पाठशाला4मीडिया
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अरूण सिन्हा
ग्लैमर..... एक सपना जो युवाओं की ज़िदगी में इस कदर छा चुका है कि इसे पाने के लिए वो हर जुगत लगाने को तैयार रहते हैं। सुबह उठने से लेकर शाम को कॉलेज में दोस्तों के साथ कैंटीन में चाय की चुस्की लेते वक्त भी बेचारे यही सोचते रहते है
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अरूण सिन्हा, स्वतंत्र पत्रकार
जोशो जुनून और चिंतन से भरपूर एक पेशा है जिसे हम पत्रकारिता कहते है
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जनसंचार की अपनी डिग्री पूरी करते हुए भी मैंने परीक्षा के दौरान ऐसे ही मिलते-जुलते एक प्रश्न का उत्तर लिखा था। प्रश्न था कि क्या इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का व्यापक प्रचार-प्रसार समाचार पत्रों के लिए ख़तरे की घंटी है।
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पत्रकारिता यानि मीडिया यानि लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ पढने में ये शब्द शायद भारी भरकम लगे पर आज के समय में ये शब्द उतने ही खोखले हों गए हैI
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इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के विस्तार ने जहां एक और विश्वसनीयता कायम की है वहीं कई बार ऐसी भी ख़बरें लोगों तक पहुंचाई हैं जिन्हे असंभव माना गया। वो चाहे करगिल युद्ध हो या फिर इराक पर अमेरिका के हमले का प्रसारण।
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समाज और राजनीति में पत्रकारिता का क्या महत्व और योगदान है, यह इसी से साबित होता है कि लोकतंत्र में पत्रकारिता को चौथा स्तंभ कहा जाता है। पत्रकारिता एक मिशन है तो एक उद्योग भी है, प्रोफेशन भी है।
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आधुनिक पत्रकारिता पर आज हम अगर नजर डालें तो पायेंगे कि वर्तमान समय में इसका स्वरुप ही बदल गया है। कभी मिशन से शुरुआत करने वाली पत्रकारिता आज कहां पंहुच गई है किसी से भी छिपा नहीं है। लोकतंत्र का चौथा खंबा आज अपनी अस्मिता को बचाने की गुहार लगा रहा है।
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आज, पत्रकारिता की बात आती है तो पत्रकार के लेखन पर जोर दिया जाता है। पत्रकारिता भी इसी समाज का हिस्सा है जो समाज के तौर-तरीकों के लिए आइने का काम करता है।
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हिन्दी अखबारों के ज्यादातर संचालक छोटे उद्यमी थे। पूँजी और टेक्नॉलजी जुटाकर उन्होंने अपने इलाके के अखबार शुरू किए। ज्यादातर का उद्देश्य इलाके की खबरों को जमा करना था। राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित ज्यादातर बड़े प्रकाशन अंग्रेजी अखबार निकालते थे।
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पत्रकारिता या मीडिया पढ़ाने के प्रोफेशन में तो मैं नहीं हूं, हालांकि कुछ दिनों तक, जब पैसों की जरूरत थी, कोशिश की थी कि कहीं भी यह काम मुझे मिल जाए। निश्चय ही मेरी यह कोशिश गंभीर नहीं थी

