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हिंदी पत्रकारिता में महिला पत्रकारों की चुनौतियों पर बोलीं चित्रा त्रिपाठी

Wednesday, 30 May, 2018

चित्रा त्रिपाठी

टीवी एंकर ।।

हिंदी पत्रकारिता में, चाहे वो प्रिंट मीडिया हो या इलेक्ट्रॉनिक, दोनों ही क्षेत्रों में पिछले कुछ समय में महिला पत्रकारों की संख्या में इजाफा देखने को मिला है, हालांकि अब भी दिल्ली और मुंबई जैसे शहरों के बाहर पत्रकारों की बिरादरी में महिलाओं की भागीदारी बहुत कम है। मीडिया ऐसा क्षेत्र है, जहां आपको वक्त-बेवक्त कभी भी, कहीं भी आने-जाने के लिए तैयार रहना होता है। बड़ी खबरें रात के 12 बजे आए या दो बजे, कवर करना ही होगा। घर और परिवार की जिम्मेदारी संभालते हुए ऐसा कर पाना कई बार बहुत मुश्किल हो जाता है।

पत्रकारिता के क्षेत्र में काम कर रही लड़कियों और महिलाओं की कुछ समस्यायें तो ऐसी होती हैं जो किसी भी दूसरे क्षेत्र में काम करते हुए उन्हें पेश नहीं आती हैं। लेकिन फिर भी मीडिया के क्षेत्र में महिलाएं पुरुषों का वर्चस्व तोड़ रही हैं। वहीं व्यावसायिक शिक्षा प्राप्त महिलाओं के काम का दायरा बहुत बढ़ा है, लेकिन कामयाबी के बावजूद कई महिलाओं को परिवार से जो सहयोग मिलना चाहिए, वह नहीं मिल पाता।

खाना बनाना और बच्चों की देखभाल अभी भी महिलाओं का ही काम माना जाता है। यानी अब महिलाओं को दोहरी जिम्मेदारी निभानी पड़ रही है। घरेलू महिलाओं की तुलना में कामकाजी महिलाओं पर काम का बोझ ज्यादा है। इन महिलाओं को अपने कार्यक्षेत्र और घर, दोनों को संभालने के लिए ज्यादा मेहनत करनी पड़ रही है। घर और ऑफिस के बीच सामंजस्य बिठाने में दिक्कत होने पर कई बार महिलाओं को ही ये कहा जाता है कि वो अपनी पेशेवर हसरतों की कुर्बानी दे दें।

एसोचैम का सर्वे कहता है कि मां बनने के बाद 40 फीसदी महिलाओं को नौकरी छोड़ देनी पड़ती है। बहुत सी महिला पत्रकारों के बारे में भी ये बात सच साबित होती है। हिंदी पत्रकारिता और महिला पत्रकारों की चुनौतियों के बीच बदलाव सुखद हो तो आनंद का एहसास किसे नहीं होता। आजकल हाईस्कूल से लेकर आईएएस जैसी परीक्षाओं तक लड़कियां केवल सफलता के झंडे ही नहीं गाड़ रहीं, टॉप कर रही हैं। छोटे शहरों से लेकर महानगरों तक, कहीं भी आप किसी कोचिंग के बाहर खड़े हो जायें, आपको बड़ी संख्या में लड़कियां आती-जाती मिल जायेंगी, कई जगहों पर तो ये संख्या लड़कों के मुकाबले ज्यादा भी होती है।

बेवजह की दखलंदाजी, टोका-टाकी से मुक्ति पाकर जिस भी लड़की को कुछ अलग करने का मौका मिल रहा है, वो अपनी मेहनत और काबिलियत की छाप छोड़ रही हैं। यही बात पत्रकारिता के क्षेत्र में भी लागू होती है और बेटियां पूरी शिद्दत से इसे निभा भी रही हैं।

हालांकि ऐसा नहीं है कि सब कुछ अच्छा ही है, चुनौतियां खत्म हो गई हैं।  सच्चाई तो यही है कि आज भी एक लड़के के मुकाबले लड़कियों को कहीं ज्यादा मुश्किलों का सामना करना पड़ता है, उसे कम करके आंका जाता है। बार-बार उसे लड़की होने की दुहाई दी दाती है। लड़कियों के लिए चुनौतियां तो पिता के घर से ही शुरू हो जाती हैं।

परंपरागत भारतीय समाज में लड़कों को उनकी इच्छा के मुताबिक पढ़ने, घूमने, करियर के लिए कोई विकल्प चुनने जैसे मामलों में आजादी हासिल होती है जबकि लड़कियों को इनमें से हर एक मामले में कई तरह की दखलंदाजी और पाबंदियों से दो-चार होना पड़ता है। कड़ी मेहनत करने के बाद जब आप एक प्रोफेशनल के तौर पर काम करना शुरू कर देते हैं तब भी मुश्किलें कम नहीं होतीं, हां ये जरूर है कि जीवन के इस पड़ाव पर मुश्किलों के रंग-रूप कुछ बदल जाते हैं। हालांकि महिलाओं की काबिलियत पर सवाल करने का दुस्साहस अब अगर कोई करता है तो उसे जवाब भी उसी अंदाज में बेटियां दे रही हैं, लेकिन कई बार अहम जिम्मेदारियां महिलाओं को देने में संकोच जरूर किया जाता है।

कार्यस्थल पर छेड़छाड़ या अमर्यादित व्यवहार का शिकार भी कई बार लड़कियों को होना पड़ता है हालांकि अब इस तरह की हरकतों के खिलाफ वो मुखर हो रही हैं, अपनी आवाज उठा रही हैं। कुल मिलाकर, समस्याएं कई हैं, लेकिन कोई ऐसी समस्या नहीं होती जिसका समाधान ना हो। और इस ओर रास्ता खुद लड़किया बना रही हैं। हिंदी पत्रकारिता का स्वर्ण युग आना बाकी है लेकिन यकीन मानिए बिना बेटियों के ये असंभव होगा।

 

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