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एमजे अकबर की दलील- पत्रकार ने 40 साल की छवि को पहुंचाया नुकसान

Published At: Thursday, 18 October, 2018 Last Modified: Thursday, 18 October, 2018

समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।

#MeToo कैंपेन के तहत यौन शोषण के आरोपों में घिरे पूर्व केंद्रीय मंत्री एमजे अकबर द्वारा पत्रकार प्रिया रमानी पर मानहानि का मुकदमें की सुनवाई गुरुवार को दिल्ली की पटियाला हाउस कोर्ट में हुई।मामले की सुनवाई कर रहे जज समर विशाल ने कहा कि पहले मानहानि करने वाले ट्वीट/स्टेटमेंट को देखते हैं, यदि यह सामग्री मानहानि पहुंचाने वाली पाई गई तो इसे आगे ले जाया जाएगा।

सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा कि 31 अक्टूबर को अकबर और बाकी गवाहों के बयान सुने जाएंगे।

पत्रकार प्रिया रमानी ने 8 अक्टूबर को अकबर के बारे में एक ट्वीट किया था। इसके बाद से अब तक 16 महिला पत्रकार अकबर के खिलाफ यौन उत्पीड़न के आरोप लगा चुकी हैं। 20 महिलाएं उनके खिलाफ गवाही को तैयार हैं।  

अकबर की तरफ से पैरवी कर रहीं वकील गीता लूथरा ने पत्रकार के ट्वीट पर अकबर की छवि का उल्लेख किया और अदालत से उनकी शिकायत पर संज्ञान लेने का अनुरोध किया। लूथरा ने कहा कि अकबर की 40 साल में तैयार हुई छवि को ऐसा नुकसान पहुंचाया जा रहा है, जिसकी भरपाई नहीं हो सकती। लूथरा ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय स्तर पर मीडिया में छपे लेखों में रमानी के ट्वीट को इस्तेमाल किया गया है। ये ट्वीट्स मानहानि साबित करते हैं जब तक रमानी इन्हें साबित नहीं कर सकती हैं। उन्होंने कहा कि रमानी के दूसरे ट्वीट को 1200 लोगों ने लाइक भी किया है। इस दौरान लूथरा ने बाकी महिलाओं के ट्वीट्स का हवाला भी दिया।

बता दें कि इसके पहले बुधवार को अकबर ने केंद्रीय विदेश राज्य मंत्री पद से इस्तीफा दिया था, जिसे राष्ट्रपति ने मंजूर भी कर लिया है। अपने इस्तीफे पर अकबर ने कहा कि मैंने निजी तौर पर अदालत में न्याय पाने का फैसला किया है, इसलिए मुझे उचित लगा कि मैं पद से इस्तीफा दे दूं। 

वही दैनिक भास्कर की एक रिपोर्ट के मुताबिक, अकबर रविवार को नाइजीरिया दौरे से लौटे थे, तब से इस्तीफा देने तक 72 घंटे में वे चार केंद्रीय मंत्रियों- अरुण जेटली, नितिन गडकरी, सुषमा स्वराज और राजनाथ सिंह से मिले थे। बुधवार सुबह राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (एनएसए) अजीत डोभाल से भी उनकी मीटिंग हुई। कहा जा रहा है एनएसए से बातचीत में ही मंत्री पद छोड़ना तय हुआ।

रिपोर्ट के मुताबिक, अकबर को हटाने को लेकर वरिष्ठ मंत्रियों ने 12 अक्टूबर को बैठक की थी। इसमें तय हुआ कि उन्हें अचानक हटाने से सरकार की बदनामी होगी। इसलिए फिलहाल चुप्पी बनाए रखना ही सही होगा। यही वजह रही कि विदेश मंत्री सुषमा स्वराज और मेनका गांधी ने इस मुद्दे पर किसी भी सवाल का जवाब नहीं दिया।

वहीं सरकार चाहती थी कि अकबर को आरोपों के खिलाफ कानूनी लड़ाई में निजी हैसियत से शामिल होना चाहिए, न कि केंद्रीय मंत्री की हैसियत से। ऐसा होता तो हर सुनवाई पर सरकार को बदनामी झेलनी पड़ती। इसलिए मानहानि मामले की सुनवाई से ठीक एक दिन पहले उन्हें इस्तीफा देना पड़ा। इसी के तहत अकबर ने भी इस्तीफे में इस बात का जिक्र किया है कि वे कानूनी लड़ाई निजी हैसियत से लड़ेंगे।

 

 



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