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पुस्तक मेला: ऐसा स्टाल जो एक खांटी, ईमानदार पत्रकार और संपादक का है...

Friday, 12 January, 2018

संजय श्रीवास्तव

वरिष्ठ पत्रकार ।।

ये 90 के दशक के आखिर की बात है। एक कविता संग्रह प्रकाशित होकर आया, "वेरा उन सपनों की कथा कहो"। आते ही हाथों हाथ ले लिया गया। आमतौर पर कविता संग्रह पाठकों में कम लोकप्रिय होते हैं। लेकिन ये अपनी मैच्योर, अनूठी और अलग धरातल पर लिखी गईं प्रेम कविताओं के कारण खूब पसंद किया गया। अब भी किया जाता है।

इन कविताओं पर मंत्रमुग्ध होकर इसकी तारीफ करने वाले आज भी खूब मिलेंगे। हालांकि ये किताब केवल कंटेंट नहीं बल्कि अपने प्रोडक्शन, कवर और डिजाइन में भी बेहतरीन थी। इसे छापा गया था पीएफ से पैसा निकालकर। इसके साथ ही शुरुआत हुई संवाद प्रकाशन की। इसके एक-दो साल बाद कुछ और किताबें आईं। तंग अर्थतंत्र और सीमित संसाधनों में इनके प्रकाशन के पीछे आलोक श्रीवास्तव की दृढ़ इच्छाशक्ति ही काम कर रही थी।

किसी किताब के प्रकाशन की प्रक्रिया में उसकी विषय वस्तु, भाषा, डिजाइन, छपाई, पाठकों की पंसद, राइट्स, वितरण, बिक्री और संवाद आदि बहुत कुछ से गुजरना होता है। शुरुआती किताबें विश्व साहित्य से जुड़े विश्व प्रसिद्ध लेखकों की ऐसी किताबें थीं, जिनकी ओर हिन्दी के बड़े प्रकाशकों का ध्यान ही नहीं था। 90 के दशक के आखिर या वर्ष 2000 में जब आलोक श्रीवास्तव ने अपनी छह-आठ किताबों के साथ वर्ल्ड बुक फेयर में एक स्टैंडिंग स्टाल लिया तो हम सभी के लिए हैरानी की बात थी। बड़े-बड़े प्रकाशकों की किताबों की तुलना में ये छह-आठ किताबें खूब बिकीं। सिमोन द बोउवार, इजाडोरा डंकन और विश्व साहित्य पर प्रकाशित किताबें तो हिट नहीं बल्कि सुपर हिट साबित हुईं।

बेहद सस्ते दामों पर उम्दा प्रॉडक्शन। बड़े प्रकाशक दंग थे कि ये क्या हो रहा है। उसके बाद हर वर्ल्ड बुक फेयर में किताबें बढ़ती रहीं। स्टॉल का आकार भी। साथ ही किताबों को पसंद करने वाले प्रतिबद्ध पाठक भी। कौन कह सकता है कि पीएफ के पैसों से प्रकाशित एक किताब से शुरू हुआ संवाद प्रकाशन अब 300 से ज्यादा किताबें प्रकाशित कर चुका है। ये ऐसा प्रकाशन भी है, जहां न पीढ़ियों से कोई किताब के व्यावसाय में थे और न ही किसी पूंजी या आर्थिक तंत्र का आधार। था तो बस केवल एक निम्न मध्यम वर्गीय पृष्ठभूमि के एक युवक का सपना और खुद पर आत्मविश्वास, साथ ही हिन्दी पाठकों के लिए नया संसार पेश करने की ललक और विजन।

आलोक आईआईएमसी से पढे और फिर धर्मयुग से करियर की शुरुआत की। इसी दौरान संवाद प्रकाशन का सपना देखा। इसे बेहद सीमित साधनों से पूरा करने में जुट गए। इसमें कोई शक नहीं कि दुनिया के जितने भी प्रसिद्ध लेखकों, कवियों और अपने जीवट से नए आसमां को छूने वाली शख्सियतों को हिन्दी के पाठक अपनी भाषा में पढना चाहते थे, उसे समेटकर संवाद प्रकाशन ने पहली बार पेश करना शुरू किया। कहना नहीं होगा इसे देखकर दूसरे हिन्दी के प्रकाशन भी बदले। अब हिन्दी पाठकों के लिए संवाद प्रकाशन जाना पहचाना नाम है। कुछ समय के लिए जब आलोक "अहा! जिंदगी" पत्रिका के संपादक बने तो उसे भी नई ऊंचाइय़ों पर पहुंचाया। यद्यपि उससे संवाद की गति थोड़ी धीमी जरूर पड़ी लेकिन अच्छी बात है कि संवाद अब फिर वर्ल्ड बुक फेयर में मौजूद है। पाठक उसे पसंद कर रहे हैं। शायद ये वर्ल्ड बुक फेयर का अकेला स्टाल भी होगा, जो एक खांटी, ईमानदार पत्रकार और संपादक का है... संवाद बढता रहे... कारवां चलता रहे। 

(साभार: फेसबुक वॉल से)


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