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गजल प्रेमियों ने दुष्यंत कुमार को कुछ यूं किया याद...

Published At: Thursday, 06 December, 2018 Last Modified: Thursday, 06 December, 2018

समाचार4मीडिया ब्यूरो।।

हिम्मत से सच कहो तो बुरा मानते हैं लोग,  रो-रो के बात कहने की आदत नहीं रही

हमने तमाम उम्र अकेले सफ़र किया, हम पर किसी ख़ुदा की इनायत नहीं रही

दिल्ली के इंडिया हैबिटेट सेंटर का गुलमोहर ऑडिटोरियम बुधवार की शाम क़रीब ढाई घंटे एक ख़ास ख़ुशबू से महकता रहा। इस सुगंध का आनंद दिल्ली के अफ़सानानिगार, कवि, शायर, सांस्कृतिक सितारों और गंगा जमुनी तहज़ीब पसंद लोगों ने लिया।

दरअसल, भारतीय ज्ञानपीठ ने हिंदी ग़ज़ल के राजकुमार दुष्यंत कुमार को याद करने के लिए सभी ग़ज़ल प्रेमियों को दावत दी थी। ज्ञानपीठ के नए निदेशक और जाने माने पत्रकार-संपादक मधुसूदन आनंद के निमंत्रण पर पहुंचे तमाम शब्द शिल्पियों ने इस मौक़े पर दुष्यंत कुमार की पहली बॉयोपिक भी देखी। यह फ़िल्म वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल ने करीब पांच बरस पहले राज्य सभा टेलिविजन के साथ अपने कार्यकाल के दौरान बनाई थी। इस फ़िल्म में दुष्यंत कुमार की पत्नी राजेश्वरी त्यागी, बेटे आलोक, पुत्रवधू, दोस्त डॉ. धनंजय वर्मा, दुष्यंत के समग्र लेखन को चार ग्रंथों में समेटने वाले विजय बहादुर सिंह, भोपाल में दुष्यंत की याद को एक आंदोलन की शक़्ल देने वाले राजुरकर राज के दिलचस्प साक्षात्कारों को शामिल किया गया है।


कार्यक्रम में उर्दू के मशहूर शायर और विद्वान शमीम हनफ़ी ने ग़ज़ल के सफ़र और उससे दुष्यंत के रिश्ते को रेखांकित करने वाली तक़रीर पेश की। उन्होंने कहा कि दुष्यंत की ग़ज़ल आज के हिन्दुस्तान में अवाम का वास्तविक स्वर है। एक नमूना भी उन्होंने दिया-‘कल नुमाइश में मिला वो चीथड़े पहने हुए, मैंने पूछा नाम तो बोला कि हिन्दुस्तान है।‘ उनका मानना था कि मौजूदा समाज की तक़लीफें और पीड़ाएं अब कम नहीं होने वाली हैं। व्यवस्था के प्रति कड़वाहट भी कम नहीं होगी। इस कारण दुष्यंत और शिद्दत से याद आते हैं और हमेशा याद आते रहेंगे। इस दौरान उनकी गजल 'कैसे कैसे मंजर सामने आने लगे हैं, गाते-गाते लोग चिल्लाने लगे हैं/अब तो इस तालाब का पानी बदल दो, ये कँवल के फूल कुम्हलाने लगे हैं/अब नई तहज़ीब के पेशे नज़र हम,आदमी को भूनकर खाने लगे हैं।' की भी चर्चा हुई।

इस शानदार शाम को और भी अविस्मरणीय ज्ञानपीठ के पूर्व निदेशक लीलाधर मंडलोई, दिल्ली के सांस्कृतिक राजदूत डॉ. हरीश भल्ला, पत्रकार-कवि और संपादक विष्णु नागर, समंदर पार हिन्दुस्तान की शान बने शिक्षाविद कैप्टन एलएस बहल, बीएसएफ के एडीजी रहे मनोहर बॉथम, ऑल इंडिया रेडियो के एडीजी राजीव शुक्ल, वरिष्ठ पत्रकार और पद्मश्री आलोक मेहता,एम्स के विभागाध्यक्ष डॉ. विनोद खेतान, भारत की पहली सौर ऊर्जा से चलने वाली रेल की शुरुआत करने वाले वरिष्ठ अधिकारी और सांस्कृतिक समन्वयक श्रीवास्तव दंपति समेत तमाम लोग दुष्यंत की यादों के साझीदार बने।


कार्यक्रम का समापन दुष्यंत की इस ग़ज़ल के साथ के साथ हुआ।

चल भई! गंगाराम भजन कर

सूखे ताल भरी दोपहरी/प्यासी मारी फिरे टिटहरी/गरमी गहरी से भी गहरी/सहनी है चुपचाप सहन कर/

घर के दरवाज़ों पर पहरा/जलसों पर नारों पर पहरा/सारे अखबारों पर पहरा/ख़बरें आती हैं छन छन कर/

अपनी कलम उठाकर रख दे/या फिर इसको इसका हक़ दे/तनिक सचाई की न झलक दे/सिर्फ़ उजालों का वर्णन कर/

पथ ऐसे सुनसान पड़े हैं/जैसे लोग यहां लंगड़े हैं/कुछ जो राहें रोक खड़े हैं/हाथ जोड़कर इन्हें नमन कर/

वे जो प्रतिभावान बड़े हैं/उनके साथ बड़े लफड़े हैं/ अंतिम निर्णय का अवसर है/इन प्रश्नों पर आज मनन कर/

हर भूखे को मिले निवाले/बीत गए वे दुर्दिन काले/इन अफवाहों को अपना ले/उन अफवाहों का खंडन कर/चल भई गंगाराम भजन कर।



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