रवीश कुमार बोले, अख़बार ख़रीद लेने से अख़बार पढ़ना नहीं आ जाता है...

रवीश कुमार बोले, अख़बार ख़रीद लेने से अख़बार पढ़ना नहीं आ जाता है...

Wednesday, 10 January, 2018

रोज़गार से संबंधित विषयों पर तथ्यात्मक बहस होलोगों को पता चलेगा कि दुनिया कैसे बदल रही है और उन्हें कैसे बदलना है। आप अपनी जानकारी का सोर्स बदलिएख़बरों को खोजकर पढ़िए। ध्यान रहेअख़बार ख़रीद लेने से अख़बार पढ़ना नहीं आ जाता है। हमेशा किसी एक टॉपिक पर दो से तीन अखबारों देसी और विदेशी मिलाकर पढ़ें’ अपने फेसबुक पोस्ट के जरिए ये लिखा वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार ने। उनका पूरा पोस्ट आप यहां पढ़ सकते हैं-


नौकरियों के घटते और बदलते अवसरों पर चर्चा कीजिए


FICCI और NASSCOM ने 2022 में नौकरियों के भविष्य और स्वरूर पर एक रिपोर्ट तैयार की हैजिसके बारे में बिजनेस स्टैंडर्ड में छपा है। लिखा है कि इस साल आईटी और कंप्यूटर इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने जा रहे छात्र जब चार साल बाद निकलेंगे तो दुनिया बदल चुकी होगी। उनके सामने 20 प्रतिशत ऐसी नौकरियां होंगी जो आज मौजूद ही नहीं हैं और जो आज मौजूद हैं उनमें से 65 प्रतिशत का स्वरूप पूरी तरह बदल चुका होगा। ज़रूरी है कि आप अपनी दैनिक समझ की सामग्री में BIG DATA, ARTIFICIAL INTELLIGENCE, ROBOTIC को शामिल करें। इनके कारण पुरानी नौकरियां जाएंगी और नई नौकरियां आएंगी। क्या होंगी और किस स्तर की होंगीइसकी समझ बनानी बहुत ज़रूरी है।


शोध करने वाली एक कंपनी Gartner का कहना है कि artificial intelligence (AI) के कारण मध्यम और निम्न दर्जे की ढेर सारी नौकरियां समाप्त हो जाएंगी। इसकी जगह पर उच्चतम कौशलप्रबंध वाली नौकरियां आएंगी। स्थाई नौकरियों तेज़ी से चलन से बाहर हो रही हैं। साझा अर्थव्यवस्था का चलन बढ़ रहा है। इसे GIGS ECONOMY कहते हैं। मैंने पहली बार सुना है। इसके बारे में ठीक से नहीं मालूम। जैसे कोरियर बॉय होगा वो कई कंपनियों का सामान ढोएगा।


आप दिल्ली में ही सड़कों पर दुपहिया वाहनों की भीड़ ग़ौर से देख सकते हैं। पीठ पर बोझा लादे ये नौजवान रोज़गार की आख़िरी लड़ाई लड़ते नज़र आएंगे। COWORKING HUB एक नया प्रचलन आया है। इसके बारे में जानने का प्रयास कीजिए। शायद हम और आप किसी चौराहे पर खड़े होंगेकिसी भी काम के लिएदो या दो से अधिक स्किल के साथकोई आएगा काम कराएगा और घर भेज देगा। घर जाकर हम न्यूज़ चैनलों पर विश्व गुरु बनने का सपना देखते हुए सो जाएंगे।


इकनॉमिक टाइम्स की मालिनी ने भी रोज़गार में आ रहे बदलावों पर एक लेख लिखा है। मैंने इसके कुछ अंश भी बिजनेस स्टैंडर्ड में छपे फिक्सी और नैसकॉम की रिपोर्ट के साथ मिला दिया है।


मालिनी ने लिखा है कि कंपनियों को पूंजी निर्माण के लिए अब वर्कर की ज़रूरत नहीं है। फेसबुक में मात्र 20,000 लोग ही काम करते हैं जबकि कंपनी का वैल्यू 500 अरब डॉलर है। इसे भारतीय रुपए में बदलेंगे तो सदमा लग जाएगा। डिजिटल युग में नौकरी दो स्तर पर होगी। उच्चतम कौशल वाली और निम्नतम मज़ूदरी वाली। बहुत से दफ्तरों में सर छिपा कर काम करने वाले बीच के काबिल लोग ग़ायब। बल्कि ग़ायब हो भी रहे हैं।


इन सब बदलावों के सामाजिक राजनीतिक परिणाम होंगे। दुनिया भर में सरकारें तेज़ी से ऐसे एजेंडे पर काम कर रही हैं जो भटकाने के काम आ सके। ऐसे मुद्दे लाए जा रहे हैं जिन्हें सुनते ही सपना आने लगता है और जनता सो जाती है। सरकारों पर दबाव बढ़ रहा है कि न्यूनतम मज़दूरी बढ़ाएं। मगर आप जानते ही हैंसरकारें किसकी जेब में होती हैं।


मालिनी गोयल ने सरसरी तौर पर बताया है कि जर्मनीसिंगापुर और स्वीडन में क्या हो रहा है और भारत उनसे क्या सीख सकता है। बल्कि दुनिया को भारत से सीखना चाहिए। यहीं का युवा ऐसा है जिसे नौकरी नहीं चाहिएरोज़ रात को टीवी में हिन्दू मुस्लिम टॉपिक चाहिए। अब उसे उल्लू बनाने के लिए इस बहस में उलझाया जाएगा कि आरक्षण ख़त्म होना चाहिए। नौकरी की दुश्मन आरक्षण है। पूरी दुनिया में नौकरी नहीं होने के अलग कारणों पर बहस हो रही हैभारत अभी तक उसी में अटका है कि आरक्षण के कारण नौकरी नहीं है।


सरकार कोई प्रस्ताव नहीं लाएगीतीन तलाक की तरह बहस में उलझा कर युवाओं का तमाशा देखेगी। आरक्षण पर बहस के मसले का इस्तमाल फ्रंट के रूप में होगाजिसे लेकर बहस करते हुए युवा सपने में खो जाएगा कि इसी के कारण नौकरी नहीं है। नेता वोट लेकर अपने सपने को पूरा कर लेगा। तथ्यों के लिहाज़ से यह हमारे समय का सबसे बड़ा बकवास है। नौकरी न तो आरक्षित वर्ग के लिए सृजित हो रही है और न अनारक्षित वर्ग के लिए। यही फैक्ट है। नौकरी के सृजन पर तो बात ही नहीं होगी कभी।


जापान के प्रधानमंत्री ने कॉरपोरेट से कहा है कि तीन प्रतिशत से ज़्यादा मज़दूरी बढ़ाएं। जापान में एक दशक बाद अर्थव्यवस्था में तेज़ी आई है। कंपनियों का मुनाफा बढ़ा है मगर यहां लेबर की ज़रूरत नहीं बढ़ी है। उनका मार्केट बहुत टाइट होता है। अखबार लिखता है कि यह और टाइट होगा। टाइट शब्द का ही इस्तेमाल किया गया है, जिसका मतलब मैं यह समझ रहा हूं कि तकनीकि बदलाव या उत्पादन का स्वरूप बदलने से अब मानव संसाधन की उतनी ज़रूरत नहीं रही। जापान में कई साल तक कई कंपनियों ने मज़दूरी में कोई वृद्धि नहीं की थी।


कुलमिलाकर बात ये है कि रोज़गार से संबंधित विषयों पर तथ्यात्मक बहस होलोगों को पता चलेगा कि दुनिया कैसे बदल रही है और उन्हें कैसे बदलना है। आप अपनी जानकारी का सोर्स बदलिएख़बरों को खोज कर पढ़िए। ध्यान रहेअख़बार ख़रीद लेने से अख़बार पढ़ना नहीं आ जाता है। हमेशा किसी एक टॉपिक पर दो से तीन अखबारों देसी और विदेशी मिलाकर पढ़ें।


(साभार: वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार की फेसबुक वाल से)



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