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मैगजींस को होना है हिट तो अपनाएं राजदीप सरदेसाई का LSSU फंडा...

Wednesday, 17 January, 2018

समाचार4मी‍डिया ब्यूरो ।।

11वीं इंडियन मैगजीन कांग्रेस (IMC) में इंडिया टुडे’ (India Today) के कंसल्टिंग एडिटर राजदीप सरदेसाई ने अपनी पुरानी यादों को भी ताजा किया। दिल्‍ली में आयोजित कार्यक्रम में सरदेसाई ने उन पुराने दिनों को याद किया जब वे टाइम्‍स ऑफ इंडिया’ (Times of India) के लिए काम करते थे। सरदेसाई ने कार्यक्रम में मौजूद लोगों को बताया, ‘मैंने प्रिंट में अपने कॅरियर की शुरुआत 1988 में की थी और इसके बाद 1994 में टीवी मीडिया की ओर रुख किया।1980 के दशक में टाइम्‍स ऑफ इंडियाबहुत बड़ा नाम था और शायद आज भी है। लेकिन अंतर सिर्फ इतना है कि यह टीवी में ब्रेकिंग न्‍यूज से पहले का युग था। उस जमाने में न ज्‍यादा टीवी था, न इंटरनेट और न ही मोबाइल फोन, ऐसे में न्‍यूज पर हमारा एकाधिकार होता था। न्‍यूज को लेकर जितना इस समय शोरशराबा होता है, उतना तब नहीं था और उस समय ज्‍यादा सुकून भी था।’  

मैंने न्‍यूज के क्षेत्र में काफी लंबा सफर तय किया है। प्रिंट में वर्ष 1988 से शुरुआत करने के बाद वर्ष 1994 में मैं टीवी में आ गया था। उस समय अखबार के प‍हले पेज पर जब मेरी बाइलाइन स्‍टोरी छपती थी तो यह मेरे लिए बहुत बड़ी बात थी। उस समय ऐसी खबरें छपती थीं कि कोलाबा बस स्‍टेशन पर स्‍ट्रीट लाइट काम नहीं कर रही हैं अथवा वीटी स्‍टेशन के पास सड़क पर हुए गड्ढे नहीं भरे गए हैं, इन खबरों पर तुरंत एक्शन होता था, जिससे काफी संतुष्टि मिलती थी।

अब समय बहुत बदल गया है। आजकल के समय को मीडिया 360के रूप में परिभाषित किया जा सकता है। यानी आप किसी से भी पल भर में संपर्क साध सकते हैं और मिनटों में कहीं से भी दुनियाभर की न्‍यूज जुटा सकते हैं। न्‍यूज के क्षेत्र में इतनी तेजी से बदलाव हो रहे हैं कि इन दिनों जो न्‍यूज दिखाई जा रही है, अक्‍सर करीब एक घंटे बाद ही वह पुरानी हो जाती है यानी इतिहास बन जाती है और उसकी जगह दूसरी न्‍यूज ले लेती है। इस उदाहरण के द्वारा इसकी बानगी भी देखी जा सकती है।18 दिसंबर को जब गुजरात विधानसभा चुनाव के परिणामों की घोषणा हुई थी, उस दिन सुबह छह बजे से दोपहर के करीब एक बजे तक मैं टीवी पर चुनाव परिणामों के प्रसारण में जुटा हुआ था। दोपहर में एक से डेढ़ बजे तक मैंने पहले हिन्‍दी में और इसके बाद अंग्रेजी में फेसबुक लाइवकिया था। इसके बाद हिन्‍दुस्‍तान टाइम्‍स’ (Hindustan Times) और डेलीओ’ (DailyO) ने मुझसे ओपिनियन आर्टिकल लिखने के लिए कहा, ऐसे में यह दूसरा काम था। हालांकि यह करते हुए मैं पूरा दिन ट्वीट करता रहा था।

ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि क्‍या प्रिंट की दुनिया ऐसी दुनिया के लिए प्रासंगिक हो सकती है, जहां पर हर समय ट्विटर मौजूद है। जहां पर लाइव टीवी पर एफआईआर दर्ज की गई है और जहां पर लाखों वेबसाइट्स लगातार आपके ऊपर सूचनाओं की एक तरह से बमबारी कर रही हैं यानी आपके पास सूचनाओं का अपार भंडार मौजूद है। आज के दौर में जब न्‍यूज सचमुच आपकी हथेली में है तो ऐसे में सवाल उठता है कि क्‍या ऐसे दौर में मैगजीन के लिए भी कोई जगह है?

हालांकि मेरी नजर में इस सवाल का जवाब हां है। जब सभी स्‍टॉकहोल्‍डर्स तमाम तरह के बदलावों को स्‍वीकार करते हुए इसकी निरंतरता को सुनिश्चित रखें तो मैगजीन के लिए काफी स्‍पेस है। मैं आपको क्रिकेट जगत के बदलाव से अवगत कराता हूं। आप प्रिंटेड मैगजीन को टेस्‍ट क्रिकेट सोचकर देखें। आज टी-20 का जमाना है और इसके सामने भी टेस्‍ट क्रिकेट अपनी उपयोगिता बनाए हुआ है। आज के समय में टेस्‍ट क्रिकेट की यूएसपी के लिए चार शब्‍द  कहे जा सकते हैं। इनमें सबसे पहला है विरासत (legacy) यानी टेस्‍ट क्रिकेट 1870 के जमाने से चल रहा है, ऐसे में इसमें परंपरागत मूल्‍य भी जुड़े हुए हैं। दूसरा है इसका रुतबा (stature) यानी टेस्‍ट क्रिकेट में बनाए जाने वाले रनों के आधार पर लोग खिलाड़ी का आकलन करते हैं, क्‍योंकि उनके लिए यह खेल का उच्‍चतम स्‍वरूप है। तीसरा है स्किल (skill) यानी वैसे तो क्रिकेट के किसी रूप में लिए खिलाड़ी के अंदर स्किल का होना बहुत जरूरी है लेकिन टेस्‍ट क्रिकेटर के लिए निश्चित रूप से खास स्किल का होना बहुत ही आवश्‍यक है। वहीं, चौथा है यूनिक (unique) यानी कोई भी स्‍पोर्टिंग फॉर्मेट ऐसा नहीं है जो पांच दिन खेला जाता हो। यह एक तरह से खेल का मैराथन है।

आजकल ये सभी चीजें प्रिंटेड सामग्री खासकर मैगजीन पर बिल्‍कुल सटीक बैठती हैं। उदाहरण के लिए विरासत (legacy) की बात करें तो इंडिया टुडेने कई वर्षों में अपनी यह स्थिति बनाई है और यह काफी पुराना ब्रैंड है। इस बात का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि जब मैं हाईस्‍कूल में था, तब इंडिया टुडेपढ़ता था। इस ब्रैंड के साथ मेरे छात्र जीवन की स्‍मृतियां जुड़ी हुई हैं। अब बात करते हैं रुतबे (stature) की तो मैं प्रत्‍येक सप्‍ताह ‘The Economist’ मैगजीन को जरूर पढ़ता हूं क्‍योंकि इसका कद काफी बड़ा है और इसे वैश्विक राजनीतिक अर्थव्यवस्था पर लिखने का बेहतरीन उदाहरण माना जाता है। तीसरी बात स्किल (skill) की करें तो जब मैं न्यू-यॉर्कर ‘New Yorker’ में 20-20 पेज के आर्टिकल पढ़ता हूं तो मुझे पता चलता है कि आखिर कुशल लेखन क्‍या होता है। वहीं, यदि यूनिकनेस की बात करें तो मैं ‘New Yorker’ को इसलिए सबस्‍क्राइब करता हूं क्‍योंकि पूरी दुनिया में कहीं पर भी इसके जैसा दूसरा कोई नहीं है।

ऐसे में निश्चित रूप से काफी चुनौतियां हैं कि प्रिंट की दुनिया कैसे अपनी विरासत तैयार कर सकती है, कैसे वह अपना रुतबा बढ़ा सकती है, उसके स्किल मे कैसे इजाफा हो सकता है और कैसे वह दूसरों से खुद को अलग दिखा सकती है?  अब सवाल यह उठता है कि ऊपर बताए गए मॉडल्‍स में से अथवा कुछ अन्‍य ऐसे मॉडल्‍स हैं जो भारतीय परिदृश्‍य के अनुकूल हैं और उन्‍हें स्‍वीकार किया जा सकता हैअक्‍सर मैं अपने आप से यह सवाल पूछता हूं कि आखिर क्‍यों हमारे पास ‘The Economist’ जैसी ‘Indian economist’ नहीं है। यह ऐसी पत्रिका है जिसे आपके सिरहाने रखे जाने का सम्‍मान मिलता है और आप इसमें फख्र महसूस करते हैं। इस पत्रिका की खासियत यह है कि आज के इंफोटेनमेंट के युग में इसे आपके ज्ञान में इजाफा करने के रूप में देखा जाता है।

ईमानदारी से कहें तो इन दिनों टीवी पर परोसी जा रही न्‍यूज और असली न्‍यूज के बीच बहुत बड़ा अंतर है। न्‍यूज के नाम पर कई चैनल कुछ भी दिखा रहे हैं। अधिकांश चैनल आपको शोरशराबा, एंटरटेनमेंट और ब्रेकिंग न्‍यूज परोस रहे हैं। क्‍या वे घटना का संदर्भ, उसका विश्‍लेषण और जानकारीपरक चीज उपलब्‍ध करा पा रहे हैं?  वे ऐसा नहीं करते हैं। ऐसे में टीवी के ईकोसिस्‍टम में कमी के कारण पैदा हुए इस गैप को भरने के लिए प्रिंट कंटेंट के पास बड़ा अच्‍छा अवसर है। बड़े मुद्दों के बारे में अपनी जानकारी को बढ़ाने के लिए मैं अगले दिन का अखबार पढ़ना चाहता हूं ताकि चीजों को और अच्‍छी तरह से समझ सकूं।

उदाहरण के लिए- यदि हाल में जजों के बीच हुए विवाद की बात करें इसे एक या दो बाइट के आधार पर पूरी तरह नहीं समझा जा सकता है, इसके लिए विस्‍तार की आवश्‍यकता होती है।

इसके अलावा जब भी आपको लगे कि प्रिंटेड सामग्री सही प्रदर्शन नहीं कर पा रही है तो आप इसे मल्‍टीमीडिया में तब्‍दील कर सकते हैं, इसके बाद आपको अहसास हो जाएगा कि शब्‍दों की ताकत कभी खत्‍म नहीं होती है और शब्‍द कभी नहीं मरते हैं।

यह सिर्फ इतना ही है कि टेक्‍नोलॉजी के द्वारा कंटेंट के प्‍लेटफॉर्म्‍स बदल रहे हैं। आजकल के पत्रकार को विभिन्‍न प्‍लेटफॉर्म्‍स पर सूचनाओं और जानकारियों को उपलब्‍ध कराने के लिए तैयार रहना होगा। बड़ी मैगजींस अब वेबसाइट भी तैयार कर रही हैं जो नए यूजर्स का बेस तैयार करती हैं और सबस्क्रिप्‍शन मॉडल द्वारा बड़े रेवेन्‍यू का बेस भी तैयार करती हैं।

हां, एक आर्टिकल की तुलना में विडियो के वायरल होने की ज्‍यादा संभावना है लेकिन कौन कहता है कि एक अच्‍छा लिखा हुआ आर्टिकल लाखों लोगों द्वारा शेयर नहीं किया जाएगा। हालांकि कमाई को लेकर एक चुनौती हो सकती है लेकिन वॉट्सएप और सोशल मीडिया पर शेयर की वैल्‍यू और प्रभाव को कम करके नहीं आंका जाना चाहिए। उदाहरण के लिए यदि जज लोया की बात करें तो यह स्‍टोरी The Caravan मैगजीन की वेबसाइट ने ब्रेक की थी, यह ऐसी मैगजीन है जिसका सर्कुलेशन काफी सीमित है, पर ये स्‍टोरी चर्चा का केंद्र बिंदु बनी।यदि भाजपा अध्‍यक्ष अमित शाह के बेटे जय शाह की स्‍टोरी की बात करें तो यह भी ‘The Wire’ वेबसाइट पर ब्रेक हुई थी और इसने काफी सुर्खियां बटोरी थीं। आधार डाटा लीक होने की खबर भी द ट्ब्यिूनने प्रकाशित की थी। चंड़ीगढ़ का यह अखबार इस स्‍टोरी के द्वारा देश भर में चर्चित हो गया।

अस्‍वाभाविक रूप से, जो टेक्‍नोलॉजी प्रिंटेड सामग्री के लिए चुनौती के रूप में देखी जा रही है वह विभिन्‍न प्‍लेटफॉर्म्‍स पर इसके प्रभाव को बढा़ने का काम भी कर रही है। इसलिए यदि आप प्रभावी पत्रकारिता करने के लिए तैयार हैं तो प्रिंटेड सामग्री अभी भी काफी प्रासंगिक है। आखिर में इसके लिए कंटेंट अच्‍छी क्‍वॉलिटी का होना चाहिए क्‍योंकि अच्‍छी गुणवत्‍ता वाला कंटेंट हमेशा प्रासंगिक रहेगा और लोगों को अपनी ओर आकर्षित करेगा।

आखिर में मैं एक बात और बताना चाहता हूं कि समय के साथ मुझे पहले पेज पर बाइलाइन मिलने के अवसर बढ़ते गए, टीवी पर बड़ी न्‍यूज स्‍टोरी को करने का अवसर भी मिला और मेरे ट्विटर फॉलोअर्स की संख्‍या में भी काफी इजाफा हुआ। इसके अलावा मुझे अच्‍छी किताबें लिखने का भी अवसर मिला। ऐेसे में क्‍या मैं किसी एक माध्‍यम को छोड़कर दूसरे का चुनाव करूंगा। ऐसा नहीं है और न ही आपको यह करना चाहिए। इस बारे में चिंता करने की बजाय कि अखबार और मैगजीन अप्रासंगिक हैं, आओ उन चुनौतियों को गले लगाएं कि कैसे प्रत्‍येक माध्‍यम को और प्रासंगिक बनाना है।

 


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क्या इंडिया टीवी के चेयरमैन रजत शर्मा का क्रिकेट की दुनिया में जाना सही है?

हां, उम्मीद है कि वे वहां भी उल्लेखनीय कार्य कर सुधार करेंगे

नहीं, जिसका काम उसी को साजे। उनका कर्मक्षेत्र मीडिया ही है

बड़े लोगों की बातें, बड़े ही जाने, हम तो सिर्फ चुप्पी साधे

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