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वरिष्ठ पत्रकार गीता श्री के पिता का हुआ निधन...

Thursday, 08 February, 2018

समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।

जानी-मानी वरिष्ठ पत्रकार व साहित्यकार गीता श्री के पिता उमाकांत शर्मा का दो दिन पहले निधन हो गया। वे 92 साल के थे और कुछ दिनों पटना के एक अस्पताल के आईसीयू में थे। लगभग तीस पहले वे पुलिस विभाग से रिटायर हुए थे। वे अपने 6 बेटे-बेटियों का भरा पूरा परिवार छोड़ गए हैं।

पिता को भावभीनी श्रृद्धांजलि देते हुए उन्होंने फेसबुक पर पोस्ट के जरिए उनके साथ बिताए कुछ पलों को यादों किया है, जिसे आप यहां पढ़ सकते हैं-    

दरवाज़े की तरफ देख रही हूं... सन्नाटा पसरा हुआ है। दो दिन पहले मेरे पिता यहां से हमेशा के लिए चले गए। उनका मोबाइल शांत पड़ा है। रह-रह कर मैसेज की रोशनी चमकती हैबेआवाज। मुझसे लिखा नहीं जा रहा। आंखें बरस कर सूख चुकी हैं। माहौल धीरे धीरे सामान्य हो रहा है। सबलोग हैंबस वो नहीं हैं जिनकी वजह से मैं हूं। सब हैं। 
वह 92 बरस के युवा थे जो हर समय अति उत्साह में और उत्सवी मूड में रहते थे। छोटी-छोटी बातों पर वो जी भर के खिलखिला पड़ते थे। सेंस ऑफ़ हयूमर गजब का। वे एक समूचा घर थेनहीं रहे।

वह पलंग खाली है जहां कुछ दिन पहले बैठ कर गप्पें मारा करते थे। वह सोफ़ा खाली है जहां रोज सुबह बैठ कर अखबार की हर छोटी खबर बांचा करते थे। मेरे लिए क़िस्सों का खान थे बाबूजीपूरा लोक थे जो मेरे सामने अचरज की तरह खुलते थे मेरे पहले हीरो... गोरे चिट्टेक़द्दावर बाबूजी.. उनकी चिकनी गोरी पीठ पर बचपन में पाउडर मलते मलते सेव की तरह दांत गड़ा देती थी... वे प्यार से बांहों में भर लेते थे। दिन भर की मेरी शरारतों के बाद मां के क़हर से मेरा बचाव थे मेरे बाबूजी।

उनका ओवरकोट में मेरे छुपने की सबसे प्रिय जगह होती थी। मां ढूंढती थी मेरी पिटाई के लिए। बाबूजी नकार जाते कि उन्होंने मुझे देखा है कहीं। देर तक उनके पैरों से लिपटी लिपटी मैं बाहर की आवाज़ों का मज़ा लेती। फिर बाबूजी मां का ग़ुस्सा शांत करते और मुझे ओवरकोट के अंधेरे से बाहर निकालते। 

सबसे छोटी और लाडली... शरारती नंबर वन। बिगड़ैल शब्द मेरे लिए ही बना होगा। सामंतों के गढ़ में लड़की जात होते हुए भी आज़ाद फिरा करती थी। किसके दम परबाबूजी से मिलने आए आगंतुको की साइकिलें चुरा कर गायब हो जाती थी। सब परेशान.. साइकिल नहीं मिल रही। फिर बाबूजी मुझे खोजवाते- जहां होगी गीतावही साइकिल भी। मैं थोड़ी देर में साइकिल तोड़ कर बिसूरती हुई आतीघुटने छिले हुए। 

जिसकी साइकिल होती वो कलपता रह जाता। बाबूजी उसकी साइकिल बनवाने का इंतज़ाम करते और मुझे मां की डांट और मार से बचाते। ये हरकत कभी नहीं थमी। तब क़स्बों में लडकियां साइकिल नहीं चलाती थीं। शहरों में एकाध लडकियां चलाती हुई दिखती थीं। मुझे बहुत शौक था। जिसकी हाथ लग जाए उसका कल्याण। बिना कुछ तोड़े कभी वापस नहीं। चोट रोज लगती और इस तरह चोट खाने और सहने की आदत पड़ गई। और चोट भी सबसे छुपाने की आदत पड़ गई थी। आज भी क़ायम है।

बहुत दुख में शब्द भी साथ छोड़ जाते हैं। कुछ अपनों की तरह जो सिर्फ सुख में दिखाई देते हैं। वे दुख में शब्द की तरह हो जाते हैं।

बाबूजी !! मैं क्या करुं अब !!



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पोल

क्या इंडिया टीवी के चेयरमैन रजत शर्मा का क्रिकेट की दुनिया में जाना सही है?

हां, उम्मीद है कि वे वहां भी उल्लेखनीय कार्य कर सुधार करेंगे

नहीं, जिसका काम उसी को साजे। उनका कर्मक्षेत्र मीडिया ही है

बड़े लोगों की बातें, बड़े ही जाने, हम तो सिर्फ चुप्पी साधे

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