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नरेंद्र मोहन: जब आपकी विनम्रता दिल को भिगो गई

Published At: Monday, 24 September, 2018 Last Modified: Monday, 24 September, 2018

'मोहन बाबू ने कार का सीसा खोला और बोले- आओ, शंभूनाथ बैठ जाओ। कहां जाना है, मैं छोड़ देता हूं। उनकी यह विनम्रता दिल को भिगो गई। मैंने कहा- नहीं भाई साहब मैं चला जाऊंगा बस सामने ही जाना है। बड़ी मुश्किल से उनके आग्रह को टाल पाया।' अपने फेसबुक वाल के जरिए जागरण प्रकाशन चेयरमैन व मैनेजिंग डायरेक्टर रहे स्वर्गीय नरेंद्र मोहन को कुछ यूं याद किया वरिष्ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्ल ने। उनका पूरा लेख आप यहां पढ़ सकते हैं-

मोहन बाबू को भुलाया नहीं जा सकता!

दैनिक जागरण के प्रसार की सीमाओं को कानपुर शहर से लेकर पूरे उत्तर, पूर्व और मध्य भारत में फैलाने वाले स्वर्गीय श्री नरेंद्र मोहन की  20 सितंबर को 16वीं पुण्यतिथि थी। उन्हें सब लोग प्यार से मोहन बाबू कहते थे। एक कामयाब मालिक और सफल संपादक दोनों का विज़न उनके पास अद्भुत था। हालांकि उनकी बुराई करने वाले भी बहुत मिल जाएंगे, लेकिन उनमें अनगिनत अच्छाइयां थीं, जिन्हें सिर्फ इसलिए भुला दिया जाता है क्योंकि वे एक सफल उद्योगपति भी थे। उनके साथ मेरा निजी अनुभव है। मैं उसे साझा कर रहा हूं।

1980 में मैं जब नया-नया दैनिक जागरण में प्रशिक्षु उप संपादक लगा, तब की बात है। एक दिन रात नौ बजे अपने ड्यूटी ऑवर्स पूरे कर मैं ऑफिस से बाहर निकला। बाहर पोर्टिको में मोहन बाबू की लंबी-सी चमचमाती मैरून कलर की कार लगी थी। पता नहीं क्यों मेरे दिल में इच्छा जगी कि काश कभी ऐसी कार में बैठ पाता। गेट से बाहर निकल कर मैं लेबर कमिश्नर आवास की तरफ चला, वहीं से गोविन्द नगर के लिए गणेश मार्का टैम्पू मिलते थे। मैंने अभी गोदावरी होटल (आज वहां रीजेंसी अस्पताल है) पार किया ही था, कि पीछे से सरसराती हुई मोहन बाबू की कार निकल कर मेरे आगे जाकर रुकी। कार बैक हुई और ठीक मेरे बगल में आकर ठहर गई। पीछे की सीट पर बैठे मोहन बाबू ने कार का सीसा खोला और बोले- आओ, शंभूनाथ बैठ जाओ। कहां जाना है, मैं छोड़ देता हूं। उनकी यह विनम्रता दिल को भिगो गई। मैंने कहा- नहीं भाई साहब मैं चला जाऊंगा बस सामने ही जाना है। बड़ी मुश्किल से उनके आग्रह को टाल पाया। 

तीन साल बाद मैं मोहन बाबू से ही लड़-झगड़ कर दैनिक जागरण छोड़ दिल्ली में आ गया। यहां जनसत्ता की उप संपादकी ज्यादा लुभावनी थी और बहादुर शाह जफर मार्ग का आकर्षण भी। कई वर्ष बाद एक दिन मोहन बाबू फिर मिले, वह भी लखनऊ में मुख्यमंत्री कल्याण सिंह के यहां। फिर से तार जुड़े। उन्होंने पूछा कि अब तो दैनिक जागरण दिल्ली भी पहुँच गया है, जुड़ोगे? मैंने कहा- नहीं भाई साहब अब मैं प्रभाष जोशी जैसे संपादक का संग नहीं छोड़ सकता। दो-तीन साल बाद वे मुझे यूपी कांग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष श्री नारायण दत्त तिवारी के बिलिंग्डन क्रीसेंट स्थित ऑफिस में मिले तो अपनी एक कविता पुस्तक मुझे भेंट की। मैंने उसका रिव्यू लिखा और श्री मंगलेश डबराल के संपादन में निकलने वाली रविवारी जनसत्ता में छपवा दिया। धन्यवाद ज्ञापन का उनका फोन आया।

1996 में मुझे फाल्सीफेरम मलेरिया हो गया, उन्हें पता चला तो मुझे देखने वे मेरी झोपड़ी में आए और कह गए कि मैं तुम्हारे सर्वोत्तम इलाज़ की व्यवस्था कराए देता हूं, उन्होंने कहा कि एम्स में तुमको भर्ती करवाए देता हूं। पर मुझे एम्स जाने की जरूरत नहीं पड़ी। हमारे रीवा वाले मित्र ब्रजेश पांडेय ने एक ऐसी काबिल डॉक्टर से मुलाकात करवा दी कि पूरे चार महीने तक बिस्तर में रहने के बाद मैं स्वस्थ हो गया। ऐसे मोहन बाबू क्यों न भले याद आएंगे!

(साभार: फेसबुक वाल से)



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