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कुछ इस तरह 'हरफनमौला' अंदाज में दिखे वरिष्ठ संपादक शशि शेखर

Monday, 07 May, 2018

अभिषेक मेहरोत्रा, डेप्युटी एडिटर, समाचार4मीडिया

देश के बड़े दैनिक 'हिन्दुस्तान' के प्रधान संपादक शशि शेखर शनिवार को ताजनगरी में कुछ अलग ही अंदाज में नजर आए। गंभीर संपादक और सख्त प्रशासक की छवि वाले शशि शेखर को जिसने भी होटल ग्रांड में सुना, तन्मयता से सुना। चेहरे पर खिलखलाहट के साथ जब शशि शेखर ने कुछ चुटकियां लीं, तो उपस्थित लोगों ने उनकी हाजिरजवाबी की खूब दाद दी।

बुक लॉन्चिंग जैसे पारंपरिक कार्यक्रमों में बोरिंग स्पीच की परिपाठी को तोड़ते हुए उन्होंने न सिर्फ शहर की नब्ज की बात की, साथ ही शहर के आमजन के स्वभाव और बोलचाल से जिस तरह रूबरू कराया, वे बहुत ही रुचिकर था।

मौका था उनके अध्ययनकाल में आगरा कॉलेज के दौरान उनकी सहपाठी रही  डॉ. रेखा पतसारिया (हिंदी विभागाध्यक्ष, आगरा कॉलेज)  की किताब 'एक दिन सिर्फ अपने लिए' के विमोचन समारोह का, जहां वे बतौर मुख्य अतिथि  संबोधित कर रहे थे। 

कवि देवकालीन की कविता 'किस शहर में कोई क्यों रहता है' का जिक्र करते हुए शेखर बोले कि अक्सर सोचता हूं कि मैं 'आगरेवाला' क्यों कहलाता हूं? न मैं यहां पैदा हुआ न मेरे पूर्वज, पर मेरी कर्मभूमि रहा ये शहर वाकई अद्भुत है। ये इसी शहर की विशेषता है कि कोई भी आदमी मुझे देख आज भी तुरंत ये कह देता है, 'अबे ये तो वही है!' यह इस शहर का मेरे से लगाव है और यही अपनापन है।

पुराने दिनों को याद करते हुए शेखर बोले, मैनपुरी से जब यहां आया तो सेंट जोंस और आगरा कॉलेज में से किसमें एडमिशन लूं, ये द्वंद भी था और फिर आगरा कॉलेज का छात्र बना। जीवन एक सांचे की तरह होता है, जहां आप तपते है, ढलते हैं, बनते हैं। मेरे लिए ये शहर एक सांचा ही रहा, जहां मैंने खूब पढ़ा, खूब समझा और जहां मैं नाटककार भी बना। मुझे याद है कि 22 साल की उस उम्र में मैंने जब एक नाटक में 62 साल के प्रिंसिपल का रोल निभाया, तो उस कैरेक्टर में ढलना कितना मुश्किल था, मुझे याद है कि जब मैंने बलराज साहनी की जीवनी पढ़ी, तो उन्होंने लिखा था कि जब वे एक बार बैजंतीमाला के साथ शूट कर रहे थे, तो वे जब भी उनकी आंखों में देखते तो ममतामयी प्रेम नजर आता, जब कोई कैरेक्टर आपकी उम्र से बड़ा हो, तो स्टेज पर उसके साथ ट्यूनिंग बैठाना ही तो कलाकारी है।     

आगरा की साहित्यिक धरोहरों डा. रामविलास शर्मा, रांगेय राघव, डा. विद्या निवास मिश्र का जिक्र करते हुए कहा, मुझे आज भी याद ह कि जब मैंने 22 साल की उम्र में दास कैपिटल इसी शहर के एक बड़े लेखक से मांगी थी, तो उन्होंने पहले मुझे कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो समझने की सलाह दी थी। पर अफसोस है कि आगरा के इन महान साहित्यकारों के बाद कहानी गढ़ने की विधा पर विराम सा लग गया था। 

नेटफ्लिक्स के इस जमाने में मैं भी प्रियंका चोपड़ाका अमेरिकी शो 'क्वांटिको' देख रहा हूं। निर्मल वर्मा, मोहन राकेश, राजेंद्र यादव के युग के बाद अब इंटरनेट का ये दौर हमारे बीच किस्सागोई ला रहा है। नीलेश मिश्रा ने दिखाया है कि स्टोरीटेलिंग विधा आज भी कितनी लोकप्रिय है। इंटरनेट की दुनियां में किस्सागोई का शुरू होना अच्छे संकेत माने जा सकते हैं। हालांकि यह बेहद चुनौती भरा है।

साहित्य की चर्चा करत हुए शेखर ने कहा कि कहानियां कभी आपकी आंखें नम करती हैं, कभी आपके चेहरे पर हल्की मुस्कराहट लाती है , कभी गुदगुदाती है, कभी रुलाती है और आपको एक निष्कर्ष पर छोड़ जाती है। आज के दौर में तो कहानियों के जरिए कई कहानीकार आप पर अपने को थोपने की दादागीरी भी करते हैं, पर डॉ.रेखा की कहानियां आपके मन को छूती है। इसी कड़ी में अब डा. रेखा पतसारिया ने शहर में थमी कहानी की विधो को पुनर्जीवित करने की कोशिश की है।

उन्होंने गंभीर सवाल उठाते हुए कहा कि दुनियां भर में पुरानी चीजों को फिर से व्याख्यायित करने की होड़ मची हुई है। कई चीजों की पुनर्परीक्षा होने लगी है। यह अच्छा नहीं है। बेहतर यह रहे कि पुरानी चीजों को पीछे छोड़ अच्छी दुनियां बनाने की कोशिश की जाए। उन्होंने कहा कि आज अपने करीब कई प्रतीकों को देख रहा हूं, बेवजह के विवादों के इस दौर में साहित्य एक बड़ी भूमिका निभा सकता है।' जो बात गई सो भूल गई ही' कई समस्याओं का बेहतर हल है।

इससे पहले समाजसेवी और उद्यमी पूरन डावर ने बतौर स्वागताध्यक्ष अतिथियों का स्वागत करते हुए कहा कि आज इस मंच पर आगरा से जुड़ीं देश की बड़ी शख्सियतों की उपस्थिति हर शहरवासी को गौरान्वित कर रही है। जिस तरह आगरी से जुड़ीं रही ये शख्सियतें देश-विदेश में शहर का मान बढ़ा रही है, वो शहर के विकास का ही सूचक है।


रंगकर्मी डॉ.राम गोपाल सिंह चौहान की जयंती के मौके पर आयोजित इस समारोह की अध्यक्षता महात्मा गांधी हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा के पूर्व कुलपति विभूति नारायण राय ने की।इस मौके पर वरिष्ठ आलोचक, उपन्यास और कहानीकार विभूति नारायण राय ने कहा कि दुनियां भर में स्त्रियों के लिए एक जैसा संघर्ष है। पश्चिम में भी उनकी राह आसान नहीं है। भारत में बीते कुछ सालों में बदलाव आया है। यहां उन्हें संपत्ति में भागीदारी मिलने लगी है। हालांकि इस अधिकार को पाने में उन्हें लगभग 70 साल लग गए हैं। उन्होंने कहा कि स्त्री विमर्श का विषय आते ही दो तरह की विचारधाराएं सामने आती हैं। एक ओर हम स्त्री को देवी बना सकते हैं, जबकि दूसरी ओर हम औरतों को बराबरी का हक देने से डरते हैं। हिंदू कोर्ट बिल के बाद भी देश के तमाम बड़े नेताओं ने इस विषय पर अपने हाथ खींच लिए थे। यह अकेले भारत की ही बात नहीं है। दुनियां भर में स्त्रियों का हाल कुछ ऐसा ही है। ताजनगरी में साहित्य सृजन की लंबी और ऐतिहासिकता यात्रा का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि आगरा की पहचान सिर्फ ताजमहल और पेठे से नहीं, यहां के लोगों से है। डॉ. रामविलास शर्मा, रांगेय राघव, डॉ. राजेंद्र यादव, डॉ. हर्षदेव जैसे रचनाकार आगरा को अलग खड़ा करते हैं। 

विशिष्ट अतिथि राजस्थान विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति देव स्वरूप थे।विवि अनुदान आयोग के संयुक्त निदेशक डा. देव स्वरूप ने कहा कि निर्माण एक प्रक्रिया है। इसमें धैर्य की आवश्यकता है। किताबें लुप्त हो रही हैं, ऐसे में डा. रेखा का प्रयास निश्चित ही प्रशंसनीय है।

पुस्तक की समीक्षा महात्मा गांधी हिंदी विश्वविद्यालय के प्रोफेसर सूरज पालीवाल ने प्रस्तुत की। वर्धा विवि के पूर्व कुलपति वरिष्ठ कथाकार प्रो. सूरज पालीवाल ने कहा कि विपरीत समय में कहानी लेखन का साहस मुश्किल कार्य है। दलित और स्त्री विमर्श से कुछ हटकर लिखना वाकई चुनौती है।

डॉ. रेखा पतसारिया ने अपनी कहानियों के संग्रह के विषय में बताया कि एक दिन सिर्फ अपने लिये’ में 12 कहानियां लिखीं हैं। ये कोई स्त्री विमर्श की कहानियां नहीं, ये मेरे मन की अनुभूतियां हैं जो मैंने अपनी जीवन यात्रा में अर्जित की हैं। इनका एक-एक शब्द गहन मंथन के बाद पिरोया गया है। इन्हें प़ढ़कर खासकर महिलाओं को नई प्रेरणा मिलेगी। कहानियों में स्त्री के अंदर की स्त्री को सामने लाने की कोशिश की गई है।

वरिष्ठ कवि डा. रामेन्द्र मोहन त्रिपाठी ने 'दुश्वारियां न हों तो मजा क्या उड़ान में, कुछ गम भी लेकर चलो आसमान में' सुनाकर उन्हें शुभकामनाएं प्रेषित कीं। होटल ग्रांड के अरुण डंग ने बताया कि कैसे शहर के कुछ रचनाकारों ने हर दौर में शहर में साहित्य की मशाल जला रखी है। 

आईएफएस विपिन मिश्रा, पूरन डावर, डा. अश्विनी शर्मा, उप्र लेखिका मंच की शशि मल्होत्रा ने भी मंच साझा किया। संचालन नवनीत चौहान ने किया। धन्यवाद ज्ञापन विनय पतसारिया ने किया। 

यह रहे उपस्थित... 

उत्तर प्रदेश लेखिका मंच और हम ललित कला मंच  के संयुक्त तत्वाधान में आयोजित इस कार्यक्रम में स्वतंत्रता सेनानी सरोज रानी गौरिहार, 'हिन्दुस्तान' आगरा एडिशन के संपादक अजय शुक्ल, आगरा कॉलेज के पूर्व प्राचार्य डॉ.मनोज रावत, डॉ.दीपा रावत, प्रख्यात कवि पवन आगरी, अमित अग्रवाल, डॉ.अनिल चौहान, पूर्व विधायक सतीश चंद्र गुप्ता, हरीश सक्सेना चिमटी, डॉ. चंद्रशेखर शर्मा, गजल गायक सुधीर नारायण, देवेन्द्र बाजपेई,  राजीव कुलश्रेष्ठ, डॉ. ममता सिंह, डॉ. क्षमा चतुर्वेदी, डॉ, अरुण कुमार सिंह, अशोक रावत, डॉ. त्रिमोहन शरन, विपिन कुमार सिंह, डॉ.खुशी राम शर्मा, डॉ. अरविंद जैन, डा. ज्योत्सना रघुवंशी, भावना रघुवंशी, विनती शर्मा, मून टीवी के राहुल पालीवाल और राजीव दीक्षित, महेश धाकड़, कुमार ललित, डॉ.. कैलाश सारस्वत, सूर्य नारायण, डॉ. श्रीभगवान शर्मा, प्रो. प्रदीप श्रीधर, अशोक जैन सीए, विजयपाल सिंह चौहान, संजय वर्मा, राजीव सिंघल, प्रवीन गुलाटी, डॉ.अनुराग शुक्ला, डॉ. अनुराग पालीवाल, डॉ. जेएन टंडन, डॉ. अरुण चतुर्वेदी, डॉ.. विपिन शर्मा, अशोक रावत, त्रिमोहन तरल, रचना सिंह मौजूद रहे। 

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