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सूचना-प्रसारण मंत्री ने प्रसार भारती के कामकाज पर उठाया सवाल

Published At: Monday, 05 March, 2018 Last Modified: Monday, 05 March, 2018

समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।


सूचना प्रसारण मंत्रालय और प्रसार भारती में तनातनी की खबरों के बीच सूचना प्रसारण मंत्री स्मृति ईरानी ने प्रसार भारती के कामकाज पर सवाल उठाया है। 'जागरण राउंड टेबलमें विशेष चर्चा के दौरान उन्होंने अपने ‘मन की बात’ रखीजिसे दैनिक जागरण  ने विस्तार से प्रकाशित किया है। उनकी इस चर्चा को आप यहां पढ़ सकते हैं-

दैनिक जागरण की संपादकीय टीम के साथ राउंड टेबल में हुई विशेष चर्चा के दौरान सूचना प्रसारण मंत्री स्मृति ईरानी ने कहा कि निजी टेलिविजन ब्रॉडकास्टर आधे से भी कम खर्च में बेहतर कंटेंट उपलब्ध करा रहे हैं जबकि जनता के टैक्स के पैसे की बड़ी रकम खर्च करने के बावजूद प्रसार भारती के कार्यक्रमों की लोकप्रियता और गुणवत्ता संतोषजनक नहीं है। 'जागरण राउंड टेबलमें विशेष चर्चा में मंत्री ने साफ कर दिया है कि उन्हें कोई डरा नहीं सकता है। वह जानती हैं कि छवि बिगाड़ने की कोशिश हो रही है लेकिन वह सरकारी पैसे के खर्च की जवाबदेही का सवाल उठाना नहीं छोड़ेंगी।

प्रसार भारती की स्वायत्तता में दखलंदाजी-देश के एकमात्र सार्वजनिक ब्रॉडकास्टर प्रसार भारती की स्वायत्तता में दखलंदाजी की खबरें पिछले कुछ दिनों से चर्चा में रही हैं। स्मृति से जब टिप्पणी मांगी गई तो उन्होंने बेबाक कहा- इन खबरों का लक्ष्य यह होता है कि स्मृति ईरानी का थोड़ा हाथ मरोड़ दोजिससे समाज में उसकी गलत इमेज बने और वो सवाल पूछना छोड़ दे। लेकिन ऐसा नहीं होगामैं इस कुर्सी पर बैठी इसीलिए हूं कि जिम्मेदारी तय होटैक्सपेयर के पैसों का जवाब दिया जाए और संस्थान दूसरे ब्रॉडकास्टर की तुलना में अच्छा करे।'

स्मृति ईरानी ने कहा कि देश के आम आदमी के टैक्स का लगभग 2500 करोड़ रुपये हर साल पब्लिक ब्रॉडकास्टर को जिंदा रखने के लिए दिया जाता है, ताकि इन पैसों से देशभर में ब्रॉडकास्ट का एक नेटवर्क बिछाया जा सके और कॉन्टेंट क्वालिटी बेहतर बनाया जा सके। प्रसार भारती में कंटेंट को लेकर बहुत सारी चुनौतियां हैं। प्राइवेट ब्रॉडकास्टर प्रसार भारती के आधे बजट में बेहतर काम करके ज्यादा रेवेन्यू ले जाते हैं। ऐसे में सरकार और सूचना व प्रसारण मंत्रालय की जिम्मेदारी बनती है कि वो आयकर दाताओं के पैसे की जवाबदेही तय करे।

सरकार के अधीन प्रसार भारती

विशेष चर्चा के दौरान जब उनसे पूछा गया कि क्या वे उस दिशा में आगे कदम बढ़ाएंगी, जब प्रसार भारती को यूपीए के समय सरकार के अधीन लाने के प्रस्ताव पर विचार किया जा रहा था। इसके जवाब में उन्होंने कहा कि मैं इससे वाकिफ नहीं हूं फिर भी इसका समर्थन नहीं करती हूं क्योंकि स्वायत्तता के साथ जिम्मेदारी तय किया जाना संभव है। प्रसार भारती के कामकाज में अगर प्रबंधन में अनुशासन आ जाए तो सब कुछ दुरुस्त हो सकता है। लड़ाई की खबरों को तूल देकर कोई यह फैलाए कि सरकार का ध्येय प्रसार भारती को बंद करना है तो यह गलत है। यह तो यूपीए की सोच थी।

पीएम मोदी और मीडिया के रिश्ते-

पीएम मोदी और मीडिया के रिश्ते की कशमकश पर जब उनसे सवाल पूछा गया तो उन्होंने कहा कि न्यूज को बिना किसी व्यूज के प्रस्तुत करना होता है। लेकिन कुछ की नीति ही मोदी का विरोध है। पीएम ने खुद कहा है कि मोदी का विरोध देश के विरोध में न तब्दील हो जाए यह ध्यान में रखना चाहिए। नरेंद्र मोदी एक अकेले ऐसे नेता हैजो ऐसे कई अवरोधजहरीले हमलों के बावजूद नेता बनेक्योंकि देश की जनता उनके साथ है।

प्रिंट मीडिया में एफडीआई-

सरकार विदेशी निवेश को प्रोत्साहन दे रही है। जब उनसे पूछा गया कि क्या प्रिंट मीडिया में एफडीआई की मौजूदा सीमा भी बढ़ने की उम्मीद है, तो इस पर सूचना प्रसारण मंत्री ने जवाब दिया, ‘मेरा मानना है कि स्वदेशी प्रेस और उसके मालिकाना हक को ज्यादा तवज्जो मिले। आज क्रॉस ओनरशिप एक बड़ी चर्चा का मुद्दा बन चुका है। अगर हम विदेशी निवेश की बात करते हैंतो कहीं न कहीं मीडिया की संवेदनशीलता को समझना होगा। विदेशी निवेश कॉन्टेंट मेंमैनेजमेंट या संपादकीय में होयह एक चर्चा का विषय है।

एफएम रेडियो का विस्तार-

सरकार के एफएम रेडियो के विस्तार पर आगे बढ़ने के फैसले का खुलासा करते हुए सूचना प्रसारण मंत्री ने कहा कि देश भर में 600 नये एफएम रेडियो स्टेशनों की नीलामी की कैबिनेट ने मंजूरी दे दी है और यह प्रक्रिया जल्द शुरू होगी। हालांकि निजी एफएम रेडियो पर न्यूज कंटेंट को अनुमति नहीं दिये जाने की दो टूक बात कह स्मृति ने साफ कर दिया कि रेडियो न्यूज पर आकाशवाणी का एकाधिकार बना रहेगा। निजी एफएम चैनलों को आकाशवाणी के समाचार बुलेटिन को भी रिले करने की अनुमति नहीं मिलेगी।

बीबीसी की तर्ज चैनल-  

बीबीसी की तर्ज पर कोई चैनल शुरू करने की योजना के सवाल पर स्मृति ईरानी ने इस बात से भी इनकार कर दिया कि ऐसी कोई योजना है भी।

फेक न्यूज’ पर सूचना-प्रसारण मंत्रालय का पक्ष-

फेक न्यूज एक गंभीर मसला है जिसके जरिए एजेंडा सेट करने की कोशिश हो रही और तमाम विचारधाराओं के लोग इसका इस्तेमाल कर रहे हैं। ऐसे में जब उनसे सवाल किया गया कि उनका मंत्रालय इस पर क्या करने जा रहा, तो उन्होंने जवाब दिया कि इसे लेकर प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया से चर्चा की गई है। प्रेस काउंसिल के हस्तक्षेप के बावजूद एक ही रास्ता बचता है कि हम उनको रेवेन्यू से समर्थन देना बंद कर दें। ऐसा मामला हमारे सामने आता है तो डीएवीपी को निर्देश देते हैं कि ऐसे अखबार के पास भारत सरकार से जुड़ा कोई विज्ञापन न जा पाए। वैसे फेक न्यूज से बचाव के लिए हिंदुस्तान में ढ़ाल तो अखबार के एडिटर को ही बनना पड़ेगा।

(साभारदैनिक जागरण


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