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पुण्यतिथि विशेष: एक कथा के जरिए नेहरु जी को पीयूष बबेले ने किया याद...

Sunday, 27 May, 2018

पीयूष बबेले

वरिष्ठ पत्रकार ।।

आज नेहरु जी की पुण्यतिथि है तो एक कथा उनकी सुन लीजिए। बात तब की है जब नेहरू महात्मा गांधी के नए-नए शागिर्द बने थे। उम्र कोई 20 साल की रही होगी। गांधी का हुकुम था, पहले जमीन को जांचो, देश को घुमो, लोगों से हिलो मिलो। देश के नामी बड़े वकील के बेटे, आनंद भवन में पले बढ़े नेहरू सब भूल कर बापू का हुकुम बजाने में लग गए।

पहला काम तो उन्होंने यह किया कि तीसरे दर्जे के डिब्बे में सफर करने लगे। दूसरा काम यह किया कि हाईजीन वाला खाना छोड़कर, चना चबेना खाने लगे। जब कई दिनों तक ऐसा चलता रहा और बात मोतीलाल जी तक पहुंची, तो उन्हें बड़ी फिक्र हुई कि कहीं देश के लिए काम करने से पहले ही लड़के की हालत ढीली ना हो जाए। किससे शिकायत करते? लड़के से सीधा कहना बेकार था, तो सीधे अपने दोस्त मोहनदास करमचंद गांधी के पास ही पहुंचे। उन्होंने मोहन से कहा, राष्ट्र सेवा से उन्हें कोई एतराज नहीं। जवाहर भी करें और जो हो सके वह खुद भी करें। लेकिन इसके लिए तीसरे डब्बे में चलना और बंदरों की तरह मूंगफली खाना क्या जरूरी है।

उन्होंने मोहन से कहा हो सके तो जवाहर को समझाओ कि देश की लिए काम करें। खामखा की समस्या ना पालें। गांधी जी ने कहा ठीक है मैं बात करूंगा। जब अगली बार नेहरु बापू से मिले तो बापू ने इतना ही कहा कांग्रेस का जो काम करना है करो, लेकिन ऐसा मत करो कि तुम्हारे बाप की आत्मा को कष्ट पहुंचे। गांधी जी ने पूरी बात विस्तार से नहीं कही, नेहरू ने भी सुनकर अनसुना कर दिया, मोतीलाल ने भी दोबारा नहीं कहा। बाद में दोनों बाप बेटे एक साथ जेल गए।


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