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#MeToo: महिला पत्रकार के वे डरावने 6 महीने, जब MJ अकबर ने की सारी हदें पार...

Published At: Friday, 12 October, 2018 Last Modified: Saturday, 13 October, 2018

#MeToo कैंपेन के तहत विदेश राज्य मंत्री एम.जे. अकबर पर एक के बाद एक नौ महिला पत्रकारों की तरफ से यौन शोषण के आरोप लगे हैं, जिसके बाद से उनके इस्तीफे की मांग जोर पकड़ने लगी है, जिसके बाद से शायद भाजपा नेतृत्व असमंजस में है। मीडिया में ऐसी खबरें आ रही हैं कि एम.जे. अकबर पर कार्रवाई की जाए या नहीं, इस बात का फैसला लेने के लिए भाजपा और सरकार में मंथन का दौर चल रहा है। दरअसल, अकबर इस अभियान के निशाने पर आए देश के पहले राजनीतिज्ञ हैं। माना जा रहा है कि शुक्रवार को नाइजीरिया दौरे से लौट रहे अकबर से स्पष्टीकरण लेने के बाद ही उनके भविष्य पर फैसला किया जाएगा।

नौ महिला पत्रकारों में से एक ने अपने साथ घटी घटना की आपबीती ‘द वायर’ न्यूज प्लेटफॉर्म के जरिए बताई। फोर्स न्यूज मैगजीन की एग्जिक्यूटिव एडिटर गजाला वहाब लिखती हैं कि भारत में #मीटू (#MeToo) अभियान के दस्तक देने के बाद, मैंने 6 अक्टूबर को एक ट्वीट किया था कि ‘आखिर एमजे अकबर की बारी कब आएगी।’ जल्द ही मेरे दोस्तों और ‘एशियन एज’- जहां 1994 में इंटर्न के तौर पर मेरे जुड़ने के वक्त एमजे अकबर संपादक थे- के मेरे पुराने सहकर्मियों ने मुझसे संपर्क करना शुरू कर दिया।

उन्होंने गुजारिश की कि तुम अपनी अकबर के बारे में अपनी कहानी क्यों नहीं लिखती हो? मैं इस बात को लेकर आश्वस्त नहीं थी कि क्या दो दशक से ज्यादा वक्त गुज़र जाने के बाद ऐसा करना गरिमापूर्ण होगा? लेकिन जब ऐसे संदेश आते रहे, तब मैंने इसके बारे में सोचा।

मैंने पिछला वीकेंड उन डरावने 6 महीनों को मन में  दोहराते हुए बिताया। दिमाग के किसी गुम कोने में दबी ऐसी यादें, जिसका ज़रा-सा ख्याल आज भी मेरे रोंगटे खड़े कर देता है। अचानक मेरी आंखें भर आयीं और मैंने सोच लिया कि मैं  एक पीड़ित के तौर पर नहीं जानी जाऊंगी, 1997 के वे छह महीने मेरे लिए कोई मायने नहीं रखते और वे किसी भी तरह से मेरे व्यक्तित्व को परिभाषित नहीं करते।

मैंने यह फैसला किया मैं अपने ट्वीट को आगे नहीं बढ़ाऊंगी। यह जानना कि आप जिसे आदर्श मानते हैं, वो जानवरों-सी प्रवृत्ति रखता है अलग बात है और इसे दुनिया के सामने बताना, अलग बात है। लेकिन मेरे पास संदेशों का तांता लगा रहा। कुछ लोगों ने कहा कि हो सकता है कि मेरी कहानी कुछ दूसरों को भी अपना सच बताने का हौसला दे। इसलिए मैंने अपनी कहानी बताने का फैसला किया है। यह है मेरी कहानी-

1989 में जब मैं स्कूल में ही थी, मेरे पिता ने मुझे अकबर की किताब ‘रॉयट आफ्टर रॉयट’  लाकर दी। मैंने दो दिनों के भीतर उस किताब को पढ़ डाला। उसके बाद मैंने ‘इंडिया: द सीज विदइन’  और  ‘नेहरू: द मेकिंग ऑफ इंडिया’ खरीदी। मैंने चुपचाप ‘फ्रीडम एट मिडनाइट, ओ येरुशलम’ और ‘इज़ पेरिस बर्निंग’ को दूसरी तरफ खिसका दिया। अब मेरा पसंदीदा लेखक बदल गया था।

मैंने ‘जर्नलिस्ट’ बनने का फैसला तब ही कर लिया था, जब मैं इसकी स्पेलिंग भी नहीं जानती थी, लेकिन अकबर की किताबों से मेरा सामना होने के बाद मेरी इच्छा, जुनून में तब्दील हो गई। मेरा ध्यान कहीं और न भटक जाए, इसलिए मैंने स्कूल के बाद जर्नलिज्म के बैचलर कोर्स में दाखिला ले लिया।

जब 1994 में मुझे ‘एशियन एज’ के दिल्ली दफ्तर में नौकरी मिली, उस समय मेरा यह यकीन पक्का हो गया कि मेरा मुकद्दर मुझे यहां लेकर आया है, ताकि मैं इस क्षेत्र के सबसे उम्दा उस्ताद से सीख सकूं।

लेकिन, सीखने को इंतजार करना था। पहले एक भरम को टूटना था। अकबर अपनी विद्वता को हल्के में लेते थे, कुछ ज्यादा ही हल्के में लेते थे। वे दफ्तर में चिल्लाया करते, गालियां देते और शराब पीते। एक सीनियर ने मेरी खिंचाई करते हुए हुए कहा, ‘तुम कुछ बिल्कुल छोटे शहरवाली ही हो।’

शायद इसलिए मैंने अपनी छोटी शहर वाली ज़हनियत को भूलकर अगले दो सालों के लिए- युवा सब एडिटरों के साथ अकबर के फ्लर्ट करने, उनके खुलकर पक्षपात करने और और उनके अश्लील मजाकों- को दफ्तर की संस्कृति मानकर कबूल कर लिया।

मैंने लोगों को ‘एशियन एज’ के दिल्ली ऑफिस को अकबर का ‘हरम’ कहकर पुकारते सुना- वहां जवान लड़कियों की संख्या पुरुषों की तुलना में कहीं ज्यादा थी। मैं अक्सर सब संपादकों-रिपोर्टरों के साथ उनके अफेयर की चर्चाएं भी सुना करती थी और यह भी कि ‘एशियन एज’ के हर क्षेत्रीय ऑफिस में उनकी एक गर्लफ्रेंड है।

मैंने इन सबको दफ्तर की संस्कृति मानकर झटक दिया। मैं उनकी तवज्जो के हाशिए पर थी, इसलिए अब तक अप्रभावित थी।

लेकिन ‘एशियन एज’ में मेरे तीसरे साल में मैं इस ‘ऑफिस कल्चर’ से अछूती नहीं रह सकी। उनकी निगाह मुझ पर पड़ी और इस तरह बुरे सपने सरीखे उस दौर की शुरुआत हुई।

मेरी डेस्क बदलकर उनके केबिन के ठीक बाहर कर दी गई, जो दरवाजा खुलने पर उनकी डेस्क के ठीक सामने पड़ती, इस तरह कि अगर उनके कमरे का दरवाजा थोड़ा-सा भी खुला रह जाए तो मैं उनके सामने होती थी। वे अपनी डेस्क पर बैठे हर समय मुझे देखा करते, अक्सर ‘एशियन एज’ के इंट्रानेट नेटवर्क पर मुझे अश्लील संदेश भेजते।

उसके बाद मेरी साफ दिख रही बेबसी से प्रोत्साहित होकर उन्होंने मुझे अपने केबिन में (जिसका दरवाजा वे हमेशा बंद कर देते) बुलाना शुरू कर दिया। वे ऐसी बातचीत करते, जो निजी किस्म की होती। जैसे मैं किस तरह के परिवार से आती हूं और कैसे मैं अपने माता-पिता की मर्जी के खिलाफ दिल्ली में अकेले रहकर काम कर रही थी।

कभी-कभी जब उन्हें अपना साप्ताहिक कॉलम लिखना होता, वे मुझे अपने सामने बैठाते। इसके पीछे विचार यह था कि अगर उन्हें लिखते वक्त एक मोटी डिक्शनरी, जो उनके केबिन के दूसरे कोने पर एक कम ऊंचाई की तिपाई पर रखी होती था, से कोई शब्द देखना हो, तो वे वहां तक जाने की की जहमत उठाने की जगह मुझे यह काम करने के लिए कह सकें।

यह डिक्शनरी इतनी कम ऊंचाई पर रखी गई थी कि उसमें से कुछ खोजने के लिए किसी को या तो पूरी तरह से झुकना या उकड़ूं होकर (घुटने मोड़कर) बैठना पड़ता और ऐसे में पीठ अकबर की तरफ होती।

1997 को एक रोज़ जब मैं आधा उंकड़ू होकर डिक्शनरी पर झुकी हुई थी, वे दबे पांव पीछे से आए और मुझे कमर से पकड़ लिया। मैं डर के मारे खड़े होने की कोशिश में लड़खड़ा गई। वे अपने हाथ मेरे स्तन से फिराते हुए मेरे नितंब पर ले आए। मैंने उनका हाथ झटकने की कोशिश की, लेकिन उन्होंने मजबूती से मेरी कमर पकड़ रखी थी और अपने अंगूठे मेरे स्तनों से रगड़ रहे थे।

दरवाजा न सिर्फ बंद था, बल्कि उनकी पीठ भी उसमें अड़ी थी। ख़ौफ के उन चंद लम्हों में हर तरह के ख्याल मेरे दिमाग में दौड़ गए। आखिर उन्होंने मुझे छोड़ दिया। इस बीच लगातार एक धूर्त मुस्कराहट उनके चेहरे पर तैरती रही। मैं उनके केबिन से भागते हुए निकली और वॉशरूम में जाकर रोने लगी। मुझे खौफ ने मुझे घेर लिया था।

मैंने खुद से कहा कि यह फिर नहीं होगा और मेरे प्रतिरोध ने उन्हें यह बता दिया होगा कि मैं उनकी ‘एक और गर्लफ्रेंड’ नहीं बनना चाहती। लेकिन यह इस बुरे सपने की शुरुआत भर थी।

अगली शाम उन्होंने मुझे अपने केबिन में बुलाया। मैंने दरवाजा खटखटाया और भीतर दाखिल हुई। वे दरवाजे के सामने ही खड़े थे और इससे पहले कि मैं कोई प्रतिक्रिया दे पाती, उन्होंने दरवाजा बंद कर दिया और मुझे अपने शरीर और दरवाजे के बीच जकड़ लिया।

मैंने खुद को छुड़ाने की कोशिश की, लेकिन उन्होंने मुझे पकड़े रखा और मुझे चूमने के लिए झुके। मैंने पूरी ताकत से अपना मुंह बंद किए हुए, अपने चेहरे को एक तरफ घुमाने के लिए जूझ रही थी। ये खींचातानी चलती रही, मुझे कामयाबी नहीं मिली।

मेरे पास बच निकलने के लिए कोई जगह नहीं थी। डर ने मेरी आवाज छीन ली थी। चूंकि मेरा शरीर दरवाजे को धकेल रहा था, इसलिए थोड़ी देर बाद उन्होंने मुझे जाने दिया। आंखों में आंसू लिए मैं वहां से भागी। भागते हुए मैं दफ्तर से बाहर निकली और सूर्य किरण बिल्डिंग से बाहर आकर पार्किंग लॉट में पहुंची। आखिरकार मुझे एक अकेली जगह मिली, मैं वहां बैठी और रोती रही।

मेरा पूरा जीवन मेरे सामने तैर रहा था। मैं अपने शहर आगरा से दिल्ली आकर पढ़नेवाली और उसके बाद नौकरी करनेवाली अपने परिवार की पहली व्यक्ति थी। पिछले तीन सालों में मैंने दिल्ली में रहने और काम करने में सक्षम होने के लिए अपने घर में कई लड़ाइयां लड़ी थीं।

मेरे परिवार की औरतें पढ़ा करती थीं, लेकिन उन्होंने कभी काम नहीं किया था। छोटे शहरों के कारोबारी परिवारों में लड़कियां हमेशा अरेंज मैरिज करके अपने घर बसा लिया करती थीं। मैंने इस पितृसत्ता के खिलाफ संघर्ष किया था।

मैंने अपने पिता से पैसे लेने से इनकार कर दिया था, क्योंकि मैं अपने दम पर कमाना चाहती थी। मैं एक कामयाब और इज़्ज़तदार पत्रकार बनना चाहती थी। मैं ऐसे सब छोड़कर हारे हुए खिलाड़ी की तरह घर वापस नहीं जा सकती थी।

मेरी एक सहकर्मी संजरी चटर्जी, मेरे पीछे-पीछे पार्किंग तक आई। उसने मुझे रोते हुए उनके केबिन से बाहर निकलते हुए देख लिया था। वह कुछ देर तक मेरे साथ बैठी। उसने मुझे सुझाव दिया कि इसके बारे में सीमा मुस्तफा को बताऊं। शायद वो अकबर से बात कर सकती थीं और अगर एक बार अकबर को यह पता चल जाए कि सीमा को इसके बारे में पता है तो शायद वे अपने हरकतों से बाज आ जाएं।

सीमा उस समय ब्यूरो चीफ थीं। हम दोनों ऑफिस वापस आए। मैं उनके क्यूबिकल में गई और उन्हें आपबीती सुनाई। वह हैरान नहीं थी। उन्होंने मुझसे कहा कि फैसला पूरी तरह से मेरे हाथ में है; मुझे क्या करना है, इसका फैसला मुझे ही करना चाहिए।  यह 1997 की बात है। मैं अकेली थी, असमंजस में, बेबस और बुरी तरह से डरी हुई थी।

आखिर मैं अपनी डेस्क पर लौट आई। मैंने ‘एशियन एज’ के नेटवेयर मैसेजिंग सिस्टम पर उन्हें एक संदेश भेजा। मैंने उन्हें बताया कि एक लेखक के तौर पर मैं उनकी कितनी इज़्ज़त करती हूं; कि कैसे उनके व्यवहार से उनकी वह छवि खराब हो रही है और मैं चाहती हूं कि वे मेरे साथ फिर से ऐसा व्यवहार न करें।

उन्होंने मुझे तुरंत अपने केबिन में बुलाया। मैंने सोचा था कि वे माफी मांगेंगे, लेकिन मैं गलत थी। उन्होंने ऐसा दिखाया कि मेरे विरोध करने से उन्हें तकलीफ पहुंची है। उन्होंने मुझे इस बारे में उपदेश दिया कि अपने प्रति उनकी भावनाओं को गलत समझकर मैं उनका अपमान कर रही हूं…

उस रात घर वापस लौटते हुए मैंने आखिरकार यह स्वीकार समझ लिया कि दफ्तर में हालात में मेरे काबू से बाहर हैं। मुझे नौकरी बदलनी होगी और इसलिए मैंने नौकरी की तलाश शुरू कर दी। इसके बाद ‘एशियन एज’ में बिताया हुआ हर लम्हा भीषण डर से भरा हुआ था।

हर बार जब वे मुझे अपने केबिन में बुलाते थे, मैं हजार दफा मरती। मैं दरवाजे को थोड़ा खुला रखकर उनके कमरे में दाखिल होती थी और मेरा एक हाथ दरवाजे की नॉब पर होता था। इससे उन्हें हैरानी होती थी।

कभी-कभी वे चलकर दरवाजे तक चले आते और अपना हाथ मेरे हाथ पर रख देते; कभी-कभी वे अपने शरीर को मेरे शरीर पर रगड़ते; कभी-कभी । हर बार मैं उन्हें धकेलकर उनके कमरे से बाहर निकल जाती।

उसके बाद मेरी एक सहकर्मी, जो मेरे लिए किसी फरिश्ते की तरह थी, ने एक रास्ता निकाला। मुझे जब भी उनके केबिन में बुलाया जाता, वह एक पल के लिए इंतजार करती और किसी न किसी बहाने मेरे पीछे-पीछे केबिन में चली आती। वह मेरे लिए सुरक्षा कवच बन गई।

लेकिन यह रणनीति कुछ हद तक ही कारगर साबित हुई। यह महसूस करके कि वह शारीरिक तौर पर आगे नहीं बढ़ पा रहे हैं, उन्होंने भावनात्मक चालें चलनी शुरू कर दीं।

एक शाम उन्होंने मुझे अपने दफ्तर में बुलाया और मुझसे अजमेर दरगाह जाकर वहां उनके लिए धागा बांधने की गुजारिश की। उन्होंने ऐसा दिखाया कि इस काम के लिए वे किसी और पर यकीन नहीं कर सकते।

मैंने यह दिखाया कि मैं अजमेर गई हूं, लेकिन मैं घर पर ही रह गई। लेकिन किसी तरह से उन्हें मेरी झूठ का पता चल गया और उन्होंने मुझ पर धार्मिक अपराधबोध लादने की कोशिश की। इस समय तक मैं विरोधाभासी भावनाओं का गड़बड़झाला बनकर रह गई थी। मैं अपराधी थी। मैं असुरक्षित थी और सबसे ज्यादा मैं चेतनाशून्य हो गई थी।

ऑफिस का मतलब अब मेरे लिए किसी भी तरह से आजादी नहीं रह गया था। यह एक यातनागृह था, मैं इससे बाहर निकलने के लिए छटपटा रही थी, लेकिन मुझे कोई दरवाजा नहीं मिल रहा था। मैं बेवकूफों की तरह यह यकीन कर रही थी कि एक बार मुझे दूसरी नौकरी मिल जाए, तो मैं गरिमा के साथ यह नौकरी छोड़ पाउंगी।

चूंकि मैंने शारीरिक प्रस्तावों का विरोध करना (अपने सीमित तरीके से) ही जारी रखा, इसलिए उन्होंने मेरे रक्षा कवचों को तोड़ने के लिए एक और वार किया- वीनू संदल, जो कि ‘एशियन एज’ की टैरो कार्ड रीडर थीं, जो साप्ताहिक कॉलम लिखती थीं।

समय के साथ-साथ वे अकबर की प्राइवेट एस्ट्रोलॉजर हो गई थीं। एक परेशान दोपहर को जब उन्होंने मेरी रक्षा में खड़ी रहनेवाली मेरी सहकर्मी को दफ्तर से भेज दिया था ताकि वे मुझ पर पंजा मार सकें, वीनू मेरे डेस्क पर आईं और मुझसे कहा कि अकबर वास्तव में तुमसे प्यार करते हैं और मुझे उन्हें कुछ समय देना चाहिए ताकि वह यह दिखा सके कि वह मेरा कितना ख्याल रखते हैं।

मैं इस घटिया जानवर के प्रति घृणा से भर गई। क्या वह वास्तविक हो सकता था? क्या उसके अंदर का मालिकाना भाव इतना बड़ा हो सकता है कि वह एक एस्ट्रोलॉजर का इस्तेमाल अपने लिए एक दलाल के तौर पर करे।

उस समय तक मैं किसी बात को लेकर निश्चित नहीं रह गई थी। क्या होगा अगर मैं उसका प्रतिरोध करती रहूंगी? क्या वह बलात्कार करेगा? क्या वह मुझे नुकसान पहुंचाएगा। मैंने पुलिस में जाने के बारे में सोचा, लेकिन मैं डर गई।

क्या होगा अगर वे बदला लेने पर उतारू हो गए? मैंने सब कुछ अपने माता-पिता को बताने के बारे में सोचा, लेकिन मुझे मालूम था कि यह मेरे अभी ही शुरू हुए करियर का अंत होगा।

बिना नींद की कई रातों के बाद मैं इस निष्कर्ष पर पहुंची कि कि दूसरी नौकरी की तलाश करते हुए ‘एशियन एज’ में रहना अब कोई विकल्प नहीं रह गया था और यह कि मुझे फौरन वहां से निकलना होगा। मैंने साहस बटोरकर उनसे कहा कि मैं यह नौकरी छोड़ रही हूं।

वे अपना आपा खो बैठे। वह जोर से चीखे और मैं अपनी कुर्सी में दुबक गई। तब उन्होंने भावुकता से भरकर मुझे पकड़कर उन्हें छोड़कर नहीं जाने के लिए कहा। मैं जब उनके कमरे से निकली, तो मेरी हड्डियां तक कंपकंपा रही थीं।

यह एक कभी न खत्म होने वाले बुरे ख्वाब की तरह हो गया था, जिसने मेरी जिंदगी के हर पहलू को प्रभावित किया था। मेरी भूख खत्म हो गई थी। मैं अपनी नींद खो चुकी थी। दोस्तों के साथ बाहर जाने की मेरी इच्छा समाप्त हो चुकी थी।

उसके बाद यह सब बदतर हो गया। अकबर ने मुझसे कहा कि वह अहमदाबाद से एक संस्करण लॉन्च कर रहे हैं और वह चाहते हैं कि मैं वहां चली जाऊं। मेरे सारे विरोध, मेरी दलीलों कि मेरे माता-पिता मुझे वहां जाने की इजाजत नहीं दे रहे हैं, को अनसुना करते हुए वे योजनाएं बनाने लगे।

मुझे अहमदाबाद में एक घर दे दिया जाएगा और कंपनी सारी चीजों का ख्याल रखेगी और जब भी वे वहां आएंगे, मेरे साथ रुकेंगे। मेरे डर की कोई सीमा नहीं थी। भीषण खौफ के उस समय में मैंने अपने अंदर शांति के एक सागर की खोज की।

मैंने विरोध करना बंद कर दिया। धीरे-धीरे अगले कुछ हफ्तों में, मैंने अपनी डेस्क साफ करना शुरू कर दी। मैं अपनी किताबें वगैरह धीरे-धीरे घर ले जाने लगी। इस तरह से अहमदाबाद जाने से एक दिन पहले की शाम मेरी डेस्क साफ हो चुकी थी।

एक बंद लिफाफा, जिसमें मेरा इस्तीफा था, अकबर की सेक्रेटरी को देते हुए मैं अपने सामान्य समय पर दफ्तर से निकल गई। मैंने उनकी सेक्रेटरी से वह लिफाफा अगली शाम को देने की गुजारिश की। यानी मैंने अहमदाबाद की फ्लाइट नहीं ली है, ये जान लेने के काफी वक्त बाद।

अगले दिन मैं घर पर ही रही। शाम को अकबर ने मेरे घर के फोन नंबर पर फोन किया। उन्होंने मेरा फोन नंबर ऑफिस से लिया था। दूसरी तरफ से वे बड़बड़ा रहे थे। वे बारी-बारी से कभी गुस्सा होते, कभी भावुक होते। मैं जड़ हो गई थी। क्या होगा अगर वे घर तक चले आए।

मैं पूरी रात जगी रही और अगली ही सुबह अपने माता-पिता के पास जाने के लिए पहली ट्रेन में बैठ गई। घर में किसी ने भी कुछ नहीं पूछा। मेरे माता-पिता को यह अंदेशा हो गया था कि सब कुछ ठीक नहीं है। हमारे बीच की लड़ाई समाप्त हो गई थी।

मैं कुछ हफ्तों तक घर पर रही। उसके बाद जब मैंने अपने पिता से कहा कि मैं वापस अपने काम पर दिल्ली जाना चाहती हूं, तब उन्होंने इसका विरोध नहीं किया। उन्होंने बस इतना ही कहा कि कोई और नौकरी देखो और यह सुनना था कि मैं जोर-जोर से रोने लगी।

पिछले 21 वर्षों में मैंने इस घटना को पीछे छोड़ दिया था। मैंने तय कर लिया था कि मैं पीड़ित नहीं बनूंगी और यह ठान लिया था कि एक हैवान की लंपटता को अपना करियर खराब नहीं करने दूंगी। हालांकि, मुझे बीच-बीच में बुरे सपने आते रहते हैं, हो सकता है कि अब वो बंद हो जाएं।

(साभार: द वायर)

 



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