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मीडिया और सरकार को आईना दिखाती है रवीश की ये रिपोर्ट...

Published At: Monday, 09 July, 2018 Last Modified: Monday, 09 July, 2018

समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।

एनडीटीवी इंडिया और रवीश कुमार पर भले ही सरकार विरोधी होने के आरोप लगते रहें, लेकिन दोनों ही बीच-बीच में ऐसे मुद्दों को उठाकर जनता के सामने रखते रहते हैं, जिन्हें संभवत: अनसुना कर दिया जाता है। रवीश कुमार ने हाल ही में यूपी के आजमगढ़ और गाजीपुर जिले से दिल्ली आए, उन लोगों की व्यथा को बयां किया जिन्हें सिस्टम कीड़े मकौड़े समझकर कुचलने पर अमादा है। ये लोग 900 किमी की रेलयात्रा करके दिल्ली इस उम्मीद में पहुंचे थे कि प्रधानमंत्री मोदी तक अपनी आवाज पहुंचा सकें। राजधानी के रामलीला मैदान में ये लोग चार दिनों तक बैठे रहे, लेकिन किसी ने इनकी सुध नहीं ली। भिकाईपुर, बबुरा गांव के इन 200 लोगों में 100 के करीब महिलाएं थीं और 70-80 के करीब ऐसे लोग थे, जिन्हें विकलांग से दिव्यांग तो बना दिया गया, लेकिन उनका हक उन्हें अब तक नहीं मिला है।

इन लोगों में से किसी को विधवा पेंशन तो किसी को विकलांग पेंशन नहीं मिल रही है, किसी के यहां शौचालय नहीं है, तो कोई राशन कार्ड के लिए भटक रहा है। बेहद अफसोस की बात है कि एनडीटीवी के अलावा इस खबर को किसी और मीडिया संस्थान ने उठाने की जहमत नहीं दिखाई, या अगर उठाई भी तो उसे प्रमुखता से दिखाया या छापा नहीं गया।

वैसे ये कोई पहला या आखिरी मौका नहीं है। इससे पहले भी ऐसा होता रहा है और आगे भी होता रहेगा। आज का मीडिया टीआरपी मीडिया बन गया है, उसे केवल वही खबर खबरनजर आती है, जो उसकी टीआरपी में इजाफा कर सके। दबे-कुचले और शोषित वर्ग की व्यथा को समझने और उसे हुक्मरानों तक पहुंचाने में उसे वो संतुष्टि नहीं मिलती, जो संजय दत्त की फिल्म पर दो घंटे के समर्पित एपिसोड दिखाने पर मिलती है।

रवीश कुमार की ये रिपोर्ट केवल मीडिया की भूमिका को ही कठघरे में खड़ा नहीं करती, बल्कि उन सरकारी दावों की असलियत को भी उजागर करती है जिसमें हर-घर, हर-गांव में शौचालय बनाने की बात कही गई है या हर विकलांगों... माफ कीजिए दिव्यंगों को उनका हक दिलाने की बात कही गई है।

विकलांग... से दिव्यांग बनने में जितना वक्त लगा, उतना ही वक्त अगर जरूरतमंद तक सुविधाएं पहुंचने में लगे, तो ये खबर है या नहीं? हक की मांग करने पर यदि सरकारी अधिकारी दुत्कार कर बाहर निकाल दें, तो ये खबर है या नहीं? इस सवाल का जवाब मीडिया को खुद से पूछना चाहिए।

रवीश कुमार ने अपनी रिपोर्ट में आजमगढ़ और गाजीपुर जिले के इन पीड़ितों की आवाज तो उठाई ही साथ ही यह भी बताने का प्रयास किया कि आज के वक़्त में धरना-प्रदर्शन क्यों जरूरी हो गया है। उन्होंने यहाँ तक कहा कि सरकार को धरने के लिए अतिरिक्त सुविधाएं देनी चाहिए, क्योंकि धरना-प्रदर्शन करके आम जनता एक तरह से लोकतंत्र पर अहसान करती है। 

रवीश ने एक सवाल यह भी उठाया कि जब दिल्ली के रामलीला मैदान पर धरने के लिए सरकार पांच हजार रुपए बतौर शुल्क लेती है, तो फिर धरना देने वालों को सुनने क्यों नहीं आती? क्यों एडीएम लेवल का कोई अधिकारी नियुक्त नहीं किया गया है? क्या पैसे लेने के बाद सरकार को सुनने की गारंटी नहीं देनी चाहिए? भले ही धरने के बाद पैसा वापस कर दिया जाता हो, लेकिन क्या सरकार का ये रवैया सूदखोर जैसा नहीं है? इस बात में कोई दोराय नहीं कि हर मीडिया संस्थान की अपनी प्राथमिकताएं होती हैं, लेकिन एक पत्रकार की पहली प्राथमिकता होती है ऐसे लोगों की आवाज बनना जो सिस्टम की चक्की में पिसकर अपनी आवाज गंवा चुके हैं। और ये कहना गलत नहीं होगा कि रवीश कुमार इस मामले में जब-तब खरे उतरते रहते हैं।

साथ ही रवीश ने सवाल उठाया कि पॉलिटिकल पार्टी और उसके नेता तो देश में कहीं भी धरना दे देते हैं, उनसे क्यों नहीं चार्ज किया जाता है?

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पोल

क्या इंडिया टीवी के चेयरमैन रजत शर्मा का क्रिकेट की दुनिया में जाना सही है?

हां, उम्मीद है कि वे वहां भी उल्लेखनीय कार्य कर सुधार करेंगे

नहीं, जिसका काम उसी को साजे। उनका कर्मक्षेत्र मीडिया ही है

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