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महिलाओं के सपनों को क्यों नहीं मिलती उड़ान, BW ने जाना ये ‘कड़वा सच’

Published At: Friday, 08 March, 2019 Last Modified: Friday, 08 March, 2019

समाचार4मीडिया ब्यूरो।।

देश में महिला उद्मिता को बढ़ावा देने की तमाम कवायदों के बावजूद ‘आईआईटी’ और ‘आईआईएम’ जैसे देश के प्रमुख इंजीनियरिंग और मैनेजमेंट संस्थानों में महिलाओं/लड़कियों की उपस्थिति काफी कम रहती है। यही कारण है कि देश में इंजीनियर्स, मैनेजर्स और नेताओं की जमात में महिलाओं की संख्या काफी कम है। लेकिन अब यह सवाल उठता है कि आखिर ‘आईआईटी’ और ‘आईआईएम’ जैसे संस्थानों में इतनी कम लड़कियां क्यों प्रवेश लेती हैं?

ऐसे ही तमाम सवालों को लेकर बिजनेस मैगजीन ‘बिजनेसवर्ल्ड’ (BW Businessworld) ने अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के उपलक्ष्य में ‘डिकोड’ (Decode) के साथ मिलकर एक राष्ट्रव्यापी और औद्योगिक जगत का सर्वे किया, ताकि सही कारणों का पता लगाया जा सके।    

आपको जानकर ताज्जुब होगा कि इस सर्वे में शामिल 74 प्रतिशत लोगों का कहना था कि इंजीनियरिंग कॉलेजों में दाखिले के लिए अभिभावक बेटियों की जगह अपने बेटों को कोचिंग कराते हैं। सर्वे के दौरान जब यह पूछा गया कि आखिर क्या कारण है कि ‘आईआईएम’ जैसे संस्थानों के विद्यार्थियों में लड़कियों की संख्या 50 प्रतिशत भी नहीं है? इस पर करीब 70 प्रतिशत लोगों का भी यही मानना था कि इन संस्थानों में प्रवेश के लिए अभिभावक अपने बेटों को ही कोचिंग कराते हैं, बेटियों को नहीं।

सर्वे में शामिल 46 प्रतिशत लोगों का कहना था कि बेटियों की शादी करना अभिभावकों का एकमात्र उद्देश्य रहता है, यही कारण है कि उन्हें इंजीनियरिंग/मैनेजमेंट एंट्रैंस एग्जाम की तैयारी नहीं कराई जाती है।

चाहे वह उद्मिता हो, मैनेजमेंट हो अथवा शिक्षा का क्षेत्र, इनमें महिलाओं का शामिल होना बहुत महत्वपूर्ण पहलू है, लेकिन भारत की बात करें तो यहां तो लड़कियों के जन्म को लेकर भी तमाम सवालिया निशान हैं। आधे से ज्यादा (52) प्रतिशत लोगों का इस सर्वे में यह मानना था कि हमारे देश में लड़कियों को पैदा होने के समान अवसर नहीं मिलते हैं।

करीब 78 प्रतिशत लोगों का यह भी कहना था कि भ्रूण हत्या अथवा कन्या भ्रूण हत्या को लेकर कभी भी राष्ट्रीय स्तर पर मुद्दा नहीं उठाया जाता है। करीब 90 प्रतिशत लोगों का मानना था कि राजनीतिक दलों को अपने घोषणा पत्र में इस मुद्दे को शामिल करना चाहिए।  

ऐसा नहीं है कि बच्चियों के लिए राजनीतिक दलों ने कुछ नहीं किया है। सर्वे के दौरान करीब 82 प्रतिशत लोगों ने माना कि लड़कियों और महिलाओं के उत्थान के लिए ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ और ‘लाडली लक्ष्मी योजना’ जैसे तमाम स्कीम चलाई गई हैं और यह उन्हें आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं।

सर्वे में जब यह पूछा गया कि महिलाओं के कल्याण के लिए स्कीम चलाने में किस मुख्यमंत्री ने सबसे ज्यादा भागीदारी निभाई है, तो अधिकांश लोगों ने केरल के मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन का नाम इस लिस्ट में सबसे ऊपर रखा। इसके बाद इस लिस्ट में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और फिर हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर का स्थान है। गुजरात के पूर्व मुख्यमंत्री के तौर पर नरेंद्र मोदी का स्थान इनके बाद रखा गया है।  

अक्सर देखा गया है कि स्कूल और बोर्ड परीक्षाओं में लड़कों के मुकाबले लड़कियों का प्रदर्शन काफी अच्छा रहता है, इसके बाद भी वे सफल करियर नहीं बना पाती हैं। इस बारे में पूछे जाने पर 64 प्रतिशत लोगों का मानना था कि सामाजिक दबाव के कारण वे आगे नहीं बढ़ पाती हैं, जबकि 60 प्रतिशत लोगों ने माना कि पारिवारिक दबाव के कारण ऐसा होता है और लड़कियां आगे नहीं बढ़ पाती हैं। जी हां, 60 प्रतिशत लोगों का मानना था कि महिला प्रोफेशनल्स को फुलटाइम करियर बनाने में उनका परिवार बाधा बनता है।  

जब यह पूछा गया कि सरकार अथवा कॉरपोरेट जगत को कार्यस्थल पर महिलाओं की संख्या बढ़ाने के लिए किस तरह के कदम उठाने चाहिए? तो काफी दिलचस्प जवाब सामने आए। 74 प्रतिशत लोगों का मानना था कि महिला कर्मचारियों को उनकी मर्जी के मुताबिक काम करने के समय में छूट दी जानी चाहिए, वहीं 72 प्रतिशत लोगों का मानना था कि महिलाओं को घर से काम करने का विकल्प दिया जाना चाहिए। 62 प्रतिशत लोगों ने इस बात पर भी जोर दिया कि पुरुषों को ज्यादा पितृत्व अवकाश (paternity leaves) दिए जाने चाहिए, ताकि वे घर पर अपनी पत्नी को ज्यादा सपोर्ट कर सकें। सर्वे में शामिल 50 प्रतिशत लोगों का मानना था कि कॉरपोरेट जगत द्वारा कार्यस्थल पर इस तरह की कवायद को बढ़ावा नहीं दिया जाता है।

66 प्रतिशत लोगों का मानना था कि महिलाओं को कॉरपोरेट लीडर्स बनना मुश्किल लगता है, वहीं 70 प्रतिशत लोगों का मानना था कि जिस तरह का माहौल अथवा परिवेश है, उसमें महिलाओं के लिए कॉरपोरेट लीडर्स बनना काफी मुश्किल होता है। उदाहरण के लिए- 66 प्रतिशत लोगों का मानना था कि कॉरपोरेट जगत में इस नियम का पालन नहीं किया जाता है कि उनके बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स में कम से कम एक महिला शामिल होनी चाहिए।

हालांकि, सर्वे में शामिल 88 फीसदी लोगों का मानना था कि महिला लीडर्स की संख्या पर्याप्त है, जिनसे प्रेरणा मिलती है और 78 प्रतिशत लोगों का मानना था कि ऐसा कोई कानून बनना चाहिए, जिससे कार्यस्थल पर महिलाओं का एक निश्चित प्रतिशत सुनिश्चित हो सके। 86 प्रतिशत लोग इस बात के पक्ष में दिखे कि संसद और अन्य स्थानों पर महिलाओं को एक तिहाई कोटा देने के लिए तुरंत कानून बनना चाहिए।

महिलाओं की सबसे ज्यादा हितैषी पॉलिटिकल पार्टी के बारे में पूछे जाने पर 34 प्रतिशत लोगों ने भारतीय जनता पार्टी का नाम लिया, जबकि 24 प्रतिशत लोग कांग्रेस के पक्ष में दिखे और यह इस लिस्ट में दूसरे नंबर पर रही, जबकि 22 प्रतिशत लोगों ने तृणमूल का नाम लिया। 12 प्रतिशत लोगों ने वामदलों का नाम लिया और आठ प्रतिशत लोगों ने बसपा-सपा के पक्ष में वोट किया।

महिलाओं को आगे बढ़ाने में किस प्रधानमंत्री ने सबसे ज्यादा काम किया है, लोगों ने इस लिस्ट में सबसे ऊपर इंदिरा गांधी का नाम रखा, इसके बाद इस लिस्ट में क्रमशः पी.वी. नरसिम्हा राव, नरेंद्र मोदी, अटल बिहारी वाजपेयी, लाल बहादुर शास्त्री और जवाहर लाल नेहरू का नाम शामिल था। 46 प्रतिशत लोगों का मानना था कि महिला दिवस के लिए सिर्फ एक दिन नहीं होना चाहिए, बल्कि इसे रोजाना मनाना चाहिए।

कॉरपोरेट इंडिया के साथ ही देश की जनता का मूड जानने के लिए यह सर्वे देश के 14 शहरों में किया गया था। इसमें 320 कॉरपोरेट के साथ 2080 आम लोगों को शामिल किया गया था। यह पूरा सर्वे ऑनलाइन किया गया था। डाटा जुटाने और इसके विश्लेषण का काम ‘Decode Research and Analytics’  की ओर से किया गया था।



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