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पत्रिका समूह के इस संस्करण में व्यापक स्तर पर हुए बदलाव

Published At: Friday, 21 September, 2018 Last Modified: Friday, 21 September, 2018

समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।

पत्रिका समूह के भोपाल संस्करण में आंतरिक स्तर पर व्यापक बदलाव किए गए हैं। इस बदलाव से जहां कुछ लोग खुश हैं, वहीं अधिकांश की रातों की नींद उड़ गई है। ‘रातों की नींद उड़ गई’ का आशय यहां इस बात से है कि रीजनल से सिटी डेस्क पर ट्रांसफर किए गए पत्रकारों को देर रात तक रुकना पड़ रहा है, जबकि पहले वे लगभग 11 बजे तक अपने घर पहुंच जाया करते थे। पत्रिका भोपाल के स्थानीय संपादक पंकज श्रीवास्तव हैं, जबकि स्टेट हेड की जिम्मेदारी जिनेश जैन संभाल रहे हैं। जिनेश को कुछ महीने पहले ही यह जिम्मेदारी सौंपी गई है, इससे पूर्व वे छत्तीसगढ़ में थे। जिनेश जैन से पहले अरुण चौहान मध्य प्रदेश स्टेट एडिटर के रूप में कार्यरत थे। निजाम बदलता है, तो काफी कुछ बदल जाता है। उसी तर्ज पर, भोपाल संस्करण में भी बदलावों की शुरुआत हो चुकी है।

पत्रिका से जुड़े एक वरिष्ठ पत्रकार ने इस बात की पुष्टि की है कि भोपाल कार्यालय में काफी कुछ बदला जा रहा है। जिनेश जैन के आदेश के बाद लंबे समय से एक ही जिम्मेदारी संभाल रहे पत्रकारों को उनकी जगह से हिलाया गया है। सिटी डेस्क के कुछ पत्रकारों को फ्रंट पेज डेस्क पर भेजा गया है, जबकि फ्रंट पेज वालों को सिटी का काम सौंपा गया है। इसी तरह रीजनल डेस्क से भी कुछ को नई जिम्मेदारी दी गई है। एकदम से हुए इस बदलाव के लिए कोई भी तैयार नहीं था, लिहाजा परेशानी होना लाजमी है। बात केवल पत्रकारों की परेशानी तक ही सीमित नहीं है, काम भी कुछ हद तक प्रभावित हो रहा है।

किसी भी अखबार के लिए सिटी डेस्क उसकी आत्मा होती है, और ये काम जितना आसान लगता है उतना होता नहीं। इसी तरह फ्रंट पेज पर काम करने के लिए भी एक अलग ही शैली की जरूरत होती है। लिहाजा दोनों ही मोर्चों पर तैनात नए पत्रकारों को मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। इसके अलावा, रीजनल डेस्क संभालने वाले वे पत्रकार सबसे ज्यादा मुश्किल में हैं, जिन्हें सिटी या फ्रंट पेज आदि जैसी डेस्क पर भेजा गया है। दोनों ही जगह देर रात तक काम चलता है, जबकि रीजनल डेस्क वालों को 11-11.30 बजे तक घर पहुंचने की आदत है, ऐसे में उनकी पर्सनल और प्रोफेशनल लाइफ दोनों असंतुलित हो गई हैं। रीजनल डेस्क पर काम करने वाले कुछ पत्रकारों की यह भी शिकायत है कि उनकी डेस्क तो बदल दी गई, लेकिन समय नहीं। यानी उन्हें पहले की तरह 3-4 बजे बुलाया जाता है और देर रात तक रोका जाता है, जबकि सिटी डेस्क के पत्रकारों के कार्यालय आने का समय 5 या 5.30 बजे के आसपास है।

कुछ पत्रकार दबी जुबान में यह भी कहते हैं कि यह कवायद ‘खास’ लोगों को प्रवेश दिलाने के लिए की जा रही है। छत्तीसगढ़ से एक पत्रकार को भोपाल पहले ही लाया जा चुका है और जल्द ही कुछ और के आने की संभावना है। हालांकि, इन खबरों में कितनी सच्चाई है, ये तो नहीं पता लेकिन फ़िलहाल इस बदलाव से भोपाल पत्रिका में कार्यरत पत्रकार काफी परेशान चल रहे हैं।

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