‘देश में लगातार पिछड़ रहा है प्रिंट, आखिर कैसे बढ़ेगा आगे...

‘देश में लगातार पिछड़ रहा है प्रिंट, आखिर कैसे बढ़ेगा आगे...

Friday, 12 January, 2018

ज्‍वलंत स्‍वरूप ।।

सीईओ, Happyho.In

(jwalant@happyho.in)

न्‍यूजपेपर को ब्रैंड्स बनाने और प्रिंट को आगे बढ़ाने में मैंने अपनी जिंदगी के 30 स्‍वर्णिम वर्ष लगा दिए हैं। अपने अनुभव के आधार पर मैं प्रिंट में आई गिरावट (खासकर नोटबंदी और जीएसटी के परिणामस्‍वरूप) के कारणों का आसानी से विश्‍लेषण कर सकता हूं।


इस दौरान अधिकांश समाचारपत्र-पत्रिकाओं के रेवेन्‍यू में गिरावट दर्ज की गई है। कुछ प्रोजेक्‍ट तो बंद ही हो गए हैं। ऐसे में समाचारपत्र-पत्रिकाओं के मालिकों को काफी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। हालांकि मैं बहुत आशावादी हूं लेकिन आजकल प्रिंट की जो स्थिति हैउसके बारे में बात करते हुए मुझे काफी दुख होता है। लेकिन आपको बता दूं कि इस बदलते ट्रेंड से मुझे आश्‍चर्य कतई नहीं हो रहा है।


दरअसलमंदी का इस माध्‍यम से कोई लेना-देना नहीं है बल्कि यह तो अपने लोगों की खराब सोच का शिकार है। प्रिंट को डिजिटल से काफी चुनौती थी लेकिन प्रिंट इसे लगातार झुठलाता रहा और आखिर में इस सच्‍चाई ने उस पर काफी असर डाला। डिजिटल से मिल रही चुनौतियों से निपटने में इंडस्‍ट्री पूरी तरह फेल रही। हालांकि लगता था कि दोनों के बीच यह चुनौती काफी दूर है लेकिन यह काफी नजदीक थी।


इस चुनौती से निपटने के लिए प्रिंट की तरफ से कोई प्रयास नहीं किया गया। स्थिति और खराब होने का इंतजार किया जाता रहा। ऐसे में आखिर बड़े स्‍तर पर प्रिंट में सक्रियता कहां चली गई?


मुझे अच्‍छी तरह याद है कि जब भारतीय मीडिया में टेलिविजन ने पदार्पण किया थाउस समय इंडस्‍ट्री ने इससे निपटने के लिए काफी बड़ी लड़ाई लड़ी थी। उस समय प्रादेशिक और भाषाई स्‍तर पर रीडरशिप को बढ़ाने के लिए इंडस्‍ट्री के स्‍तर पर जरूरी प्रयास भी किए गए थे।


टेलिविजन को चुनौती मानते हुए इससे स्‍पर्द्धा के लिए किए गए प्रयासों का ही नतीजा था कि प्रिंट ने अपनी रफ्तार से ज्‍यादा तेजी पकड़ी थी। लेकिन जब डिजिटल से निपटने की बात आई तो इसके सामने प्रिंट काफी कमजोर दिखाई दिया।


इस बात को लेकर भी मैं काफी हैरान था कि इससे निपटने के लिए आखिर युवा प्रिंट में महत्‍वपूर्ण पदों पर क्यों नहीं है। खासकर ऐसे समय में जब प्रिंट अपने अस्तित्‍व के सबसे चुनौतीपूर्ण दौर से गुजर रहा है।


इस मीडियम में सबसे बड़ी समस्‍या ये है कि यहां युवा नेतृत्‍व की कमी है और यही वजह है कि इसका संतुलन बिगड़ चुका है। आजकल जो नए-नए मीडियम जैसे डिजिटल और टेलिविजन आ रहे हैंउनसे सिर्फ युवा मार्केटर्स और मीडिया प्‍लानर्स ही सही ढंग से निपट सकते हैं क्‍योंकि इन मीडियम में ताजगी और युवा ऊर्जा ज्‍यादा जुड़ी होती है।


जब भी कोई इंडस्‍ट्री परिपक्‍व होती है और नई-नई चीज करने में विफल रहती है तो इसे स्‍वभाविक रूप से परेशानी होती है। पूरे मीडिया जगत के लिए डिजिटल ने काफी व्‍यवधान उत्‍पन्‍न कर दिया है। टेलिविजन भी इससे अछूता नहीं रहा है और ‘हॉटस्‍टार’, ‘वूट‘, ‘नेटफ्लिक्‍स’ आदि से निपटने के लिए इंडस्‍ट्री कई कठोर कदम उठा रही है।


प्रिंट के बड़े-बड़े नाम कोई और उनकी जगह ने ले लें, इस त‍थाकथित जागीर को खोने के डर से युवा नेतृत्‍व को सामने लाने में पूरी तरह से असफल रहे हैं। इसी का परिणाम है कि अब युवा प्‍लानर अथवा ब्रैंड मैनेजर इस तरह के मामलों से बिल्‍कुल अलग तरीके से देख रहे हैं।


नई चुनौतियों से निपटने के लिए पुराना तरीका बिल्‍कुल कारगर नहीं है और इससे पहले कि स्थिति को बदलने में ज्‍यादा देर हो जाएप्रिंट को अपने आप को मजबूत बनाने के लिए कुछ जरूरी कदम तत्‍काल उठाने होंगे।


प्रिंट में भाषाई रीडरशिप भी अब काफी घट रही है। आज से पांच वर्ष पहले के मुकाबले अब कई भाषाओं में चैनल आ चुके हैं। इंटरनेट पर भी तमाम भाषाओं में कंटेंट उपलब्‍ध है। इसके अलावा मोबाइल का इस्‍तेमाल बढ़ जाने से भी न्‍यूज को हासिल करने के तरीकों में भी काफी बदलाव आ गया है। न्‍यूजपेपर्स और मैगजींस की भाषाई रीडरशिप पर इसका काफी प्रभाव पड़ा है।


लेकिन बिक्री बढ़ाने के लिए प्रिंट नए-नए तरीकों को आजमाने पर जोर देने के बजाय अभी भी अपने पुराने मॉडल के आधार पर ही काम करने का प्रयास कर रहा है।


डिजिटल स्‍पष्‍ट रूप से मापा जाने वाला माध्‍यम है और विश्‍लेषणों के आधार पर इसके लिए लक्ष्‍य तय करना काफी आसान रहता है। लेकिन आज के परिप्रेक्ष्‍य में प्रिंट कम से कम मापा जाने वाला माध्‍यम है।


हालांकि इंडियन रीडरशिप सर्वे (IRS) जल्‍द ही आने वाले हैं और लगातार आ रही वाधाओं के कारण विभिन्‍न एजेंसियों में अपने मित्रों को सुधार की उम्‍मीद नहीं है। प्रिंट को इन बाधाओं की बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ी है। दूसरी ओर बार्क (BARC) ने पहले से ज्‍यादा वास्‍तविक मीजरमेंट टूल लॉन्‍च किया है जिसकी सहायता से टेलिविजन को विज्ञापन खर्च में अपनी भागीदारी बढ़ाने में काफी मदद मिली है।


आजकल प्रिंट को पेजवाइज गुणात्‍मक रूप से अपना प्रदर्शन करने की जरूरत है जिससे वे खुद को आगे बढ़ा सके और जिसके द्वारा इस मीडियम के लिए रेवेन्‍यू जुटाया जा सके।


इस तरह की जरूरतों को मैंने बहुत पहले ही महसूस कर लिया था और करीब 15 साल पहले मैंने इंडस्‍ट्री के सामने रीडर्स रेटिंग प्‍वाइंट का प्रस्‍ताव रखा था ताकि आज के समय के परिप्रेक्ष्‍य में मदद की जा सके लेकिन इंडस्‍ट्री के बड़े-बड़े लोगों ने इस पर अपनी ठंडी प्रतिक्रिया दी।


आज के तकनीकी युग में प्रिंट को मीजरमेंट के लिए इसका लाभ उठाना सीखना चाहिए और इंडस्‍ट्री के दिग्‍गज लोगों को सामान्‍य रीडरशिप सर्वे की बजाय अपने विचारों को और अधिक स्‍पष्‍ट रूप से व्‍य‍क्‍त करने के लिए कुछ अलग हटकर सोचना चाहिए।   


प्रिंट इंडस्‍ट्री को इस समय युवा नेतृत्‍व की ज्‍यादा जरूरत है जो इंडस्‍ट्री के लिए ऐसा रोडमैप तैयार कर सकेजिसके द्वारा ऐसा नया प्रॉडक्‍ट तैयार किया जा सके जो नए पाठकों और युवाओं को इससे बांधे रख सके।


वर्चुअल रियलिटी (VR) और आर्टिफिशियल इंटेजीलेंस(AI) के समय में प्रिंट को अपने आप में कितना और कैसे बदलाव करना हैयह सबसे बड़ा सवाल बना हुआ है और इंडस्‍ट्री के दिग्‍गजों को इसका जवाब देना है


(ये लेखक के निजी विचार हैं)

 

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