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कुछ 'बड़े' पत्रकार ही पत्रकारिता का 'बंटाधार' कर रहे हैं: अंजना ओम कश्यप

Monday, 09 April, 2018

समाचार4मी‍डिया ब्यूरो ।।

एक्‍सचेंज4मीडिया न्‍यूज ब्रॉडकास्टिंग अवॉर्ड्स’ (enba) समारोह में पिछले वर्षों के दौरान न्‍यूज में आए बदलाव को लेकर एक पैनल डिस्‍कशन का आयोजन किया गया। 'HOOQ Digital India Pvt. Ltd.' के एमडी सलिल कपूर के नेतृत्‍व में हुए इस पैनल डिस्‍कशन में 'टीवी टुडेके न्यूज चैनल 'आजतककी एंकर और वरिष्‍ठ पत्रकार अंजना ओम कश्‍यप ने कहा, 'मुझे लगता है कि इस तरह के पैनल में न्‍यूज को लेकर पहली बार इस तरह का डिस्‍कशन हो रहा है। यह काफी अच्‍छी बात है कि इस प्रोग्राम के जरिए हम लोगों को साथ बैठकर इस टॉपिक पर चर्चा करने का मौका मिला है।'

उन्‍होंने कहा, 'समय के साथ मैंने महसूस किया है कि किसी न किसी रूप में न्‍यूज पूरी टीवी इंडस्‍ट्री का अहम हिस्‍सा बन चुकी है। मेरा मानना है कि कुछ एंकर्स ने समय के साथ यह तय कर लिया है कि चुनिंदा ऑडियंस और निश्चित मानसिकता वाले लोग ही उनकी टार्गेट ऑडियंस हैं। ऐसा इसलिए है क्‍योंकि वे जानते हैं कि इस तरह की ऑडियंस के सामने वे अपना पक्ष आसानी से रख सकते हैं। ऐसा नहीं है कि उनके विचारों से असहमति नहीं जताई जा सकती है अथवा उनसे बहस नहीं की जा सकती है, लेकिन आजकल की न्‍यूज की बात करें, तो स्‍टूडियो में बैठे ऐसे लोग जो कभी फील्‍ड में नहीं जाते और अपनी ही निश्चित दुनिया में रहते हैंउन्‍होंने यह तय कर लिया है कि यह फलां विचारधारा वाली मेरी ऑडियंस है और इसे ही खुश रखना है। इसके तहत ही वे सोच-समझकर अपनी सब्‍जेक्‍ट लाइन को चुनते हैं और उसी पर चलते हैं। ऐसे सिरफिरे पत्रकारों की कमी नहीं है जो खुलेआम कहते हैं कि मैं इस बारे में अपना पक्ष रख रहा हूं और इसी के साथ मैं अपनी पत्रकारिता करुंगा। ऐसे में वे लोग दोनों पक्षों से समान रूप से सवाल नहीं पूछ सकते हैं और न ही स्‍टोरी की दोनों साइड को निष्‍पक्ष रूप से दिखा सकते हैं। मीडिया में अपने लंबे अनुभव के कारण मुझे लगता है कि यह स्थिति काफी खराब है और इससे व्‍युअर्स असमंजस में पड़ सकते हैं।'

अंजना के अनुसार, 'मेरा मानना है कि यदि हम खुलेआम एक विचारधारा स्‍वीकार कर लेते हैं, तो आप उसी के अनुसार काम करने का प्रयास करेंगे। आप दो-टूक शब्‍दों में ये कह सकते हैं कि आप एक पक्ष की ओर हैं, तो पत्रकार होने के नाते आप रिस्‍क ले रहे हैं और इससे हो रहा पत्रकारिता का नुकसान हमें बाद में महसूस होगा। ऐसे में पत्रकारिता की काफी क्षति होगीजिसकी भरपाई करना मुश्किल होगा और यह हम सबके लिए अच्‍छा नहीं है। इसलिए मेरा कहना है कि राष्‍ट्रवादी होनादेश के लिए बातें करना काफी अच्‍छा है और हम सब भी हैं लेकिन किसी एंकर द्वारा पूछे गए सवालों के आधार पर इसका सर्टिफिकेट कौन दे रहा हैयदि आप लंबे समय तक इसी तरह की एक विचारधारा वाली पत्रकारिता करते हैं, तो फिर इसमें आपका अपना क्‍या योगदान है? मैं जानती हूं कि आजकल विचारों का ध्रुवीकरण हो रहा है और न्‍यूजरूम भी इससे अछूता नहीं है। यदि कोई एक पक्ष रखता है तो दूसरे का अपना पक्ष है और अपनी बात साबित करने के लिए वह किसी भी हद तक जा सकता है। लेकिन विचारों की इस अतिरेकता के कारण व्‍युअर्स कंफ्यूज होते हैंक्‍योंकि आपकी स्‍टोरी पर आपकी निश्चित विचारधारा दिखाई देती है और यह आपके आर्टिकलट्वीट आदि के द्वारा पूरी मीडिया की छवी को ऐसा ही एकतरफा बनाने की कोशिश दिखती है।'

अंजना ओम कश्‍यप का कहना था, 'मुझे लगता है कि आज के समय में सोशल मीडिया गेमचेंजर हैक्‍योंकि पहले पत्रकारिता सिर्फ अखबारों और टीवी के जरिये होती थी। लेकिन सोशल मीडिया आने के बाद कई पत्रकारों ने ट्विटर पर अपने विचार पोस्‍ट करना शुरू कर दिया और उनके वही विचार उनके टीवी शो या पत्रकारिता में झलकते हैं। ऐसे पत्रकार इश्यू बेस्ड मुद्दे उठाने से बचते है और बायस्ड बेस्ड (एकपक्षीय) होकर मुद्दे को चर्चा करते हैं। ऐसे पत्रकार पत्रकारिता का 'बंटाधार' कर रहे हैं। एक पत्रकार के रूप में ऐसे लोग ट्विटर पर अपने निजी विचारों को पोस्‍ट कर रहे हैं। इसके बाद ऐसे पत्रकार मुद्दों से भटक जाते हैं और वे पूर्वाग्रही अथवा एकपक्षीय हो जाते हैं और यह टीवी और अखबार में लिखे जाने वाले आर्टिकल पर भी झलकता है। कैसे हम इनके साथ मिलकर खड़े रह सकते हैंकैसे हम पूर्वाग्रह से प्रभावित हो सकते हैंं? और अपने दर्शकों को कंफ्यूज होने से बचा सकते हैंमेरा मानना है कि आज के समय यही सबसे बड़ी चुनौती है।'

कार्यक्रम के दौरान सलिल कपूर द्वारा यह पूछे जाने पर कि क्‍या आपको लगता है कि विभिन्‍न मीडिया प्लेटफॉर्म्स के जरिए न्‍यूज के ज्‍यादा से ज्‍यादा डिस्‍ट्रिब्‍यूशन से कुछ मदद मिली हैअंजना का कहना था, 'आजकल अधिकांश लोग अपने मोबाइल पर पहले से ही न्‍यूज हासिल कर रहे हैं। अंग्रेजी के व्‍युअर्स के लिए हो सकता है कि न्‍यूज हासिल करने में दिक्‍कत हो लेकिन हिन्‍दी चैनलों के बारे में मैं ये जरूर कह सकती हूं कि हम अपने व्‍युअर्स को लगातार बताते हैं कि आखिर क्‍या चल रहा है। इसके लिए हम स्‍क्रीन पर छोटे-छोटे टिकर चलाते हैंजिससे व्‍युअर्स को खबरें मिलती रहती हैं। यदि व्‍युअर्स उन्‍हें पढ़ लेता है, तो उसे आसानी से सभी इनफॉर्मेशन मिल जाती है। लेकिन कई चैनलों की इमेज फिक्‍स हो गई है और वे उसी इमेज के साथ चलते रहते हैं। लोगों को भी पता रहता है कि यह फलां चैनल है तो यह इस लाइन पर चलेगा और फलां चैनल उस स्‍टोरी लाइन पर चलेगापत्रकारिता की ये स्थिति ठीक नहीं है और इससे बाहर निकलना होगा।'

अंजना का कहना था कि पिछले महीने जब चंद्रग्रहण पड़ा था तो सिर्फ हिन्‍दी के एक चैनल ने लगातार उस पर कवरेज दिखाई थी। 'आजतकने इससे पूरी तरह से दूरी बनाई थी। हमने पांच पंडित बिठाकर उस पर कोई चर्चा नहीं कराई, फिर भी हम उस दौरान लीडर की पॉजिशन पर बने रहे। अंजना का कहना था, 'मेरा मानना है कि लीडिंग चैनल ही न्‍यूज को तय करते हैं और उसका प्रसारण करते हैं। उन्होंने ये भी कहा कि जब कई चैनल वले इंटरव्‍यू करने जाते हैं तो वे काफी प्रतिकूल तरीके से काम करते हैं। ऐसे में कई बार सामने वाला भी झल्‍ला जाता है। तभी थोड़ा अजीब लगता है।'

यह पूछे जाने पर कि कई बार चैनल के स्‍टार एंकर अपने विचार रखते हैंतो क्‍या इससे न्‍यूज इंडस्‍ट्री पर उस समय कोई असर पड़ता है अथवा व्‍युअर्स के बीच किसी तरह का कंफ्यूजन होता ह, या यूं कहें कि फलां एंकर या चैनल के फॉलोअर्स होने के कारण वे व्‍युअर्स उन्‍हीं सब बातों को सच मान लेते हैंक्‍या ऐसा हो रहा है? इस पर अंजना ओम कश्‍यप ने जवाब 'नहींमें दिया। उनका कहना था, 'मैं यह पहले भी कई मंचों पर कह चुकीं हूं कि अंग्रेजी चैनल भले ही अपने एंकर को 'स्‍टार एंकरकहकर प्रोजेक्‍ट करते हों लेकिन हिन्‍दी के चैनलों में ऐसा नहीं है। वहां कोई भी शो एंकर के नाम से नहीं होता है। जैसे यदि मैं हल्‍ला बोल कार्यक्रम करती हूं तो उसमें ये कहीं नहीं होता है कि हल्‍ला बोल विद अंजना कश्‍यप। लेकिन अंग्रेजी चैनलों में कोई भी स्‍पेशल रिपोर्ट एंकर के नाम से हो सकती है। ऐसे में मेरा कहना है कि अपनी जगह बनाने और उसे बनाए रखने के लिए हिन्‍दी एंकर बहुत ज्‍यादा मेहनत कर रहे हैं। रही बात कंफ्यूजन की तो ऐसा नहीं है। आप सभी को पता है कि पुण्‍य प्रसून बाजपेयी कैसे बात करेंगे और अंजना कश्‍यप के बात करने का स्‍टाइल क्या होगा। ऐसे में सबका अपना अलग स्‍टाइल होता है।'

उन्‍होंने कहा कि 'आजतकमें एंकर सिर्फ एंकर नहीं होते बल्कि वे फील्‍ड में जाकर ग्राउंड रिपोर्टिंग भी करते हैं। चुनाव के दिनों में तो मैं रोजाना बहुत भागदौड़ करती थी। रोजाना कई किलोमीटर का सफर तय करके नई जगह जाती थी और वहां से रिपोर्टिंग करती थी। कहने का मतलब है कि हम लोग बहुत मेहनत करते हैं। हमारी हर स्‍टोरी काफी महत्‍वपूर्ण होती है। आखिर में मैं ये कहना चाहूंगी क एंकर द्वारा व्‍युअर्स को दिग्‍भ्रमित नहीं किया जाना चाहिए।


 

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