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पढ़िए, चुनावी मौसम में कैसे फेल हुई इस अख़बार की रणनीति...

Published At: Saturday, 01 December, 2018 Last Modified: Tuesday, 04 December, 2018

समाचार4मीडिया ब्यूरो ।। 

कहते हैं अतिसक्रियता कभी-कभी नुकसानदेह भी होती है। मध्यप्रदेश से प्रकाशित होने वाले एक प्रमुख अख़बार को अब यह समझ आ गया होगा। चुनावी मौसम में ज्यादा से ज्यादा कमाई के लिए अख़बार प्रबंधन द्वारा बनाई गई रणनीति ऐन मौके पर गलत साबित हो गई और इसका फायदा प्रतिद्वंद्वी मीडिया संस्थान को मिल गया।

वैसे तो प्रदेश में कई अख़बार हैं, लेकिन असली मुकाबला दो बड़े प्रिंट प्लेयर्स के बीच ही रहता है। विधानसभा चुनाव को देखते हुए दोनों अख़बारों ने ख़ास तैयारी की थी। आमतौर पर चुनावी आहट के साथ ही अख़बारों में सियासी रंग घुल जाता है, भूतकाल-भविष्य की राजनीति से जुड़ी हर खबर अख़बारों में नज़र आने लगती है और जब फैसले का दिन यानी वोटिंग का समय नज़दीक आता है तो कई पेज राजनीति को समर्पित कर दिए जाते हैं। ऐसा दो कारणों से किया जाता है, पहला- पाठकों को जागरूक करना और दूसरा- प्रत्याशियों की जेब ढीली करवाना, जिसे हम 'पेड न्यूज़' भी कह सकते हैं।       

अपने प्रतिद्वंद्वी से दो कदम आगे चलने के लिए इस अख़बार ने काफी पहले से ही फुलपेज कवरेज देना शुरू कर दिया। प्रत्याशियों से जुड़ी हर छोटी-बड़ी जानकारी प्रकाशित की गई। अख़बार को उम्मीद थी कि अपनी कवरेज देखकर राजनीतिक दलों के प्रत्याशी खुद ब खुद उसके कार्यालय चले आएंगे और इस तरह वो कमाई के पिछले रिकॉर्ड तोड़ देगा। लेकिन ऐसा हुआ नहीं, जब तक प्रत्याशी अपने पक्ष में माहौल की चिंता में पेड न्यूज़ का फैसला लेते, तब तक जनता उनके बारे में अच्छा-बुरा सबकुछ जान चुकी थी। अपनी रणनीति को यूं फेल होते देख अख़बार ने संबंधित प्रत्याशियों को आमंत्रित भी किया, लेकिन बार-बार बुलाने के बाद भी वो नहीं पहुंचे। अख़बार प्रबंधन को सबसे ज्यादा निराश भोपाल की नरेला विधानसभा सीट से मैदान में उतरे एक उम्मीदवार ने दी। इस उम्मीदवार के लिए प्रसिद्ध है कि वो चुनावी मौसम में मीडिया पर धनवर्षा करने में कंजूसी नहीं करता। इसी उम्मीद में अख़बार लगातार उनसे जुड़ी ख़बरें प्रकाशित किया जा रहा था, मगर अतिसक्रियता या कहें कि उतावलेपन में उसके हाथ से कमाई का मौका चला गया।  

प्रबंधन के लिए इससे भी ज्यादा बुरी बात ये रही कि उक्त प्रत्याशी ने प्रतिद्वंद्वी अख़बार को अपने बारे में छापने के लिए एक बड़ा पैकेज दे दिया। जब प्रबंधन का कोई फैसला गलत हो जाता है, तो इसका खामियाजा सभी को भुगतना पड़ता है फिर भले ही उनका प्रत्यक्ष तौर पर इससे कोई जुड़ाव न हो। यहां भी ऐसा ही हुआ। वरिष्ठ पत्रकारों से सवाल जवाब किए गए कि आखिर उक्त उम्मीदवार को साधने में वो नाकाम कैसे रहे? वैसे संपादकीय विभाग के कुछ वरिष्ठ सहयोगियों ने समूह संपादक को इतनी जल्दी फुलपेज कवरेज शुरू न करने की सलाह भी दी थी, लेकिन उसे अनसुना कर दिया गया। संपादक महोदय और अख़बार प्रबंधन जहां अपनी रणनीति के गलत साबित होने पर आत्ममंथन में जुटे हैं।    

 



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