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मिशन, प्रफेशन और कमीशन वाली मीडिया आज कहां खड़ी है...

Published At: Tuesday, 18 September, 2018 Last Modified: Tuesday, 18 September, 2018

अमर आनंद

वरिष्ठ पत्रकार ।।

हताश मत होइए, हल तलाशिए

मीडिया संस्थानों के छात्रों के सामने डगमगाती हुई मीडिया इंडस्ट्री को जगमगाती हुई मीडिया इंडस्ट्री बता कर बड़े-बड़े मीडिया आइकॉन के द्वारा दिया जाने वाला भाषण उस पल के लिए वाकई आह्लादित करता है और ऐसा लगता है कि पत्रकारिता की राह पर कदम रखने वाले हमारे नौनिहाल एक खुशहाल करियर की तरफ बढ़ रहे हैं मगर ये मान लेना हकीकत से मुंह चुराना होगा।

सूरते हाल पर अगर गौर करें तो देश के बड़े-बड़े मीडिया संस्थानों के छात्र भी नौकरी के लिए दूसरी स्ट्रीम्स के छात्रों की तुलना में कम धक्के नहीं खा रहे हैं। मीडिया इस्टीट्यूट्स के 50 में से 30 छात्र ही समुचित जगह पा रहे हैं। देश के बड़े-बड़े चैनलों और यूनिवर्सिटीज में पढ़ाई जाने वाली पत्रकारिता के छात्रों की हालत क्या होगी, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। आप मीडिया संस्थानों के पत्रकारिता संस्थानों के प्लेसमेंट का रेशियो देखिए आपको खुद पता चल जाएगा। हालांकि इस मामले में कोई उपलब्ध आंकड़ा आपको नहीं मिलेगा, जो भी जानकारी मिलेगी वो अपुष्ट और लोगों से बातचीत पर ही आधारित होगी।

पत्रकारिता में आ रही नई पौध को जॉब सिक्योरिटी के लिहाज से अगर सोचना है तो उन लोगों के उदारहण जरूर ध्यान में रखें, जो बिना किसी वजह के, बिना किसी गलती के सिर्फ इस बात के लिए नौकरी से रुखसत किए जा रहे हैं कि उनकी उम्र चालीस के पार हो चुकी है। अगर वो बॉस के बनाए गए खांचे में किसी तरह फिट होकर परिक्रमा पद्धति के हिसाब से चल पा रहे हैं तो कुछ दिन और चल जाएंगे, लेकिन तब तक जब तक नया बॉस नहीं आता है। मीडिया में बॉस बदलने के बाद 'सारे घर को बदल डालूंगा...' के अंदाज में स्टाफ की छंटनी के कई उदाहरण है।

हाल के दिनों में और इन दिनों भी कुछ चैनलों और मीडिया संस्थानों से आ रही छंटनी की खबरें परेशान करने वाली हैं। खास तौर से उनके लिए जो चालीस के पार हो गए हैं, जिनके बच्चे कॉलेज का रुख करने वाले हैं, जिनकी हर महीने ईएमआई जाती है।

मीडिया की चाल, उसका चरित्र और उसका चेहरा कितना पत्रकारों के मुताबिक है, ये सवाल किसी भी पत्रकार से कीजिए, अगर वो दिल से बोलेगा, तो ये जरूर बोलेगा कि ये दुनिया, ये महफिल मेरे काम की नहीं। अगर दिमाग से बोलेगा तो ये बोलेगा कि बस किसी तरह खींच रहे हैं। जीवन काट रहे हैं।

मिशन, प्रफेशन और कमीशन जैसे अलग-अलग रूप-रंग वाली मीडिया आज कहां खड़ी है ये देश के किसी भी नागरिक से आप जान सकते हैं, जाहिर तौर पर विश्वसनीयता का असर पेशे और इंडस्ट्री पर भी दिखता है। न्यूज बिजनेस के इस दौर में ज्यादातर मीडिया संस्थान इस फलसफे पर काम कर रहे हैं कि 'करहुं कोई उपाय, जेहि विधि रेवेन्यू आए, रेपुटेशन रहे चाहे जाए...।'  अगर फिर भी रेवेन्यू नहीं आ रहा है तो गाज सबसे पहले स्टाफ पर गिरनी तय है।

टीवी और अखबारों की बहुतायात वाले मीडिया इंडस्ट्री में राजस्व की कमी भी कॉस्ट कटिंग के नाम पर छंटनी की वजह बनती जा रही है। इश्तेहार से आए राजस्व की कमी से बीसियों चैनल और अखबार दम तोड़ते हुए से नजर आ रहे हैं। अपने मीडिया संस्थान को जमाने के कुछ संस्थान मालिकों के तमाम नुस्खे भी कारगर नहीं हो रहे हैं तो संस्थान पर ताला लगाने की तरफ अग्रसर हो रहे है और उसका असर उस संस्थान में काम करने वाले लोगों की आर्थिक सेहत पर सीधा-सीधा पड़ रहा है।

रोजी रोटी की गाड़ी पटरी से उतर जाने के बाद जीवन के अर्थशास्त्र के साथ समाजशास्त्र भी कितना असंतुलित हो जाता है ये मीडिया वालों से बेहतर भला कौन जानता है। आप ऐसे कई भुक्तभोगियों से पूछिए जो नौकरी में नहीं हैं, ऐसे मुश्किल समय समें उनके कई प्रिय साथी और वैसे लोग जो कभी उनकी मदद से बेहतरी की ओर बढ़े हैं, फोन तक उठाना पसंद नहीं करते।

ये जानकर राहत मिलती है कि मीडिया इंडस्ट्री से मिले संकटों से आगे बढ़कर कुछ लोगों ने अपने लिए नया रास्ता तलाश किया और उस रास्ते पर चलकर सफल भी हुए। मगर ऐसे कितने नाम हैं, कितने लोग हैं जो ये कर पा रहे हैं। आप खुद सोचिए क्या ये आसान है एक इंडस्ट्री में 15 से 20 साल काम करने के बाद आप किसी और इंडस्ट्री में जाते हैं या फिर नया काम शुरू करते हैं तो मुश्किलें एक नहीं कई होती हैं।

पहले आप उस इंडस्ट्री के तौर तरीके समझते हैं और अपनी पुरानी प्रफेशनल लाइफ और आदतों से उसकी तुलना करते हैं। फिर मन बनाते हैं और किसी तरह आगे बढ़ते हैं। आपकी किस्मत है अगर कामयाबी मिल गई तो ठीक है नहीं, तो एक के बाद दूसरा झटका। पहला झटका मीडिया की नौकरी जाने का और दूसरा झटका नया काम नहीं जम पाने का। इस बीच आपके रोजमर्रे की जद्दोजहद भी जारी होती है और काम को परवान चढ़ाने भी कोशिशें भी। आप पूरी शिद्दत से जुटते हैं अपनी मंजिल तक पहुंचने के लिए लेकिन जिस माहौल में, जिन लोगों के साथ आप हैं जरूरी नहीं कि उतनी शिद्दत उनके पास भी हो आपके काम के लिए। ये इम्तिहान का नया दौर होता है अगर आप मीडिया इंडस्ट्री में कदम रख रहे हैं तो आपको इसके लिए तैयार होना पड़ेगा।

सवाल ये है कि क्या हताश हुआ जाए। मैं कहता हूं कि बिल्कुल नहीं। हमें हताशा की तरफ नहीं हल की तरफ बढ़ना है, इस हताशा से बचने के लिए। मीडिया में आना अगर बेहद जरूरी लगे तो घर परिवार से मजबूती और रोजगार का एक विकल्प में हाथ में जरूर होना चाहिए। परिवार में पति और पत्नी दोनों का नौकरी में हों तो ज्यादा बेहतर है और खुद अगर मीडिया में हो तो पत्नी या पति इस इंडस्ट्री से बाहर का हो, ताकि अगर मीडिया की छंटनी का शिकार हों या नौकरी नहीं मिलने से परेशान हों तो कम से कम रोजमर्रे के लिए एक विकल्प आपके पास हों।

एक बात और अगर ये आप ये सोचकर पत्रकारिता की तरफ आगे बढ़ रहे हों कि आप देश, समाज और इंसानियत के लिए कुछ कर पाएंगे तो ये आपकी गलतफहमी होगी क्योंकि पेशेवर वजहों से काफी बदल चुकी मीडिया जिसे अलग-अलग खानों और हिस्सों में बांटकर देखा जाता है, उसमें इस बात की संभावनाएं काफी कम हैं। 

हां, कुछ हद तक अगर आपको व्यक्तिगत स्तर पर मौका मिला तो आप जरूर कर पाएंगे। अगर पत्रकारिता वाकई आपका मिशन है और यही रोजी रोटी भी, तो इससे अच्छा कुछ नहीं हो सकता लेकिन इसकी चुनौतियों को समझते हुए आगे बढ़ेंगे तो आपकी राह के कांटे थोड़े कम होंगे। 

(लेखक टीवी और प्रिंट की पत्रकारिता के एक लंबे अनुभव के बाद सामाजिक मुद्दों पर ईंवेंट्स और ईवेंट्स पर आधारित टीवी शो करते हैं)

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