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TRP के उलझे सवालों का जवाब है ये किताब, मीडिया दिग्गजों ने TRP पर की अहम चर्चा

Published At: Wednesday, 05 December, 2018 Last Modified: Thursday, 06 December, 2018

समाचार4मीडिया ब्यूरो।।

आजकल लगभग सभी टीवी चैनल टीआरपी के फेर में फंसे हुए हैं। टीआरपी किस तरह से इन चैनलों को प्रभावित करती है और इसके लिए ये टीवी चैनल क्या-क्या नहीं करते, इन्हीं सब बातों को समेटते हुए ‘सेंटर फॉर मीडिया स्टडीज’ (CMS) के फाउंडर चेयरमैन डॉ. एन भास्कर राव ने ‘TRP Trick: How Television in India was hijacked' नाम से किताब लिखी है।   

‘प्रसार भारती’ के चेयरमैन डॉ. सूर्य प्रकाश ने चार दिसंबर को दिल्ली के कांस्टीट्यूशन क्लब में आयोजित एक समारोह में इस किताब को लॉन्च किया। डिस्कवरी चैनल के पूर्व सीईओ किरण कार्निक ने किताब के बारे में संक्षिप्त परिचय दिया। किताब की लॉन्चिंग के बाद एक पैनल डिस्कशन का आयोजन भी किया गया।      

पैनल डिस्कशन का टॉपिक ‘Rejuvenating Indian Television’ रखा गया था। पैनल में ‘ZEE Media’ (news) के मैनेजिंग डायरेक्टर अशोक वेंकटरमणी, ‘BAG Network’ की चेयरपर्सन अनुराधा प्रसाद, वरिष्ठ पत्रकार और पद्मश्री आलोक मेहता, ‘TRAI’ के सेक्रेटरी सुनील गुप्ता और ‘भारतीय जनसंचार संस्थान’ (IIMC)  के डायरेक्टर जनरल केजी सुरेश शामिल रहे।


इस सेशन को ‘सीएमएस’ की डायरेक्टर जनरल पीएन वासंती ने मॉडरेट किया। इस दौरान उन्होंने यह मुद्दा भी उठाया कि टीवी के जरिये किस तरह समाज और संस्कृति को और प्रभावी बनाया जा सकता है। उन्होंने जानना चाहा कि टीवी की तुलना में विडियो, डिजिटल, मोबाइल और यूट्यूब आदि पर कटेंट की मांग तेजी से बढ़ रही है, ऐसे में टीवी इंडस्ट्री में बिजनेस और कंटेंट दोनों पर किस तरीके से ध्यान दिया जा रहा है? इसके अलावा इस माहौल में ऑडियंस के हितों का और बेहतर तरीके से कैसे ध्यान रखा जा सकता है?

अशोक वेकटरमणी का कहना था, ‘आजकल ऐसा माहौल बन गया है, जिसमें ब्रॉडकास्टर और ऐडवर्टाइजर आदि सभी खुश हैं। लेकिन सच्चाई यह है कि यह वास्तव में खुश होने वाली स्थिति नहीं है। मेरा मानना है कि टीवी हो या डिजिटल, देश में सभी माध्यमों के लिए जगह है। चाहे टीवी हो या प्रिंट अथवा डिजिटल, सभी के सामने आगे बढ़ने के पर्याप्त अवसर हैं। मुझे नहीं लगता कि इस बारे में कोई चिंता करने की जरूरत है कि टीवी का स्वरूप बिगड़ रहा है। टीवी के सामने बदलते दौर के मुताबिक खुद को तैयार करने की चुनौती है। टीवी कंपनियों को भी तेजी से समझ में आ रहा है कि न्यूज और जिस तरीके से इसे परोसा जा रहा है, वह ज्यादा महत्वपूर्ण है, न कि प्लेटफॉर्म और मीडियम। अगर कंपनियां अपने ब्रैंड की क्रेडिबिलिटी को लेकर गंभीर हैं तो फिर उन्हें टीआरपी के बारे में चिंता करने की कोई जरूरत नहीं है।’

अनुराधा प्रसाद ने बताया कि किस तरह से बीएजी नेटवर्क ने बिजनेस और कंटेंट के बीच तालमेल बिठा रखा है। उन्होंने कहा, ‘किसी के बारे में निर्णय लेना, उसका विश्लेषण करना और उसकी निंदा करना काफी आसान है, लेकिन खुद का अस्तित्व बनाए रखना काफी मुश्किल काम है। मैंने अपने न्यूज चैनल की शुरुआत ‘news is back’ टैगलाइन के साथ की थी और मैंने खुद से वादा किया था कि मैं पत्रकारिता के सिद्धांतों के प्रति पूरी तरह ईमानदार रहूंगी। इस वजह से ही हमने टीआरपी बटोरने वाले शो की तरफ ध्यान न देकर न्यूज पर फोकस किया। लेकिन इसके बाद जब रेटिंग चार नंबर आई और मैंने टैम (TAM) के अधिकारियों से बात की तो उन्होंने बताया कि ज्यादा टीआरपी के लिए मुझे कुछ अलग तरह के शो टेलिकास्ट करने चाहिए, लेकिन मैं उनकी बात से सहमत नहीं थी और मैंने ऐसा नहीं किया, इसके बाद भी हम मार्केट में टिके रहे तो इसके पीछे जुनून औरप्रतिबद्धता ही थी।‘


अनुराधा प्रसाद का कहना था, ‘मैं हमेशा अपने सिद्धांतों पर कायम रहूंगी। मैं चाहती हूं कि टैम और बार्क के लिए कंप्टीशन हो, लेकिन ऐसा नहीं है। मेरा मानना है कि हमें डिस्ट्रीब्यूशन प्लेटफॉर्म को पहले ही तैयार कर लेना चाहिए था। यदि आज की तारीख में ट्राई घोषणा कर दे कि देश में कोई टीआरपी नहीं होगी तो आप देखेंगे कि किस तरह कंटेंट का स्वरूप पूरी तरह से बदल जाएगा।’

इस दौरान वरिष्ठ पत्रकार आलोक मेहता ने कहा, ‘नंबरों की इस दौड़ से परे हटकर ऐसा सिस्टम बनाने की जरूरत है जो लोगों के लिए काम करे। आज सभी लोग टीवी देख रहे हैं, ऐसे में इंडस्ट्री को उस दिशा में काम करने की जरूरत है, जिससे मीडिया में स्वःअनुशासन को सुनिश्चित किया जा सके।  उन्होंने कहा कि टीआरपी के मुद्दे को सुलझाने की जरूरत है।‘ इसके साथ ही उन्होंने सभी मीडिया संस्थानों और मीडिया स्कूलों से इस किताब को उनके पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाने को भी कहा।


वहीं, 'ट्राई' द्वारा जारी कंसल्टेशन पेपर और देश के ब्रॉडकास्टिंग सेक्टर के बारे में सुनील गुप्ता ने कहा कि जब प्राइवेट टीवी चैनलों ने देश में अपना कारोबार बढ़ाया तो इसके साथ ही उनका फोकस लोगों को जागरूक करने से हटकर ज्यादा से ज्यादा पैसा कमाना हो गया। उन्होंने कहा, ‘ब्रॉडकास्टर और दूसरे शेयरधारकों की सोच अभी भी वही है लेकिन चैनलों के लिए इनके द्वारा तय की गई कीमतें देने के लिए कस्टमर तैयार नहीं हैं। जब हिंदीभाषी ऑडियंस अंग्रेजी चैनल देख रहे हैं और उन्हें भी ये अपना ऑडियंस मानकर चलते हैं। ऐसे में ये अंग्रेजी चैनलों की टीआरपी को प्रभावित कर रहे होते हैं, जो गलत है। हालांकि, ऐसा बड़े स्तर पर हो रहा है। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर इसके लिए कौन जिम्मेदार है। इस तरह की सभी बातों को हम जानते हैं। जब इंडस्ट्री में सुधार आएगा और कंज्यूमर्स के पास विकल्प होंगे तो टीआरपी रेटिंग ज्यादा दिन नहीं चलेगी।’

कार्यक्रम के दौरान, 'आईआईएमसी' के डीजी केजी सुरेश ने समाज में टीवी के भविष्य को लेकर चर्चा की। उन्होंने कहा, ‘मीडिया की बात करें तो हम अभी भी तय नहीं कर सके हैं कि हम लीडर हैं या फॉलोअर, यदि हम लीडर है तो हमें ऊंचे मानदंड तैयार करने होंगे और भीड़ का हिस्सा बनने से बचना होगा। इसी तरह यहां पर टीआरपी की बात कर सकते हैं। भारत जैसे देश में अच्छे कंटेंट की काफी मांग है। अच्छा कंटेंट ही आपके ऑडियंस की संख्या बढ़ा देगा, फिर टीआरपी की कोई बात ही नहीं है। आजकल सोशल मीडिया का दौर है और ऐसे में लोग आपको वहीं पर रेटिंग दे देते हैं। यदि आप अच्छा कंटेंट नहीं देते हैं तो वे आपको वहीं पर इसका परिणाम दे देंगे। आजकल टीवी नहीं, बल्कि सोशल मीडिया पर न्यूज एजेंडा चल रहा है। सोशल मीडिया पर वायरल होने वाले टॉपिक ही टीवी पर रात को होने वाले डिबेट शो का हिस्सा बन रहे हैं।’





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