Share this Post:
Font Size   16

हैप्पी बर्थडे कल्याणी शंकर: अब क्या बताऊं मैं कि तुझे, कि तेरे मिलने से क्या मिला...

Published At: Friday, 15 June, 2018 Last Modified: Friday, 15 June, 2018

गीताश्री

वरिष्ठ पत्रकार ।।

मेरे लिए कल्याणी

अब क्या बताऊं मैं कि तुझे

कि तेरे मिलने से क्या मिला...!

सन 2005 !!

ईरान यात्रा की तैयारी थी और लिस्ट मेरे हाथों में। कई अनजान नाम थे। कुछ पहले से परिचित तो कुछ अपरिचित। नाम से तो सबको जानती थी। वरिष्ठ पत्रकार कूमी कपूर जी की पहल पर इंडियन वीमेन प्रेस कोर ने पहली बार, क्लब के सदस्यों के साथ विदेश यात्रा का प्लान किया था। मेरी खास सहेलियां भी थीं। मुझे अतिरिक्त उत्साह तीन पसंदीदा पत्रकारों को लेकर था जिनमें रश्मि सक्सेना, कूमी कपूर और कल्याणी शंकर थीं। कल्याणी शंकर के साथ यात्रा के कुछ दिन सहेज सकूंगी, ये सोच कर बहुत उत्तेजित थी और नर्वस भी कि इतनी बडी पत्रकार हैं, पता नहीं मुझसे या हिंदी वालों से बात करेंगी या उपेक्षा भाव रखेंगी जैसा हम क्लब में पहले झेलते रहे हैं। ईरान यात्रा से पहले कल्याणी जी से दूर का नाता था। हम दूर-दूर से देखा करते और उनके प्रति आभार से भर जाते कि इन्होंने ही क्लब के लिए जगह दिलवाई या ये लोग हैं जिनकी वजह से आज क्लब बना और चल रहा है। जिन अठारह महिला पत्रकारों ने क्लब की कल्पना की थी और इसके लिए सारी कोशिशें की, उनमें से कल्याणी जी प्रमुख हैं। उन अठारह सदस्यों के प्रति हम सब हमेशा कृतज्ञ रहे।

कल्याणी जी के साथ यात्रा को लेकर संकोच भी था कि मैं दूर दूर रहूंगी, वो बात करेंगी तो करुंगी, नहीं तो नहीं। आखिर अभिमानी हम भी कम नहीं।

मैं चकित थी जब कल्याणी जी पूरे समूह में सबसे ज्यादा मुझसे हिली मिली। उनकी टूटी फूटी हिंदी तो इतना मज़ेदार कि मैं आग्रह करती - आप हिंदी में ही बोलिए !

वे बोलती- नई, हमारा हिंदी खराब है... तुम लोग हिंदी का जानकार है... हमारी गलती पकड़ लेगा...!

उनके अधेड़ चेहरे पर बच्चों सी कोमलता खेलती और मैं हंस पड़ती।

ऐ तुम हंसो मत मेरी हिंदी पर...

झूठमूठ का ग़ुस्सा होती तो उनका चेहरा दिपदिपा उठता। मैं सोचती कि यही वो लेडी हैं जो मेरे लिए दंतकथाओ में थीं। मैने इनके बारे में बहुत सुना था। जब मैं दिल्ली में सक्रिय थी तब ये वॉशिंगटन जा चुकी थी। मेरी मुलाक़ात तब नहीं हुई थी। तब वे मेरे लिए सिर्फ क़िस्सों में थीं। महिला पत्रकार वैसे भी कम थीं तब। जितनी थीं, वो सब मुझे प्रेरणा देती थीं। मैं उन सबके बारे में जानना चाहती थी। अधिकांश से दोस्ती गांठ चुकी थी। रिपोर्टिंग के दौरान सब मिलती थीं। कल्याणी जी, बाद में लौटी। उसके बाद वे यदा कदा मिलने लगीं। क्लब में भी अक्सर मुलाक़ातें। उस वक़्त वे सक्रिय थीं। मगर हम टोकते नहीं थे। अंग्रेज़ी के पत्रकारों की वैसे भी बहुत धाक होती थी। हिंदी वालों पर रोब रहता था। या हम क़स्बे से आए थे, खौफ आसानी से खा जाते थे। मुझे क्या पता था कि अक्सर चट्टानों के नीचे से नीली नदी बहती है... ठंडी और सफेद !!

एक यात्रा ने हमें ऐसा जोड़ा कि हम आज तक क़रीब हैं। जीवन से लेकर फेसबुक तक। ईरान यात्रा में सबसे अधिक उनका सहयोग और साथ मिला। ईरान के एक मशहूर शहर ईस्फहान की गलियों में घूमते हुए चांदी के गहने ख़रीदते हुए हम जो गुम हुए सो गुम हुए। एक पत्रकार साथी खो गईं जिन्हें बाद में तलाशा गया। वो क़िस्सा फिर कभी। कल्याणी जी को धैर्य के साथ मसले को हैंडल करते देखा। कूमी जी भावुकता में भय खाती रहीं। हम सबके होश उड़े हुए थे। कल्याणी जी ने सबको संभाला और फिर हमें वापस चांदी वाली गली में ले गईं जहां उन्होंने एक झुमका मुझे उपहार में दिया, वो आज तक मेरे पास है।

ईरान में शाकाहारी होने के नाते उन्हें खाने पीने में दिक्कत होती थी। मैं हैरान थी कि वो दही, चावल और घर से लाया हुआ अचार खा कर दस दिन तक मस्त रह सकती थीं। यायावरी के प्रति उनकी दीवानगी ऐसी कि वे घूमते हुए खाना पीना सब भूल सकती थीं। खाने को लेकर कोई शिकायत नहीं। बस बैग में अचार की शीशी साथ में रहा करती थी, खाने के टेबल पर निकाल कर धर देतीं। फिर तो हम सब उस पर टूट पड़ते। मैं वहां बमुश्किल चिकन खा पाती थी, इनके अचार ने मेरा भूख भी मिटाई !

यात्रा के बाद मेरे अपनों में एक बढ़ोतरी हुई थी- वो थीं कल्याणी जी। यात्रा का हासिल थीं वे।

फिर तो हम इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में अक्सर लंच करते। खूब राजनीतिक बातें होतीं। उसी दौरान उन्होंने बताया था कि वे पूर्व प्रधानमंत्री नरसिंह राव पर कोई महत्वपूर्ण किताब लिख रही हैं। इसलिए बाहर निकलना कम हो पा रहा है। मुझे मालूम था कि वे नरसिंह राव के कुछ क़रीबी पत्रकारों में से एक थीं। हिन्दुस्तान टाइम्स में समय की धाकड़ रिपोर्टर! उन्होंने कभी इसे छुपाया भी नहीं बल्कि मेरी कुछ जिज्ञासाएं थीं, राव के काम काज के तरीक़ों और फ़ैसले को लेकर तो उनसे पूछती। वे स्पष्ट करतीं! कई बातें साफ हुईं। वे आज भी उतनी ही स्पष्ट और धाकड़ हैं। उतनी ही दिलनशीं और दीवानी कि एक पैर दिल्ली में तो दूसरा विदेश में। पिछले दिनों एक किताब लिखने के सिलसिले में इटली के शांत आईलैंड पर एक महीने के लिए चली गई थीं। उनसे संवाद फेसबुक पर ही होता था। Inbox में बातें हो जातीं।

उन्होंने रिकमेंड किया कि कुछ बेहतर लिखना पढ़ना हो तो ऐसे ही किसी शांत द्वीप पर चली जाओ। जहां सिर्फ हवाएं, लहरों का शोर और नारियल के झुरमुट हो। कोई शोर शराबा नहीं।

ईरान के बाद कई बार उनसे बाहर जाने का प्लान बनता मगर वो देश में रहे तब ना! या कोई देश उनसे बचा हो तब न!

दुबारा साथ न जा सकी। चाहत अमर होती है, हमेशा बनी रहती है। पता नहीं कब फिर हम साथ हो लें।

उनकी आत्मीय मुस्कान, प्यारी -मीठी सी हिंदी याद कर रही हूं।

वो हिंदी पढ़ भी पाएंगी या पता नहीं। वे मेरे अपनेपन को महसूस कर लेती हैं। वो मेरी पसंदीदा महिला हैं जो देश की सबसे धाकड़ पत्रकार भी हैं। या पत्रकार हैं, इसलिए भी मुझे पसंद हैं। उनके व्यक्तित्व में जो निर्भयता है, बेबाक़ी है, जो राजनीतिक समझ बूझ है और जो उनके संपर्क सूत्र हैं, वो मुझे मोहने के लिए काफी हैं।

उनके जन्म दिन पर मेरी दुआएं उन तक पहुंचे !!


समाचार4मीडिया.कॉम देश के प्रतिष्ठित और नं.1 मीडियापोर्टल exchange4media.com की हिंदी वेबसाइट है। समाचार4मीडिया में हम अपकी राय और सुझावों की कद्र करते हैं। आप अपनी रायसुझाव और ख़बरें हमें mail2s4m@gmail.com पर भेज सकते हैं या 01204007700 पर संपर्क कर सकते हैं। आप हमें हमारे फेसबुक पेज पर भी फॉलो कर सकते हैं।

Tags headlines


पोल

सबरीमाला: महिला पत्रकारों को रिपोर्टिंग की मनाही में क्या है आपका मानना...

पत्रकारों को लैंगिक भेदभाव के आधार पर नहीं देखा जाना चाहिए

मीडिया को ऐसी बातों के खिलाफ एकजुट होकर आवाज उठानी चाहिए

महिला पत्रकारों को मंदिर की परंपरा का ध्यान रखना चाहिए

Copyright © 2018 samachar4media.com