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मध्य प्रदेश के संपादकों ने बताया, कौन बना रहा है वहां सरकार...

Published At: Tuesday, 04 December, 2018 Last Modified: Tuesday, 04 December, 2018

समाचार4मीडिया ब्यूरो।।

मध्य प्रदेश के सियासी समर में कूदे प्रत्याशियों का भाग्य ईवीएम में कैद हो चुका है। 11 दिसंबर को यह साफ हो जाएगा कि राज्य में भाजपा एक बार फिर सत्ता की चाबी संभालती है या फिर कांग्रेस का वनवास ख़त्म होता है। अब तक जो रुझान सामने आ रहे हैं, उसमें भाजपा का ही पलड़ा भारी नज़र आ रहा है, लेकिन सियासत भी क्रिकेट की तरह है, जहां आखिरी गेंद पर कुछ भी हो सकता है। समाचार4मीडिया ने मध्य प्रदेश की राजनीति पर गहरी पकड़ रखने वाले पत्रकार/संपादकों से जानने का प्रयास किया कि आखिर इस बार जनता किसके मन की मुराद पूरी करने जा रही है?

'दैनिक भास्कर' के समूह संपादक आनंद पांडे की नज़र में भाजपा के सत्ता में वापसी की संभावना अपेक्षाकृत ज्यादा है। इसकी वजह वो बताते हैं कि कांग्रेस ऐसी कोई लहर पैदा करने में असफल रही, जो बदलाव की ज़रूरत को पुख्ता करती हो। पांडे के मुताबिक, इस बार के चुनाव में कुछ भी प्रिडिक्ट करना बेहद मुश्किल हो रहा है, लेकिन फिर भी भाजपा का पलड़ा भारी रह सकता है। क्योंकि कांग्रेस कोई मुद्दा खड़ा नहीं कर सकी। उन्होंने कहा, ‘मैं मानता हूं कि भाजपा के 15 सालों के शासन के खिलाफ लोगों में नाराज़गी थी, लेकिन क्या नाराज़गी इतनी ज्यादा थी कि उसे सत्ता से उखाड़कर फेंक दे? कांग्रेस चुनाव में ‘वक़्त है बदलाव का’ टैगलाइन के साथ उतरी, मगर बदलाव की वजह नहीं समझा पाई।

एक और बात जो मैं कहना चाहूंगा कि ये बंपर वोटिंग नहीं है, जैसा कि कहा जा रहा है। जो नए आंकड़े आए हैं, उनसे पता चलता है कि कुल मतदान कम हुआ है, प्रतिशत भले ही बढ़ा हो, लेकिन कुल वोटिंग कम हुई है। अगर मान भी लिया जाए कि मतदान पहले की अपेक्षा में बेहतर रहा, तो भी इसे एंटी एन्कम्बैसी फैक्टर का असर नहीं कहा जा सकता। मेरा अनुभव कहता है कि यदि दो-ढाई प्रतिशत वोटिंग बढ़ती भी है, तो ये जागरुकता की वोटिंग होती है। किसी दल के पक्ष या विपक्ष की नहीं। आमतौर पर चुनाव खास मुद्दों के इर्दगिर्द लड़े जाते हैं, मगर मध्य प्रदेश में ऐसा कुछ दिखाई नहीं दिया। यहां सीट-टू-सीट चुनाव हुए, यानी हर विधानसभा क्षेत्र का मुद्दा अलग रहा, जो बहुत हद तक प्रत्याशी से जुड़ा है। इसलिए ये कहना गलत नहीं होगा कि मध्य प्रदेश में एक विधानसभा चुनाव नहीं हुआ, बल्कि 230 विधानसभा चुनाव हुए हैं’।

‘पत्रिका’ के स्टेट हेड जिनेश जैन को लगता है कि इस बार कांग्रेस का वनवास ख़त्म होने के आसार काफी ज्यादा हैं। उन्होंने कहा, ‘ऐसा नहीं है कि भाजपा के लिए संभावना नहीं है, लेकिन उसका प्रतिशत कम है। मैंने जितने टूर किए और जो फीडबैक अपनी टीम से मिला, उसके आधार पर मैं कह सकता हूं कि इस बार का चुनाव मुख्यरूप से पार्टियों के बीच नहीं, बल्कि प्रत्याशियों के बीच हो रहा है। इस बार मोदी लहर पूरी तरह नदारद रही, लोगों ने मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री नहीं, बल्कि प्रत्याशी और क्षेत्र के समीकरणों को देखकर वोट दिए हैं। मुझे लगता है कि ये चुनाव काफी हद तक एंटी एन्कम्बैसी फैक्टर पर टिका हुआ है और कांग्रेस इसका कितना लाभ उठा पाती है, ये 11 दिसंबर को ही पता चलेगा, फिर भी जो ट्रेंड नज़र आ रहा है, वो कांग्रेस के पक्ष में है’।

भोपाल से प्रकाशित 'अग्निबाण' के संपादक  रविंद्र जैन को भी लगता है कि कांग्रेस का पलड़ा भारी रह सकता है। उनके मुताबिक, कांग्रेस ने किसानों के कर्ज माफ़ी की जो घोषणा की है, उसका फायदा उसे मिल सकता है। जैन के अनुसार, कांग्रेस को 130 के आसपास सीटें मिल सकती हैं। क्योंकि वोटिंग प्रतिशत उन क्षेत्रों में ज्यादा देखने को मिला है, जहां किसान ज्यादा हैं। किसान कर्ज से मुक्ति का इंतजार कर रहे थे, ऐसे में कांग्रेस की ये घोषणा उसके लिए संजीवनी साबित हो सकती है। किसान बहुल इलाकों में कांग्रेस के समर्थन में माहौल देखने को मिला है। इस लिहाज से देखें तो प्रारंभिक तौर पर कहा जा सकता है कि कांग्रेस मध्य प्रदेश में सरकार बनाने की स्थिति में आ सकती है।

वरिष्ठ पत्रकार और प्रदेश की राजनीतिक उथल-पुथल पर करीब से नज़र रखने वाले शिव अनुराग पटेरिया के मुताबिक, 15 साल तक जब कोई पार्टी सत्ता में रहती है, तो परिवर्तन की अवधारणा काम करने लगती है, लेकिन इसे रोकने के लिए भाजपा ने संघ और संगठन दोनों को पूरी तरह काम में लगाया। जहां भाजपा एक नियोजित पार्टी के तौर पर उपस्थित थी, वहीं कांग्रेस की फ़ौज कहीं नज़र नहीं आई। कांग्रेस को बदलाव की अवधारणा का फायदा मिल सकता है, लेकिन उसका मुकाबला एक ऐसी पार्टी से है जिसके पास संघ-संगठन और ज्यादा व्यवस्थित तौर-तरीके हैं। अब जनता ने किसे किस रूप में चुना है, इसका पता तो परिणाम आने के बाद ही चल पाएगा।

‘दैनिक जागरण’ भोपाल के संपादक मृगेंद्र सिंह के अनुसार, फ़िलहाल कुछ भी कहना मुश्किल है। क्योंकि 40-45 सीटें ऐसी फंसी हुईं हैं, जिनपर कोई भी जीत सकता है। उन्होंने कहा कि कांग्रेस और भाजपा की 80-80 सीटें लगभग पक्की हैं, ऐसे में ये 40 सीटें अहम् भूमिका निभाएंगी। संबल योजना और प्रधानमंत्री आवास योजना भाजपा का प्लस पॉइंट हैं, वहीं कांग्रेस को कर्ज माफ़ी की घोषणा का लाभ मिल सकता है। इस घोषणा का व्यापक पैमाने पर असर तो हुआ है। आंकड़े बताते हैं कि किसानों ने कोर्पोरेटिव सोसाइटियों को धान बेचा ही नहीं है, वो कांग्रेस के सत्ता में आने के इंतजार में हैं। मौजूदा व्यवस्था के हिसाब से किसान जो धान बेचता है, उसमें से कर्ज की राशि काटने के बाद उसे बकाया का भुगतान किया जाता है। इसलिए किसान फ़िलहाल वेट एंड वॉच की भूमिका में हैं।

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