहेंगे। 'जागरण' के बारे में मैं कह सकता हूं कि हम काफी खुले विचारों के हैं और किसी पार्टी का अखबार नहीं बन सकते हैं। हमारे लिए रीडरशिप के बहुत मायने हैं और यह सर्वोपरि है। हमें हमेशा अपने पाठकों के हितों की बात करते हैं। हम उनकी समस्‍याओं को दूर करना और उनकी जिंदगी को बेहतर बनाना चाहते हैं। मीडिया आलोचक का काम करती है और वह अपना काम कर रही है लेकिन इलेक्‍ट्रॉनिक मीडिया के बारे में मेरी राय थोड़ी अलग है। हमने एक बार टीवी वेंचर शुरू किया था लेकिन क्रेडिबिलिटी की वजह से इसे बेचना पड़ा। इलेक्‍ट्रॉनिक मीडिया की क्रेडिबिलिटी काफी कम हो गई है क्‍योंकि यह हर बात को बहुत ज्‍यादा बढ़ा-चढ़ाकर पेश करता है। राम रहीम से लेकर कई ऐसे मुद्दे हैं, जहां टीवी मीडिया ने तमाशा खड़ा किया है।  

कागजों की कीमतों में 15 से 18 प्रतिशत बढ़ोतरी हो रही है। इस स्थिति का सामना प्रकाशक किस तरह से कर रहे हैं ?

इस बारे में हम पहले से ही बातचीत कर रहे हैं। मेरा मानना है कि कीमतों में संशोधन कर या विज्ञापन की दरें बढ़ाकर इस स्थिति से निपटा जा सकता है।

आज वुमेन इकनॉमिक फोरम का हिस्सा बने हैं, इस फोरम के जरिए महिला अधिकारों को प्रमोट करने में कितनी मदद मिल रही है ?

निश्चित रूप में, यह काफी अच्‍छा अवसर है। इस तरह के आयोजनों से इन्‍हें प्रमोट करने में काफी मदद मिल रही है। इसके लिए इंडस्‍ट्री आगे बढ़ रही है और यह अच्‍छी बात है। 

जागरण समूह भी इस ओर काफी पहल कर रहा है। हम सात सरोकार अभियान चला रहे है, जिन पर लगातार हो रहा है। इसके अंतगर्त नारी सशक्तिकरण, स्‍वस्‍थ समाज, सुशिक्षित समाज, जल संरक्षण, पर्यावरण संरक्षण, जनसंख्‍या नियोजन और गरीबी उम्‍नूलन पर लगातार काम हो रहा है। दैनिक जागरण के सात सरोकारों में महिला सशक्‍तीकरण भी शामिल है। इस सरोकार के द्वारा महिलाओं के सशक्‍तीकरण के लिए तमाम तरह के काम किए जा रहे हैं। यह जागरण का प्रमुख सरोकार है।     

आजकल देखने में आ रहा है सोशल मीडिया आदि पर आने वाली खबरें पत्रकारिता के क्षेत्र में हावी हो रहा है। आजकल ट्विटर आदि का जमाना है, ऐसे में आपको क्‍या लगता है कि इस ट्रेंड का एडिटोरियल पर कितना असर पड़ रहा है ?

सोशल मीडिया पर फेक न्यूज का खतरा बना हुआ है। ऐसे में यहां चल रही खबरो को लेकर सावधानी बरतनी होती है। दैनिक जागरण में हम ऐसे प्लेटफॉर्म्स की खबर लेने से पहल उसे दूसरे स्रोतों से भी कंफर्म कर ते हैं।

आपको क्‍या लगता है कि डिजिटल का ये दौर कितना प्रासंगिक है?

डिजिटल प्रासंगिक रहेगा लेकिन यह चुनिंदा शहरों तक सीमित रहेगा। यदि हम दिल्‍ली-मुंबई आदि शहरों की बात करें तो डिजिटल का काफी प्रभाव है लेकिन सुदूर क्षेत्रों अथवा ग्रामीण क्षेत्रों मे अभी भी डिजिटल को लेकर तमाम समस्‍याएं बनी हुई हैं। इन क्षेत्रों के लोगों के लिए सबसे बड़ी बात स्‍थानीय भाषा में न्‍यूज प्राप्‍त करना होता है लेकिन डिजिटल में यह समस्‍या भी आड़े आती है। डिजिटल को स्‍थानीय भाषा में पकड़ बनाने में अभी काफी समय लगेगा।

यदि हम साहित्‍य की बात करें तो यह अखबारों की दुनिया से दूर हो गया था। जागरण के एक बड़े पैमाने ने साहित्‍य में बहुत सारा निवेश किया है। हिन्‍दी के हम के लिए आपने काफी बड़ा कैंपेन चलाया। इन सब के बारे में आपका क्‍या कहना है?

बहुत सी चीज आप जागरण में देख रहे हैं। सिर्फ साहित्‍य ही नहीं, लेखकों को आगे लाने के लिए हम बहुत काम कर रहे हैं। हम काफी व्‍यवावहारिक सोच को लेकर आगे बढ़ रहे हैं। जागरण में रोजाना आपको कोई न कोई एसा न्यूज आइटम जरूर मिलेगा कि कैसे दूर अथवा छोटे गांवों में रहने वाले आगे बढ़ रहे हैं। कैसे मेकिंग इंडिया का निर्माण हो रहा है और कैसे समाज के निर्माण में योगदान दिया जा रहा है। कुल मिलाकर आप कह सकते हैं कि हम देश के लोगों के विकास के लिए बहुत सारी चीजें करने का प्रयास कर रहे हैं।

 


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