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'अहा! ज़िंदगी' को बड़ा झटका, संपादक समेत टीम ने दिया इस्तीफा

Thursday, 09 November, 2017

समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।

दैनिक भास्कर समूह की प्रतिष्ठित मैगजीन 'अहा! ज़िंदगी'  से बड़ी खबर आ रही है। दरअसल इस मैगजीन के एडिटर आलोक श्रीवास्तव व असिसटेंट एडिटर देवाशीष प्रसून ने इस्तीफा दे दिया है। दोनों फिलहाल यहां नवंबर के अंत तक नोटिस पीरियड पर हैं। जानकारी के मुताबिकउनके साथ कुछ अन्य सहकर्मियों ने भी समूह को अपना इस्तीफा दिया है।

आलोक श्रीवास्तवएडिटर, 'अहा! ज़िंदगी'-   

हिंदी पत्रकारिता में अपनी एक अलग पहचान बना चुके आलोक श्रीवास्तव पिछले 7 वर्षों से 'अहा! ज़िंदगीका संपादन कर रहे हैं। 1989 में दिल्ली के प्रतिष्ठित मीडिया संस्थान भारतीय जनसंचार संस्थान (IIMC) से  पत्रकारिता का प्रशिक्षण लेने के बाद उन्होंने 'अमर उजालासे अपने पत्रकारिता जीवन की शुरुआत की। ‘अमर उजाला’ में उन्होंने मेरठ संस्करण के लिए काम किया। इसके बाद वे फरवरी1990 में उपसंपादक के तौर पर प्रख्यात साहित्यिक-सांस्कृतिक पत्रिका 'धर्मयुगसे जुड़ गएजहां वे 6 वर्षों तक कार्यरत रहे। लेकिन किन्ही वजहों से ‘धर्मयुग’ बंद हो गई और वे फिर ‘नवभारत टाइम्‍स’ के मुंबई संस्‍करण से जुड़ गएजहां उन्होंने 14 वर्षों तक पत्रकारिता की। 2010 में उन्होंने 'अहा! ज़िंदगीके संपादन का कार्यभार संभाला और तब से इस लोकप्रिय मैगजीन के कई संस्करणों के जरिए वृहद हिंदी समाज को सुरुचिपूर्ण कंटेंट मुहैया कराने में जुटे हैं।

आलोक हिंदी के युवा कवियों में अपना विशिष्‍ट स्‍थान रखते हैं। 1996 में आए उनके पहले ही कविता संग्रह ‘वेराउन सपनों की कथा कहो’  ने हिंदी के कविता प्रेमियों को अलग ढंग से प्रभावित किया। उनके अन्य कविता संग्रहों ने भी पाठकों को भरपूर मोहित किया। जब भी वसंत के फूल खिलेंगे (2004), यह धरती हमारा ही स्‍वप्‍न है! (2006), दिखना तुम सांझ तारे को (2010), दुख का देश और बुद्ध (2010) जैसे कविता संग्रहों के अलावा प्रख्‍यात हिंदी साहित्यिक पत्रिका ‘कथादेश’ में आठ वर्षों तक छपा उनका स्‍तंभअखबारनामा’ एक बहुपठित स्‍तंभ थाजिसने साल 2004 में ‘अखबारनामा: पत्रकारिता का साम्राज्‍यवादी चेहरा ’ के नाम से एक किताब की शक्ल ले ली। इस किताब को भी सराहना मिली। प्रख्‍यात पत्रकार कुलदीप नैयर की भगत सिंह के जीवन और विचारों पर लिखी अनूठी पुस्‍तक ‘शहीद भगत सिंह : क्रांति के प्रयोग (2004) का उन्‍होंने अनुवाद भी किया।

मुंबई यूनियन ऑफ जर्नलिस्‍ट के संयुक्‍त सचिव रह चुके आलोक श्रीवास्‍तव ने संवाद प्रकाशन के जरिए हिंदी में दो बेहतरीन ग्रंथमालाओं ‘विश्‍व ग्रंथमाला’ और ‘भारतीय भाषा ग्रंथमाला’ के जरिए 200 से अधिक पुस्‍तकों का संपादन-प्रस्तुति की हैजिसमें विश्‍व साहित्‍य की अनेक महानतम एवं दुर्लभ निधियां हैं।  


देवाशीष प्रसूनअसिसटेंट एडिटर, 'अहा! ज़िंदगी'-   

देवाशीष प्रसून ने साल 2010 में वर्धा स्थित महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय से मास मीडिया व कम्युनिकेशन में पोस्ट ग्रेजुएशन किया। इसी दौरान इन्होंने ब्लॉगिंग और फ्रीलांसिग शुरू की। लेकिन मई2011 में उन्हें 'अहा! ज़िंदगीमें काम करने का मौका मिला। सीनियर कॉपी एडिटर के तौर पर वे इसके साथ एक साल से भी ज्यादा समय तक रहे। जून2012 में वे महिला एवं बाल विकास मंत्रालय से जुड़ गए और यहां उन्होंने कंसल्टेंट के तौर पर अपनी भूमिका निभाई। मात्र एक साल बाद (जून2013) ही वे 'अहा! ज़िंदगीकी एडिटोरियल टीम का हिस्सा बन गए और इस बार वे असिसटेंट एडिटर के पर आए थेतब से वे इसी पद पर अपनी जिम्मेदारी निभा रहे हैं। वे दैनिक भास्कर के नोएडा ऑफिस में कार्यरत रहते हुए मैगजीन के लिए कंटेंट जुटाने का काम करते हैं।  


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