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भारत बंद को लेकर संपादकों के बोल...

Published At: Thursday, 06 September, 2018 Last Modified: Thursday, 06 September, 2018


समाचार4मीडिया ब्‍यूरो।। 
केंद्र सरकार द्वारा सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलटते हुए एससी-एसटी एक्‍ट में संशोधन कर मूलस्वरूप में बहाल करने पर गुरुवार को देशभर में सवर्ण वर्ग ने विरोधस्‍वरूप भारत बंद का आह्वान किया था। देश में कई जगह हिंसक प्रदर्शन भी हुए। इस संवेदनशील मुद्दे पर देश के अनुभवी संपादकों के नजरिए को हमने कुछ यूं जाना...

कानून में बदलाव संसद में बहस के बाद हो :

आलोक मेहता, वरिष्‍ठ पत्रकार

किसी भी मसले पर संसद को कानून बनाने का अधिकार है। जरूरत पड़ने पर सुप्रीम कोर्ट उसमें आवश्‍यक व्‍यवस्‍था देता है। लेकिन गठबंधन की राजनीति का फायदा उठाने के लिए यदि राजनीतिक दल इसमें किसी तरह का बदलाव करते हैं, तो यह उचित नहीं है।

दरअसल, जातिगत वोटों को लुभाने के लिए राजनीतिक दलों द्वारा समय-समय पर इस तरह का काम किया जाता है जो बिल्‍कुल गलत है और मेरा मानना है कि राजनीतिक दलों को इस तरह की स्थिति से बचना चाहिए।

किसी भी अहम मसले पर कानून में इस तरह बदलाव नहीं करना चाहिए जिससे समाज में कटुता और वैमनस्‍यता पैदा हो, बल्कि इसके लिए संसद में उचित बहस होनी चाहिए। राजनीतिक दलों को कोई भी निर्णय सामाजिक हित में लेना चाहिए।

रही बात भारत बंद की तो इस दौरान विभिन्‍न जातिगत संगठन उभरकर सामने आए हैं और राजनीतिक दल ही उन्‍हें हवा दे रहे हैं। बंद के दौरान ऐसा माहौल नहीं बनाना चाहिए, जिससे हिंसा को बढ़ावा मिले।

मेरी नजर में विभिन्‍न जरूरी मुद्दों से ध्‍यान भटकाने के लिए अथवा अपनी कमजोरियों को छिपाने के लिए कुछ राजनीतिक दल इस तरह के माहौल को हवा देते हैं, जो बिल्‍कुल ठीक नहीं है।

प्रजातांत्रिक बहस होनी चाहिए, हिंसा नहीं :

अभिज्ञान प्रकाश, कंसल्टिंग एडिटरएनडीटीवी समूह

यह प्रजातंत्र है और इसमें विरोध की पूरी आजादी है। इसमें कोई दो राय नहीं है कि लोकतांत्रिक व्‍यवस्‍था में बंद की पारंपरिक जगह है और यह अब से नहीं बल्कि पुराने समय से ही चला आ रहा है। लेकिन मेरा मानना है कि बंद के दौरान यह ध्‍यान रखना चाहिए कि किसी भी तरह से सार्वजनिक जीवन बहुत ज्‍यादा प्रभावित न हो। इस दौरान मारपीट न हो, गुंडागर्दी न हो, यानी विरोध और बंद के नाम पर असामाजिक तत्‍वों को अपनी मनमर्जी करने की छूट नहीं मिलनी चाहिए।

रही बात एससी-एसटी मामले को लेकर भारत बंद की तो यह मामला व्‍यवस्‍था से जुड़ा हुआ है। इसके लिए उचित कानूनी प्रक्रिया का पालन होना चाहिए। संसद में इस मुद्दे पर प्रजातांत्रिक बहस होनी चाहिए। मैं फिर कहूंगा कि विरोध करना गलत नहीं है लेकिन उसमें हिंसा का समावेश नहीं होना चाहिए।

किसानों का आंदोलन ज्यादा अहम है:

राजेश बादल, वरिष्‍ठ पत्रकार

लोकसभा चुनाव का समय नजदीक आ रहा है। चुनावी साल में जो भी राजनीतिक व सार्वजनिक गतिविधियां होती हैं, जिनमें राजनेता अथवा जनप्रतिनिधि शामिल होते हैं, वे सब राजनीति से प्रेरित होती हैं।

यह काफी दुर्भाग्‍यपूर्ण है और यह नहीं होना चाहिए। हमारी लोकतांत्रिक प्रणाली में इसका असर दिखने लगा है। आज जो यह भारत बंद किया गया है, इसके मुकाबले विभिन्‍न राज्‍यों में चल रहा किसानों और मजदूरों का आंदोलन कमतर नहीं है। मेरी नजर में किसानों और मजदूरों का आंदोलन ज्‍यादा महत्‍वपूर्ण है।

दरअसल, एससी-एसटी मामले से हमारी न्‍यायिक प्रक्रिया भी जुड़ी हुई है। इसमें लंबा समय लग सकता है। सरकार इसमें त्‍वरित निर्णय नहीं ले सकती है। लेकिन यदि किसानों और मजदूरों का आंदोलन लंबा चला तो सरकार को काफी नुकसान उठाना पड़ सकता है। मेरा मानना है कि सरकार इस समय किसानों और मजदूरों का विरोध मोल लेने की स्थिति में नहीं है। मेरी नजर में यह सरकार के लिए परीक्षा की घड़ी है कि वह इनका विरोध कब तक सहन कर सकती है।  

शाहबानो केस की तरह हुई मिसहैंडलिंग :

विनोद अग्निहोत्री, सलाहकार संपादक, अमर उजाला

आज देश जिस जातिगत ध्रुवीकरण के दौर से गुजर रहा है, वह देश के भविष्‍य के लिए काफी खतरनाक है। जातियों के बीच विभाजन रेखा बनाकर राजनीतिक दल सिर्फ अपना स्‍वार्थ सिद्ध करने में जुटे हुए हैं। इस तरह के प्रदर्शनों से जाति समूह एक तरह से देश की सरकार और व्‍यवस्‍था को अपनी ताकत दिखाना चाहते हैं।

चाहे आरक्षण का मुद्दा हो या फिर एससी-एसटी एक्‍ट का मुद्दा हो, जरूरत है कि हमारे सभी राजनीतिक दलों के मुखिया आपस में बैठकर कोई सर्वमान्‍य हल निकालें। देश में बढ़ती बेरोजगारी इस तरह के सामाजिक असंतोष को जन्‍म दे रही है। ऐसे में बड़ी गंभीरता के साथ संवेदनशील मुद्दों से निपटना होगा।

जिस तरह से सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद उसकी व्‍याख्‍या हुई, उसके बाद सरकार के एक्‍शन और पब्लिक के रिएक्‍शन का ये परिणाम है। मुझे याद है 1990 की मंडल से लेकर कमंडल वाली राजनीति का दौर, जब देश एक आग में झोंक दिया गया था। उसके बाद 2000 के साथ नई शताब्‍दी शुरू हुई। देश की नई पीढ़ी विकास की राजनीति की बात करने लगी। गुड गवर्नेंस चर्चा का विषय बना और आज फिर देश उसी भयानक मोड़ पर जाता हुआ दिख रहा है।

जिस तरह कांग्रेस सरकार ने शाहबानो केस की मिसहैंडलिंग की, उसी तरह वर्तमान सरकार ने एससी-एसटी एक्‍ट को लेकर बर्ताव किया है।    

भाजपा के दोहरे चरित्र का प्रमाण है ये :

सुभाष गताडे, राजनीतिक जानकार

मेरा मानना है कि यह एक तरह से राजनीतिक किस्‍म का आंदोलन है और मध्‍य प्रदेश व राजस्‍थान के चुनावों को ध्‍यान में रखते हुए ही इसकी रूपरेखा तैयार की गई है, क्‍योंकि अचानक ही इस तरह के आंदोलन की कोई जरूरत ही नहीं थी।

दरअसल, इन दिनों कांग्रेस और बसपा के गठबंधन  की बात चल रही है, जिसकी काट के लिए ही इस तरह का काम किया गया है। रही बात आज के भारत बंद की तो मध्‍य प्रदेश और बिहार के कुछ हिस्‍सों को छोड़ दें तो देश में कहीं पर भी यह ज्‍यादा प्रभावी नहीं रहा है।

इसके अलावा इस मामले में भाजपा का दोहरा रवैया भी दिखाई देता है। जब इस मामले में सुप्रीम कोर्ट का निर्णय आया था तब सरकार ने इसमें ज्‍यादा रुचि नहीं दिखाई और मजबूत पैरवी के लिए वहां न तो अटॉर्नी जनरल को भेजा और न ही सॉलिसिटर जनरल को। इसके विरोध में दो अप्रैल का आंदोलन भी होने दिया। तब सरकार यह दिखाना चाहती थी कि वह सवर्णों के साथ है। अब इस तरह का निर्णय लेकर उसने एससी-एसटी वर्ग को यह दिखाने की कोशिश की है कि सरकार उनके साथ है। मेरा मानना है कि इस तरह का दोहरा चरित्र भाजपा को उल्‍टा भी पड़ सकता है।

नहीं चलने वालीं इस तरह की चालें :

उमेश कुमार, मैनेजिंग डायरेक्‍टर, समाचार प्‍लस

आज का भारत बंद जवाब है उस सरकार को, जिसने इस देश के बहुसंख्‍यक वर्ग को नजरअंदाज करने की हिमाकत की है। आज की पीढ़ी भेदभाव और जातिवाद से दूर है, ऐसे में उन्‍हें जातियों के दलदल में फंसाने की ये कोशिश है। सरकार को समझना होगा कि उसकी इस तरह की चालें 2019 के तख्त तक पहुंचाने में सहायक सिद्ध नहीं होंगी।

 अगर जनसंख्‍या की बात करें तो सवर्ण वर्ग इस देश में बहुत अहम भूमिका निभाता है, पर जिस हल्‍के तरीके से सरकार उसके साथ व्‍यवहार कर रही है, उसने आज इस वर्ग को सोचने, समझने और आंदोलन करने के लिए मजबूर कर दिया है।   

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