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केरल बाढ़ की कवरेज में मीडिया ने कुछ यूं निभाई अपनी जिम्‍मेदारी...

Published At: Friday, 31 August, 2018 Last Modified: Friday, 31 August, 2018

नीतू मोहन ।।

पिछले दिनों भीषण बाढ़ की त्रासदी झेल चुका केरल अब धीरे-धीरे सामान्‍य होने लगा है और यहां जनजीवन पटरी पर आने लगा है। अनुमान है कि इस प्राकृतिक आपदा से 21 हजार करोड़ रुपए से ज्‍यादा का नुकसान हुआ है। स्‍थानीय अधिकारियों का दावा है कि बाढ़ प्रभावित 31 प्रतिशत घरों से मलबा हटाया जा चुका है और 25.6 लाख में से 23.36 लाख स्‍थानों पर बिजली आपूर्ति चालू कर दी गई है।

बाढ़ में दिखी एकता की ताकत : इस भीषण बाढ़ ने दिखा दिया कि यहां के लोगों ने जरूरत पड़ने पर कैसे अपने मतभेदों को भुलाकर बचाव कार्य में सहयोग किया। इसके अलावा भारतीय सेना, नेवी, केंद्रीय सशस्‍त्र पुलिस बल और एनडीआरएफ आदि की टीम ने भी राहत एवं बचाव कार्य में बढ़-चढ़कर भाग लिया और कई लोगों की जिंदगी बचाई। बाढ़ के दौरान स्‍थानीय मछुआरों ने भी काफी सराहनीय कार्य किया और हीरो के रूप में अपनी पहचान बनाई। यही नहीं, इस दौरान यह भी देखने को मिला कि आवश्‍यकता पड़ने पर सोशल मीडिया का किस तरह प्रभावी रूप से इस्‍तेमाल किया जा सकता है। दरअसल, बाढ़ के दौरान आम लोगों से लेकर अधिकारियों ने लोगों तक पहुंचने के लिए सोशल मीडिया का सहारा लिया। इसके अलावा लोगों को जागरूक करने में भी सोशल मीडिया की काफी सराहनीय भूमिका रही। भीषण बाढ़ में जब लोगों का एक-दूसरे से संपर्क नहीं हो पा रहा था और लोग अलग-थलग जगह फंसे हुए थे, सोशल मीडिया ने एक तरह से कंट्रोल रूम की भूमिका निभाई और फेसबुक आदि से स्‍थानीय लोगों व अधिकारियों को इलाकों में फंसे लोगों के बारे में जानकारी मिलती रही और वे बचाव कार्य में जुटे रहे। यानी कहा जा सकता है कि इस बाढ़ ने यह भी दिखा दिया कि सोशल मीडिया कितना सशक्‍त है और किस तरह उसका सकारात्‍मक रूप से इस्‍तेमाल किया जा सकता है।

इस पूरे मामले के दौरान मलयालम टीवी चैनल भी अपनी सामाजिक जिम्‍मेदारी निभाने में किसी भी तरह पीछे नहीं रहे और बाढ़ की रिपोर्टिंग करते समय काफी परिपक्‍वता और जिम्‍मेदारी का परिचय दिया।

'द न्‍यूज मिनट' (The News Minute) अखबार की एडिटर-इन-चीफ धन्‍य राजेंद्रन ने 19 अगस्‍त को किए गए ट्वीट में लिखा भी था, 'मलयालम चैनलों के रिपोर्टर इन दिनों केरल में काफी विपरीत परिस्थितियों में काम कर रहे हैं। वे न सिर्फ सूचनाओं का प्रसारण कर रहे हैं बल्कि कंट्रोल रूम की तरह काम भी कर रहे हैं, जहां पर लोग उन्‍हें जरूरी संदेश भी दे सकते हैं।'

जिम्‍मेदाराना रिपोर्टिंग की पेश की मिसाल : केरल की बाढ़ के दौरान मलयालम मीडिया ने बहुत ही सराहनीय काम किया और जिम्‍मेदाराना रिपोर्टिंग की मिसाल पेश की। चैनलों की जिम्‍मेदाराना रिपोर्टिंग को इस तरह से समझा जा सकता है कि इस दौरान चैनलों ने विज्ञापनों से दूरी बना ली और लोगों के लिए 24x7 हेल्‍पलाइंस चालू कर दी गईं। कुल मिलाकर यदि एक शब्‍द में मलयालम चैनलों द्वारा की गई बाढ़ कवरेज की बात करें तो इसे हम 'जिम्‍मेदाराना पत्रकारिता' (responsible journalism) कह सकते हैं। चैनलों द्वारा इस बात को भी सुनिश्चित किया जा रहा था कि अधिकारियों द्वारा दी गई सूचना लोगों तक सही रूप में पहुंचे और किसी तरह की फेक न्‍यूज न फैले।

केरल में प्रमुख त्‍योहार ओणम सितंबर में काफी धूमधाम से मनाया जाता है और मीडिया चैनलों के लिए यह त्‍योहार रेवेन्‍यू जुटाने का सबसे अच्‍छा समय होता है। करीब 60 प्रतिशत रेवेन्‍यू इन्‍हीं दिनों में आता है। ऐसे में ओणम का सीजन होने के बावजूद यहां की मीडिया ने यह सब छोड़कर सिर्फ लोगों और उनकी समस्‍याओं को प्राथमिकता दी। इस दौरान लोगों तक सही जानकारी और सटीक आंकड़े पहुंचाने के लिए चैनलों ने अपने रिपोर्टरों और एंकरों की पूरी टीम लगा दी थी।

बचाव अभियान में रहा पूरा सहयोग (Involvement in the rescue operations)

बाढ़ के दौरान मलयालम न्‍यूज चैनल 'एशियानेट न्‍यूज' (Asianet News) ने बचाव कार्यों में भी अपनी पूरी भागीदारी निभाई। चैनल की ओर इस दौरान विज्ञापन नहीं दिखाए गए। इसके अलावा लोगों की सहायता के लिए चैनल की ओर से 24x7 हेल्‍पलाइन डेस्‍क भी खोली गई ताकि आसानी से एक-दूसरे से संपर्क किया जा सके और ताजा घटनाओं की जानकारी मिलती रहे। चैनल की ओर से ग्राउंड रिपोर्टिंग के लिए रिपोर्टरों की पूरी फौज बाढ़ पीडि़त क्षेत्रों में उतार दी गई थी। ऐसे में बाढ़ में फंसे रिपोर्टरों ने अपनी जान पर खेलकर बेहतरीन रिपोर्ट दी जबकि न तो वहां खाने-पीने का पर्याप्‍त सामान था और न ही रहने की उचित सुविधा। तमाम मुश्किलों के बावजूद ये रिपोर्टर बाढ़ में फंसे लोगों का दर्द सारी दुनिया तक पहुंचाते रहे।

'एशियानेट न्‍यूज नेटवर्क' के सीईओ अमित गुप्‍ता ने बताया, 'हमने बाढ़ और बचाव कार्यों की लगातार कवरेज करने का निर्णय लिया था और इस बीच त्‍योहारी सीजन में भारी बुकिंग के बावजूद हमने सभी विज्ञापन छोड़ दिए थे। एक जिम्‍मेदारी मीडिया ब्रैंड के रूप में हम बाढ़ पीडि़तों का दर्द बांटने में लगे रहे। 40 टन से ज्‍यादा राहत सामग्री भेजने के अलावा केरल और कर्नाटक में लोगों के जीवन को पटरी पर वापस लाने के लिए हमारा स्‍टाफ लगतार जुटा हुआ है। केरल में राहत एवं बचाव कार्यों में जुटे विभिन्‍न एनजीओ से भी हम लगातार संपर्क बनाए हुए हैं और उन्‍हें जरूरी सहयोग कर रहे हैं। अब हमारा ध्‍यान बाढ़ से नष्‍ट हो चुके सड़कों और पुलों को दोबारा से तैयार करने की तरफ है, ताकि इन क्षेत्रों में आवाजाही बहाल हो सके।'  

तथ्‍यपरक रिपोर्टिंग पर रहा मनोरमा न्‍यूज का जोर (Manorama News focused on compassionate and fact-oriented reporting)

'मनोरमा न्‍यूज' (Manorama News) के सीनियर को-ऑर्डिनेटिंग एडिटर रोमी मैथ्‍यु ने बताया, 'हमारी पूरी कवरेज तथ्‍यपरक और आंकड़ों पर आधारित रही। जब हमने बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में अपने रिपोर्टरों को भेजा तो सबसे पहले हमने उनकी सुरक्षा को वरीयता दी और उनसे लगातार संपर्क में रहे। जब हालात बहुत ज्‍यादा खराब हो गए तो हमने यह सोचने के बजाय कि क्‍या गलत हुआ, इस बात पर जोर दिया कि इन हालातों से निकलने के लिए क्‍या किया जा सकता है। मनोरमा न्‍यूज ने भी इस दौरान विज्ञापनों से पूरी तरह दूरी बना ली थी और चौबीसों घंटे के लिए हेल्प डेस्‍क खोल दी गई थी। हमारे पास लोगों के लगातार मैसेज और फोन आ रहे थे जो मदद मांग रहे थे। हेल्‍प डेस्‍क द्वारा जुटाए गए सभी डाटा सरकारी अधिकारियों और बचाव अभियान में जुटी टीमों को सौंप दिए गए थे।'

मैथ्‍यु ने बताया, 'बाढ़ पीडि़त क्षेत्रों में जब राहत एवं बचाव कार्य तेजी से चल रहा था, तब हमने भी अपना ध्‍यान पीडि़तों को स्‍वास्‍थ्‍य एवं राहत सामग्री उपलब्‍ध कराने के लिए कर लिया था। हमने बाढ़ पीडि़तों से उनकी जरूरतों के बारे में जानकारी जुटानी शुरू कर दी थी और एनजीओ तथा बचाव कार्य में लगे लोगों को पीडि़तों की जरूरत के बारे में बताया जा रहा था।'

मैथ्‍यु ने यह भी बताया कि इदुक्‍की जिले के चेरुथोनी और मुन्‍नार क्षेत्र में भूस्‍खलन के कारण मनोरमा चैनल की रिपोटिंग टीम तीन दिनों तक वहां फंसी रही थी। उन तीन दिनों में टीम ने मात्र थोड़ी सी ब्रेड खाकर गुजारा किया। हालां‍कि हम उन्‍हें हेलिकॉप्‍टर के जरिये वहां से निकालने की योजना बना रहे थे लेकिन हमारी टीम के लोग बहुत बहादुर थे और वे स्‍थानीय लोगों और पुलिस अधिकारियों की मदद से वहां से किसी तरह निकलने में कामयाब रहे। हमने दूसरे लोगों की तरह न्‍यूज ब्रेक करने अथवा एक्‍सक्‍लुसिव तस्‍वीरें दिखाने पर ज्‍यादा जोर नहीं दिया बल्कि हमने पॉजीटिव न्‍यूज पर जोर दिया और मेरा मानना है कि केरल के न्‍यूज चैनलों के बारे में लोगों के मन में जो गलतफहमियां थीं, वे भी इस बाढ़ के साथ ही धुल गईं।     

मातृभूमि न्‍यूज ने भी बाढ़ की व्‍यापक कवरेज की (Mathrubhumi News also gave wide coverage on the Kerala floods)

'मातृभूमि न्‍यूज' के सीईओ मोहन नायर ने बताया, 'लोगों के लिए हमने 24x7 हेल्‍पलाइन नंबर खोल दिए थे। देश-विदेश से बाढ़ पीडि़तों की तलाश में मदद करने के लिए लगातार कॉल आ रही थीं। हमने भी अपनी रिपोर्टिंग से बाढ़ पीडि़तों के दर्द को बयां करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। इसके अलावा मातृभूमि न्‍यूज से विज्ञापन और अन्‍य प्रोग्राम हटाकर सिर्फ बाढ़ की रिपोर्टिंग की जा रही थी। हमने जिम्‍मेदाराना पत्रकारिता करते हुए देश-दुनिया के सामने राज्‍य में बाढ़ से होने वाले नुकसान की तस्‍वीर सामने रखी।  

फेक न्‍यूज पर लगाई रोक (Curbing fake news )

'मातृभूमि न्‍यूज' का फोकस इस बात पर भी रहा कि किसी भी तरह से फेक न्‍यूज न फैले और रिपोर्टिंग तथ्‍यों पर आधारित हो। इसके अलावा इस आपदा के दौरान विज्ञापन भी रोक लिए गए थे।  

'न्‍यूज 18 केरल' (News 18 Kerala) के नेशनल एडिटर टीजे श्रीलाल  ने कहा, 'केरल के लोगों के लिए बाढ़ का दौर काफी मुश्किल भरा था। हमारे रिपोर्टर चारों ओर फैले हुए थे, तब हमारा ध्‍यान टीम की सुरक्षा को सुनिश्चित करने पर भी था। लोगों के लिए 24x7 हेल्‍प डेस्‍क  खोलने के अलावा फेक न्‍यूज से निपटने के लिए हमने एक हेल्‍पलाइन भी खोल दी थी। इस हेल्‍पलाइन नंबर पर कॉल अथ्‍वा वॉट्सऐप के द्वारा लोग खबर की सच्‍चाई की पुष्टि कर सकते थे।'

बाढ़ पीडि़तों की मदद के लिए चलाए कैंपेन (Campaigns to help the flood victims)

बाढ़ पीडि़तों की मदद के लिए 'मातृभूमि न्‍यूज' ने 'Keralathinoru Kaithangu' कैंपेन भी चलाया। इस कैंपेन के जरिये ऐसी मुश्किल घड़ी में पाठकों से केरल के लोगों की मदद के लिए समर्थन की मांग की गई। इसके अलावा ' न्‍यूज 18 केरल ' की ओर से ‘Hridayam Thurakkam Veedu Thurakkam’ (Open your hearts, Open your homes) नाम से एक और कैंपेन चलाया गया। इस कैंपेन में लोगों से मांग की गई कि वे बाढ़ पीडि़तों को अस्‍थायी रूप से अपने घरों में शरण दें, इस कैंपेन को लेकर हमें लोगों की जबरदस्‍त प्रतिक्रिया मिली। इस कैंपेन का ही प्रभाव रहा कि एक कमरे के मकान में रह रहे लोग भी बाढ़ पीडि़तों को शरण देने को तैयार हो गए।'

इस बारे में 'द कारवां' (The Caravan) मैगजीन के विनोद के जोश ने अपने फेसबुक पेज पर लिखा है, 'बाढ़ की कवरेज में जिस तरह से यहां के पत्रकारों ने अपनी भूमिका निभाई, वह काफी सराहनीय है और इसे स्‍कूलों में केस स्‍टडी के तौर पर शामिल करना चाहिए।'

 



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क्या इंडिया टीवी के चेयरमैन रजत शर्मा का क्रिकेट की दुनिया में जाना सही है?

हां, उम्मीद है कि वे वहां भी उल्लेखनीय कार्य कर सुधार करेंगे

नहीं, जिसका काम उसी को साजे। उनका कर्मक्षेत्र मीडिया ही है

बड़े लोगों की बातें, बड़े ही जाने, हम तो सिर्फ चुप्पी साधे

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