Share this Post:
Font Size   16

चौथी दुनिया ने बताया, मोदी सरकार का खतरनाक नसबंदी अभियान...

Wednesday, 10 January, 2018

मोदी सरकार के ताकतवर और हठी स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्‌डा ने जुलाई 2017 में मिशन परिवार विकासके नाम पर मिशन परिवार विनाशअभियान की शुरुआत कर दी। नड्‌डा ने खुलेआम कहा कि इसके जरिए वे 2025 तक देश की जनसंख्या को काबू में ले आएंगे। कैसे काबू में लाएंगे, अब तक तो आप इसे समझ ही चुके होंगे।चौथी दुनिया में छपी अपने एक रिपोर्ट में ये कहा वरिष्ठ पत्रकार प्रभात रंजन ने। उनकी पूरी रिपोर्ट आप यहां पढ़ सकते हैं। ये रिपोर्ट चौथी दुनिया की है और समाचार4मीडिया इसके लिए किसी तरह का उत्तरदायी नहीं है...

मोदी सरकार का खतरनाक नसबंदी अभियान

जनसंख्या वृद्धि रोकने के लिए केंद्र सरकार देश की मांओं को बांझ बनाने की दवा चुभो रही है। राष्ट्रधर्मी मोदी सरकार का स्वास्थ्य मंत्रालय बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन के साथ मिल कर महिलाओं में वह जहर इंजेक्ट कर रहा है जो खूंखार यौन अपराधियों को ‘केमिकल कैस्ट्रेशन’ की सजा के तहत ठोका जाता है। बलात्कारियों और यौन अपराधियों की यौन-ग्रंथी नष्ट करने के लिए दी जाने वाली दवा ‘मिशन परिवार विकास’ के नाम पर महिलाओं में अनिवार्य रूप से इंजेक्ट की जा रही हैताकि देश की जनसंख्या कम की जा सके। यह ‘मिशन परिवार विनाश’ अभियान है जो विदेशी कुचक्र और धन के कंधे पर चढ़ कर भारत के सात राज्यों के 145 जिलों में दाखिल हो चुका है। इनमें उत्तर प्रदेश के 57 जिले शामिल हैं। मोदी सरकार के ‘मिशन परिवार विनाश’ कार्यक्रम के लिए भाजपा शासित सात राज्य चुने गए हैंजिससे धन और षडयंत्र का खेल निर्बाध रूप से खेला जा सके। उत्तर प्रदेश समेत बिहारझारखंडअसम,मध्यप्रदेशछत्तीसगढ़ और राजस्थान के 145 जिलों के जिला अस्पतालोंसामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों के जरिए महिलाओं को ‘डिपो मेडरॉक्सी प्रोजेस्टेरोन एक्सीटेट’ (डीएमपीए) इंजेक्शन अनिवार्य रूप से दिया जा रहा है। यही दवा कई देशों में खूंखार यौन अपराधियों की यौन-ग्रंथी नष्ट करने के लिए सजा के बतौर इंजेक्ट की जाती है।

अधिक जनसंख्या वाले सात भाजपा शासित राज्यों के अधिक से अधिक जिलों में ‘मिशन परिवार विनाश’ का धंधा फैलाने के लिए जेपी नड्‌डा के नेतृत्व वाले केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने आधिकारिक आंकड़ों का सुनियोजित ‘फ्रॉड’ किया। आंकड़ों का फर्जीवाड़ा करने के लिए स्वास्थ्य मंत्रालय ने राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण का वर्ष 2010-11 का पुराना डाटा उठा लिया और नेशनल टोटल फर्टिलिटी रेट 3.दिखा कर अधिक से अधिक जिलों को अपनी चपेट में लेने का कुचक्र रचा। केंद्रीय सत्ता के इस नियोजित ‘फ्रॉड’ में यूपी का फर्टिलिटी रेट 5 दिखाया गया और इस आधार पर यूपी के 57 जिलों में धंधा फैला लिया गया। राष्ट्रीय स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस-4) का ताजा आंकड़ा 2015-16 का हैजो यह बताता है कि देश का टोटल फर्टिलिटी रेट घट कर 2.पर आ चुका है। ताजा आंकड़े के मुताबिक उत्तर प्रदेश का फर्टिलिटी रेट 2.पर आ गया है। अगर स्वास्थ्य मंत्रालय इस अद्यतन (करेंट) आंकड़े को आधार बनाता तो इंजेक्शन का कुचक्र बहुत कम जिलों में फैल पाता। लेकिन स्वास्थ्य मंत्रालय ने जानबूझ कर पुराने आंकड़े (एनएफएचएस-3) को आधार बनाया और अधिकाधिक जिलों का चयन कर लिया। ताजा आंकड़ों के आधार पर मिशन परिवार विकास का दायरा कम जिलों में ही केंद्रित होतालेकिन अधिक स्थानों पर घुसने के लिए सरकार और गेट्स फाउंडेशन ने बढ़ा हुआ टीएफआर दिखा कर देशभर के 145 जिलों और यूपी के 57 जिलों में घुसपैठ बना ली। सुनियोजित फर्जीवाड़े की जमीन तैयार कर मांओं में जहर निरूपित करने और देश को बांझ बनाने का धंधा चल रहा है। यौन अपराधियों को सजा के बतौर दिया जाने वाला इंजेक्शन डीएमपीए सात राज्यों के 145 जिला अस्पतालों तक पहुंच चुका है और बड़ी तेजी से सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों तक पहुंचने वाला है। जिलासामुदायिक और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों और मददगार विभागों और संस्थाओं को बाकायदा यह टार्गेट दिया गया है कि वे अधिकाधिक संख्या में महिलाओं में डीएमपीए दवा इंजेक्ट करें।

ये ‘अंतरा’ खतरनाक है

अंतरा’ के नाम से दिया जाने वाला इंजेक्शन डिपो मेडरॉक्सी प्रोजेस्टेरोन एक्सीटेट’ (डीएमपीए) महिलाओं को भीषण रोग की सुरंग में धकेल रहा है। इस दवा के इस्तेमाल के कुछ ही दिनों बाद महिलाएं फिर मां बनने लायक नहीं रह जातीं। अगर बनती भी हैं तो बच्चे इतने कमजोर होते हैं कि शीघ्र मौत के शिकार हो जाते हैंजो बच जाते हैं वे विकलांग और पंगु होकर रह जाते हैं। विश्व के कई देशों में खतरनाक यौन अपराधियों की यौन ग्रंथि को रासायनिक विधि से नष्ट करने (केमिकल कैस्ट्रेशन) के लिए डेपो-प्रोवेरा (डीएमपीए) इंजेक्शन का इस्तेमाल किया जाता रहा है। फार्माकोलॉजी विशेषज्ञों का कहना है कि डीएमपीए के इस्तेमाल से स्थायी तौर पर शारीरिक परिवर्तन हो जाता है और हडि्‌डयां गलने लगती हैं। पुरुषों में इसका इस्तेमाल करने से उन्हें हृदयाघात और ऑस्टियोपोरोसिस का खतरा रहता है। पुरुषों की छाती महिलाओं की तरह फूलने लगती है। इसका इस्तेमाल करने वाली महिलाओं का शारीरिक विन्यास विद्रूप हो जाता हैहड्‌डी के घनत्व (बोन-मास) में गलन और संकुचन होने लगता हैहोठ का रंग बदलने लगता हैबाल झड़ने लगते हैं और मांसपेशियों का घनत्व भी गलने लगता है। डीएमपीए इंजेक्शन ऑस्टियोपोरोसिस और स्तन कैंसर होने में योगदान देता है और इसके इस्तेमाल से कालांतर में गर्भधारण करना मुश्किल हो जाता है। यह एचआईवी के संक्रमण का आसान मददगार बन जाता है। चिकित्सा विशेषज्ञ कहते हैं कि डीएमपीए के मामले में स्थिति अत्यंत जटिल है। विडंबना है कि देश की मांओं में डीएमपीए दवा इंजेक्ट करने के लिए सरकार प्रायोजित ‘फ्रॉड’ तो हुआलेकिन इस खतरनाक दवा के कारण महिलाओं में होने वाले ऑस्टियोपोरोसिस और स्तन कैंसर जैसे तमाम जानलेवा रोगों को लेकर कोई सरकार प्रायोजित शोध नहीं हुआ। डीएमपीए इंजेक्शन का इस्तेमाल करने के एक वर्ष के अंदर 55 प्रतिशत महिलाओं के मासिक धर्म में अप्रत्याशित बदलाव देखा गया है और दो वर्ष के अंदर इस अप्रत्याशित घातक बदलाव ने 68प्रतिशत महिलाओं को अपने घेरे में ले लिया।

इसका इस्तेमाल करने वाली महिलाओं में एचआईवी और यौन संक्रमण (क्लैमाइडिया इन्फेक्शन) का खतरा अत्यधिक बढ़ जाता है। डीएमपीए इंजेक्शन का इस्तेमाल करने वाली महिलाएं बाद में जब गर्भधारण करना चाहती हैं तब पैदा होने वाला उनका बच्चा अत्यंत कम वजन का होता है और अधिकतर मामलों में ऐसे बच्चों की साल भर के अंदर मौत हो जाती है। दवा का इस्तेमाल करने वाली महिलाओं के कालांतर में गर्भधारण करने के बाद होने वाले बच्चों के यौन संक्रमित होने का खतरा अत्यधिक रहता है। इसका इस्तेमाल करने वाली महिलाओं के मस्तिष्क तंत्र पर भी बुरा असर पड़ता है। इस दवा से ब्रेस्ट कैंसर के अलावा सर्वाइकल (रीढ़ की हड्‌डी) का कैंसर होने का भी बड़ा खतरा रहता है। वर्ष 2006 का एक अध्ययन बताता है कि दवा के दो साल के प्रयोग से ऑस्टियोपोरोसिस होने की संभावना प्रबल हो जाती है। वर्ष 2012 के एक अध्ययन में यह पता चला कि 12 महीने या उससे अधिक समय तक डीएमपीए के उपयोग से आक्रामक स्तन कैंसर होने के कई केस सामने आए। डीएमपीए इंजेक्ट करने के पहले सम्बन्धित महिला को आगाह (कॉशन) करना जरूरी होता है। साथ ही डॉक्टर का यह दायित्व भी होता है कि वह इंजेक्शन लेने वाली महिला को डीएमपीए से होने वाले नुकसान के बारे में पहले ही बता दे। लेकिन ऐसा नहीं हो रहा है। ‘अंतरा’ के पैकेट्स पर भी हिदायत या जोखिम की चर्चा नहीं हैयहां तक कि दवा निर्माता कंपनी का नाम भी दर्ज नहीं है। सामान्य तौर पर बच्चों को दिए जाने वाले टीके में भी चार हिदायतों के साथ टीका लगाया जाता हैलेकिन डिम्पा इंजेक्शन लगाने के पहले कोई हिदायत नहीं दी जा रही है। दिहाड़ी मजदूर मुकेशचंद्र की पत्नी का नाम महज एक उदाहरण के बतौर पेश किया जा रहा हैजिसे डिम्पा इंजेक्शन लगाया गया और उन्हें इसका खामियाजा भुगतना पड़ा। इंजेक्शन के पहले मुकेश की पत्नी पूरी तरह से स्वस्थ थीलेकिन कुछ ही दिनों बाद उनकी हालत बिगड़ने लगी। 20 दिन में ही इतना रक्तस्राव हुआ कि एक निजी अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। डिम्पा इंजेक्शन लगाने वालों का कुछ पता नहीं चला। महिला की हालत गंभीर हुई तो महिला के पहले से ही बीमार होने का तोहमत मढ़ दिया गया। मुकेश की पत्नी की तरह के दर्जनों उदाहरण सामने आ चुके हैंजो इंजेक्शन का नतीजा अपने शरीर और अपनी सीमित आर्थिक क्षमता पर भुगत रहे हैं। डीएमपीए इंजेक्शन महिलाओं को रोगग्रस्त कर भावी नस्लों को खराब करने की साजिश साबित हो रहा है।

केंद्र सरकार का यह अभियान देश के निम्न वर्गीयनिम्न मध्यम वर्गीय ग्रामीण और गांव आधारित अशिक्षितअर्ध-शिक्षित कस्बाई आबादी को टार्गेट कर रहा है। जिला स्वास्थ्य केंद्रों से लेकर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों के जरिए ‘अंतरा’ के नाम से डीएमपीए दवा का इंजेक्शन महिलाओं में ठोका जा रहा है। जिला स्वास्थ्य केंद्रोंसामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों तक कौन सी महिलाएं जाती हैं और वे किस वर्ग से आती हैं,इसके बारे में सबको पता है। स्वास्थ्य केंद्रों को अधिकाधिक इंजेक्शन लगाने का लक्ष्य दिया गया है। इन स्वास्थ्य केंद्रों पर तैनात डॉक्टरों को यह भी नहीं कहा गया है कि इंजेक्शन देने के पहले वे सम्बन्धित महिला का हारमोनल-असेसमेंट करें उसे डीएमपीए इंजेक्शन के खतरों के प्रति आगाह करें। इंजेक्शन के स्टरलाइजेशन और उसके रख-रखाव को लेकर कोई हिदायत नहीं है। यहां तक कि महिलाओं को खुद ही इंजेक्शन ले लेने की सलाह दी जा रही है। इंजेक्शन देने के पहले सम्बद्ध महिला से सहमति लेने की औपचारिकता केवल कागज पर पूरी की जा रही है। महिलाओं से बिना पूछे धड़ल्ले से इंजेक्शन ठोका जा रहा है। जिस वर्ग से महिलाएं आती हैंउनकी जागरूकता का स्तर उन्हें इस काबिल ही नहीं बनाता कि वे लगने वाले इंजेक्शन के खतरों और जोखिम के बारे में कुछ जान पाएं। बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन दवा बनाने वाली बहुराष्ट्रीय कंपनी ‘फाइज़र’ और चिल्ड्रेन्स इन्वेस्टमेंट फंड फाउंडेशन के साथ मिल कर कई गरीब देशों में डीएमपीए को ही ‘सायाना-प्रेस’ नाम से बेच रहा है। डीएमपीए इंजेक्शन सिरिंज के जरिए दिया जाता है जबकि ‘सायाना-प्रेस’ के पाउच में सुई लगी होती है। सुई को शरीर में चुभोकर पाउच का सिरा दबा देने से दवा शरीर के अंदर इंजेक्ट हो जाती है। स्वास्थ्य मंत्रालय के सूत्र बताते हैं कि भारत में भीसायाना-प्रेस’ को सीधे महिलाओं को देने की तैयारी चल रही है।

डीएमपीए इंजेक्शन और बिल एंड मेलिंडा गेट्‌स फाउंडेशन 

डीएमपीए का इस्तेमाल 1993-94 में कुछ खास प्राइवेट सेक्टर में हो रहा था। कई सामाजिक संस्थाएं इस इंजेक्शन के इस्तेमाल पर बैन लगाने की सुप्रीमकोर्ट से मांग कर रही थीं। 1995 में ड्रग्स टेक्निकल एडवाइज़री बोर्ड (डीटीएबी) और सेंट्रल ड्रग्स स्टैंडर्ड कंट्रोल ऑरगेनाइजेशन ने खास तौर पर राष्ट्रीय परिवार नियोजन अभियान में डीएमपीए के इस्तेमाल को प्रतिबंधित कर दिया था। बोर्ड ने कहा था कि विशेष स्थिति में यह इंजेक्शन उसी महिला को लगाया जाएगा, जो इसके खतरों और जोखिम के बारे में जानकारी के साथ बाकायदा सूचित रहेंगी। वर्ष 2001 में कई दवाएं प्रतिबंधित हुईलेकिन डीएमपीए को प्रमोट करने वाली लॉबी इतनी सशक्त थी कि वह बैन नहीं हुईबस उसे प्राइवेट सेक्टर में सीमित इस्तेमाल की मंजूरी मिलीइस हिदायत के साथ कि इंजेक्शन का इस्तेमाल उन्हीं महिलाओं पर किया जाएगा जिनकी पहले काउंसलिंग होगी और उन्हें खतरों के बारे में आगाह कर उनकी औपचारिक सहमति ली जाएगी।

डीएमपीए इंजेक्शन के इस्तेमाल को लेकर हो रही कानूनी और व्यापारिक खींचतान में बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन के कूद पड़ने से डीएमपीए लॉबी मजबूत हो गई। फाउंडेशन ने पहले तो वर्ष 2012 में ब्रिटिश सरकार को साधा और फिर विश्व के विकासशील और गरीब देशों में जनसंख्या नियंत्रण में सहयोग देने के बहाने अपना रास्ता साफ कर लिया। फाउंडेशन ने मोदी सरकार के स्वास्थ्य मंत्रालय को साधा और स्वास्थ्य मंत्रालय ने ‘सधते’ हुए परिवार कल्याण विभाग के जरिए ड्रग्स टेक्निकल एडवाइज़री बोर्ड (डीटीएबी) के पास प्रस्ताव भिजवाया कि डीएमपीए इंजेक्शन के इस्तेमाल पर लगी पाबंदी हटाई जाए। डीटीएबी ने उस समय इस प्रस्ताव को टाल दिया और कहा कि इंजेक्शन का कुप्रभाव और गहरा गया है। इसका इस्तेमाल करने वाली महिलाओं पर ओस्टिपोयोरोटिक-कुप्रभाव भीषण पड़ रहा है। लिहाजाडीटीएबी ने परिवार कल्याण विभाग को यह सलाह दी कि डीएमपीए इंजेक्शन के इस्तेमाल के बारे में देश के नामी स्त्री रोग विशेषज्ञों (गायनाकोलॉजिस्ट) से राय ली जाए और इसकी गहन पड़ताल कराई जाए। डीटीएबी ने अमेरिका के फूड और ड्रग्स एडमिनिस्ट्रेशन द्वारा डीएमपीए को ‘ब्लैक-बॉक्स’ में रखे जाने का हवाला भी दिया। लेकिन लोकतांत्रिक मोदी सरकार के स्वास्थ्य मंत्रालय ने इस सलाह पर कोई ध्यान नहीं दियाउल्टा चारों तरफ से दबाव बढ़ा दिया गया और सम्बद्ध महकमों पर सरकार का घेरा कस गया।

·   महिलाओं में इंजेक्ट कर रहे हैं यौन-अपराधियों को सजा में दी जाने वाली दवा

·   बिल गेट्स फाउंडेशन से साठगांठ कर स्वास्थ्य मंत्रालय कर रहा घिनौना कारनामा

·   जनसंख्या नियंत्रण के नाम पर यूपी-बिहार समेत 7 राज्यों में शुरू हुआ गंदा खेल

·   देश की निम्न वर्गीय और निम्न-मध्यम वर्गीय माताओं को बांझ बनाने का कुचक्र

·   आंकड़ों का ‘फ्रॉड’ कर स्वास्थ्य मंत्रालय ने 145 जिलों में पहुंचाया डीएमपीए जहर

·   स्वास्थ्य केंद्रों को दिया टार्गेटअधिक से अधिक महिलाओं को दें डिम्पा इंजेक्शन

·   मिशन परिवार विनाश’ साबित हो रहा है भारत सरकार का ‘मिशन परिवार विकास

मंत्रालय के निर्देश पर परिवार कल्याण विभाग ने 24 जुलाई 2015 को विशेषज्ञों का सम्मेलन बुलाया और इस मसले पर विशेषज्ञों से सलाह-सुझाव लेने का प्रायोजित-प्रहसन खेला। इस सम्मेलन में उन संस्थाओंविशेषज्ञों और समाजसेवियों को बुलाया ही नहीं गयाजो डीएमपीए जैसी खतरनाक दवा के इस्तेमाल पर लगातार विरोध दर्ज कराते रहे और कानूनी लड़ाई लड़ते रहे हैं। एक हजार से अधिक संगठनों की साझा संस्था जन स्वास्थ्य अभियानसहेलीसामा जैसी तमाम संस्थाओं को इस सम्मेलन में प्रवेश नहीं करने दिया गया। इस सम्मेलन ने यह तय भी कर लिया कि प्राइवेट सेक्टर में डीएमपीए इंजेक्शन का इस्तेमाल पहले से हो रहा हैइसलिए इसकी अलग से जांच कराने की कोई जरूरत नहीं है और अब इसे सार्वजनिक क्षेत्र में भी आजमाना चाहिए। दिलचस्प मोड़ यह आया कि अब तक विरोध दर्ज करते आ रहे ड्रग्स टेक्निकल एडवाइज़री बोर्ड ने सामुदायिक स्वास्थ्य प्रणाली (पब्लिक हेल्थ सिस्टम) में डीएमपीए इंजेक्शन का इस्तेमाल किए जाने की 18 अगस्त 2015 को मंजूरी दे दी। इस तरह मोदी सरकार ने देश की मांओं को बांझ बनाने वाली और भावी नस्ल को पंगु और विकलांग पैदा करने वाली दवा के अराजक इस्तेमाल की भूमिका मजबूत कर दी। डीएमपीए जैसी खतरनाक दवा के इस्तेमाल का विरोध करने वाले लोगों का मुंह बंद करा दिया गया और मीडिया के मुंह पर ‘ढक्कन’ पहना दिया गयाताकि कोई शोर न मचेकोई वितंडा न खड़ा हो।

मोदी सरकार के ताकतवर और हठी स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्‌डा ने जुलाई 2017 में ‘मिशन परिवार विकास’ के नाम पर ‘मिशन परिवार विनाश’ अभियान की शुरुआत कर दी। नड्‌डा ने खुलेआम कहा कि इसके जरिए वे 2025 तक देश की जनसंख्या को काबू में ले आएंगे। कैसे काबू में लाएंगेअब तक तो आप इसे समझ ही चुके होंगे। नड्‌डा ने यह भी दावा किया था कि इस परियोजना की पहल उन्होंने ही की है। स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के सचिव सीके मिश्रा ने इस परियोजना के पक्ष में लंदन से अपना संदेश दिया। इस पर बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन की सह अध्यक्ष मेलिंडा गेट्स ने कहा कि बच्चों के बेहतर भविष्य के लिए यह काम किया जा रहा है। मिशन परिवार विकास लॉन्च करते हुए केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्‌डा ने दावा किया कि इस अभियान के जरिए वर्ष 2025 तक टोटल फर्टिलिटी रेट को 2.1 पर ले आया जाएगा। जबकि सच्चाई यह है कि देश का टोटल फर्टिलिटी रेट 2015-16 के सर्वेक्षण में ही 2.1 दर्ज किया जा चुका है। स्पष्ट है कि आधिकारिक आंकड़ों के फर्जीवाड़े में केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्‌डा की सीधी मिलीभगत है। 

बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन के फंड पर चलने वाले इस अभियान की मॉनिटरिंग गेट्स फाउंडेशन का इंडिया हेल्थ एक्शन ट्रस्ट कर रहा है। इस सिलसिले में बिल गेट्स और उनकी पत्नी मेलिंडा गेट्स केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्‌डायूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथबिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार व अन्य सम्बद्ध राज्यों के मुख्यमंत्रियों से लगातार सम्पर्क में हैं। उनकी सौहार्द मुलाकातें भी लगातार हो रही हैं। मिशन की फंडिंग का ब्यौरा क्या हैमिशन के ऑपरेशन का खर्च कहां से आ रहा हैदवा कहां से आ रही हैइसकी कीमत क्या हैइस पर रहस्य बना कर रखा जा रहा हैकोई पारदर्शिता नहीं है। बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन के आगे-पीछे सरकारें नाच रही हैं। फाउंडेशन के आगे विश्व स्वास्थ्य संगठन जैसी अंतरराष्ट्रीय संस्था भी नतमस्तक रहती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन को फाउंडेशन ने 40 अरब डॉलर का फंड दे रखा है। इसके अलावा बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन विश्व स्वास्थ्य संगठन (वर्ल्ड हेल्थ ऑरगेनाइजेशन) को हर साल तीन अरब डॉलर देता हैजो संगठन के सालाना बजट का 10 प्रतिशत होता है। पूरी दुनिया के स्वास्थ्य-अर्थशास्त्र पर बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन और उसके ‘सिंडिकेट’ का बोलबाला हैफिर मोदी सरकारयोगी सरकारनीतीश सरकाररघुबर सरकारसिंधिया सरकाररमन सरकार, शिवराज सरकार और सोनोवाल सरकार क्या बला है..!

 

समाचार4मीडिया.कॉम देश के प्रतिष्ठित और नं.1 मीडियापोर्टल exchange4media.com की हिंदी वेबसाइट है। समाचार4मीडिया में हम अपकी राय और सुझावों की कद्र करते हैं। आप अपनी राय, सुझाव और ख़बरें हमें mail2s4m@gmail.com पर भेज सकते हैं या 01204007700 पर संपर्क कर सकते हैं। आप हमें हमारे फेसबुक पेज पर भी फॉलो कर सकते हैं। 

Tags headlines


Copyright © 2018 samachar4media.com