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32 पत्रकारों के परिवारों का दर्द आपकी आंखों में ला सकते हैं आंसू...

Published At: Friday, 05 January, 2018 Last Modified: Friday, 05 January, 2018

समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।

पिछले तीस वर्षों में असम के 32 पत्रकार या तो मार दिए गएया ऐसे गायब हुए कि कभी वापस नहीं लौटे। इन 32 पत्रकारों के परिवारों की जिंदगी असम के उग्रपंथियोंलैंड माफिया या तस्करों के चलते तबाही के रास्ते पर चली गई। इन सभी परिवारों का दुख दिसम्बर 2017 में बांटने की कोशिश की असम के मुख्यमंत्री सर्वानंद सोनोवाल ने और हर परिवार को पांच पांच लाख रुपए की मदद दी।

स्क्रॉल डॉट इन के अनुभव सैकिया ने इन सभी पत्रकारों की जिंदगी और उनके परिवारों के दुख पर एक विस्तृत रिपोर्ट प्रकाशित की है, जिससे पता चलता है कि कब कब कौन कौन से स्थानीय मीडिया हाउस के किस किस पत्रकाररिपोर्टर या संपादक को गलत कामों के विरोध में अपनी आवाज उठाने का खामियाजा अपनी जान देकर गंवाना पड़ा। आलम ये है कि अगर उनके परिवार केस भी लड़ना चाहें तो डर के मारे कोई वकील उनकी पिटीशन तक तैयार नहीं करता। नॉर्थ ईस्ट टाइम्स के गोसाईं गांव के कॉरस्पोंडेंट थे पंजतन अलीये कस्बा जिला कोकराझार में है। कुछ नकाबपोश आकर उस 21 साल के नौजवान को एक दिन उठा ले गएऔर फिर कभी उसके पिता ने उसे नहीं देखा। आज पिता दुलालुद्दीन दिल्ली में सिक्योरिटी गार्ड की नौकरी करके ना सिर्फ अपनी जान बचाए पड़े हैंबल्कि केस की तारीखों के लिए पैसा भी इकट्ठा कर रहे हैं।

स्क्रॉल की इस रिपोर्ट में कई पत्रकार परिवारों की कहानिया दी गई हैंकोकराझार के ही असमिया अखबार में काम करने वाले 29 साल के जगजीत सैकिया को बोड़ो उग्रवादियों ने मार दियागम में पिता भी हर्ट अटैक से मर गए। अब घर में अकेली बूढ़ी मां और बेरोजगार नाबालिग बेटा है। जगजीत की विधवा पत्नी को ये रकम मिली हैऐसे में कल को बूढी मां को दिक्कत भी आ सकती है। 

एक बोडो चैनल के एडिटर को भी कोकरराझार में 2008 में ऑफिस के बाहर गोली मार दी गईबोडोसा नारजरी के तीन बेटियां थीबड़ी मुश्किल से मां उन्हें पाल रही थी। अब असम सरकार की पांच लाख की मदद से उन्हें राहत मिली है। 2008 में स्वतंत्र आवाज के एडिटर नूरूल हक को घर लौटते वक्त लैंड माफिया ने मौत की नींद सुला दियाबेदर्दी से शरीर का काफी मांस भी निकाल लिया था। अब जाकर उनके बेटे को पहली बार आर्थिक सहायता मिली है। 

तमाम केसेज की ढंग से जांच नहीं हुई तो कई केस बीसियों साल से अदालतों में घिसट रहे हैं। 1996 में गुवाहाटी में असमिया प्रतिदिन के एग्जिक्यूटिव एडिटर पराग कुमार दास का मर्डर हुआपरिवार को आज तक फैसले का इंतजार है। आप इन पत्रकारों की कहानियां विस्तार से समझने के लिए स्क्रॉल डॉट इन की ये रिपोर्ट नीचे दी हेडिंग पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं

InAssam, families of 32 slain journalists await justice – and closure

 

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