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हिंदी: जो बड़े-बड़े साहित्यकार और आंदोलन नहीं कर सके, वो कर दिखाया....

Published At: Friday, 14 September, 2018 Last Modified: Sunday, 16 September, 2018

शशि शेखर

प्रधान संपादक, हिन्दुस्तान ।।

जय हिन्दी, जय भारती

हिंदी दिवस पर मेरी बधाई स्वीकार करें। अकारण उल्लास और बेवजह की हाय-तौबा के इस कठिन वक्त में यह बताना जरूरी है कि हमारी मातृभाषा की करोड़ों संतानें हैं। इतनी संतानों की मां को निरीह मानना भारी भूल होगी।

सदियों ने इसे गढ़ा है और सदियों तक इसे चलाने की जिम्मेदारी अब हम पर है। यहां यह भी जान लें। भाषाओं के संरक्षण के लिए सरकारों की ओर ताकना बेकार है। सत्ता सदन अगर भाषा के माई-बाप होते तो संस्कृत को प्राकृत अथवा पाली और फारसी को हिन्दुस्तानी ने कभी बेदखल न किया होता।

सवाल उठता है तो फिर हाय-तौबा क्यों? आपको थोड़ा पीछे ले चलता हूं। पचास साल होने को आए। भारतेंदु हरिश्चंद्र का आलेख पढ़ा था- ‘हा! हत्भागिनी हिंदी’। पिता कवि थे और सरकारी अधिकारी भी। हर तीन बरस में उनका तबादला हो जाता। उन दिनों छोटे शहरों में होटल नहीं होते थे, इसलिए हमें अक्सर किसी न किसी नामचीन कवि या साहित्यकार का आतिथेय बनने का अवसर प्राप्त होता। वे तब भी हिंदी की दुर्दशा की चर्चा करते। ये वो दौर था, जब बंगाल और तमिलनाडु सहित कुछ अन्य राज्यों में हिंदी के खिलाफ आंदोलन हो रहे थे।

मरहूम राममनोहर लोहिया ने उसी के बाद ‘अंग्रेजी हटाओ’ आंदोलन छेड़ा था। कुछ लोग तब भी कहते थे कि हिंदी हमारी मां है और अन्य भाषाएं उसकी बहनें। इसी मां और मौसियों के सियासी बेटों ने उन्हें अपने स्वार्थ का मुद्दा बना रखा था।

एक तरफ हम झगड़ रहे थे, दूसरी तरफ हमारा मातृकुल चुपचाप अपना रास्ता तय कर रहा था। आज तमिलनाडु जाइए या केरल, कोलकाता जाइए या कामरूप, आपको हिंदीभाषी होने का दंश नहीं भोगना पड़ता। जो काम बड़े-बड़े साहित्यकार और आंदोलन नहीं कर सके उसे हिंदी सिनेमा, फिल्मी गीतों और कवि सम्मेलनों ने कर दिखाया। भाषा के लिए आडंबर और पाखंड से कहीं ज्यादा जरूरी है कि उसे प्रवाह में रखा जाए। हम हिंदीभाषी गर्व कर सकते हैं कि हमारी मातृभाषा किसी महासागर की तरह तरंगित, गहरी और विशाल है। वह समूचे बड़प्पन के साथ अपने प्रति उथले और ओछे विचारों को भी लील जाती है।

चाहूं तो यहां तमाम आंकड़े गिना सकता हूं पर आज बस इतना ही कहना चाहूंगा कि कुंठा में मत रहिए, अपना रास्ता बनाने की कोशिश कीजिए। हमारा आगे बढ़ना जरूरी है क्योंकि हमारे ही जरिए हिंदी भी आगे बढ़ती है। हां, जो लोग अपने कर्म या विचार से आगे नहीं बढ़ सके, उन्हें हिंदी को दोष देना बंद कर देना चाहिए। पुरानी कहावत है- पूत भले ही कपूत हो जाए, माता कुमाता नहीं हो सकती।

 



पोल

क्या इंडिया टीवी के चेयरमैन रजत शर्मा का क्रिकेट की दुनिया में जाना सही है?

हां, उम्मीद है कि वे वहां भी उल्लेखनीय कार्य कर सुधार करेंगे

नहीं, जिसका काम उसी को साजे। उनका कर्मक्षेत्र मीडिया ही है

बड़े लोगों की बातें, बड़े ही जाने, हम तो सिर्फ चुप्पी साधे

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