मैं अपने कंपिटीटर की ओर नहीं देखता

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1992 में जब स्टार प्लस लॉन्च हुआ, तब उसका झुकाव अंग्रेजी की ओर था। 2000 में स्टार प्लस पूरी तरह से हिंदी मनोरंजन चैनल हो गया। ‘कौन बनेगा करोड़पति’ और ‘क्योंकि सास भी कभी बहू थी’ की लोकप्रियता इसे नंबर वन तक ले गई। बाद में जब नेटवर्क-18 के चैनल 'कलर्स' ने इसकी बादशाहत को तोड़ा तो स्टार प्लस ने खुद को बदलना शुरू किया और फिर से नंबर एक की कुर्सी पर पहुंचा। अब स्टार प्लस 'रिश्ता वही सोच नई' टैगलाइन के साथ नए रूप-रंग में है। इन्हीं बदलावों पर केंद्रित स्टार इंडिया के सीईओ उदय शंकर से एक्सचेंज4मीडिया समूह की यह बातचीत :

 

नया लुक और रंगों में बदलाव बड़ा आकर्षक दिख रहा है—इस सब के पीछे की कहानी क्या है ?

रंग बदला है लेकिन यह रंगों का बदलाव मात्र नहीं है। मैं आपको इसके पीछे की कहानी बताता हूं। इंटरटेनमेंट बिजनेस के लिए अभी मैं नया हूं क्योंकि मेरा बैकग्राउंड न्यूज का रहा है, इसलिए मैं भारतीय समाज और उसके बदलते पहलुओं से जुड़ाव महसूस करता हूं। मैने यह महसूस किया है कि अभी भी हम पुराने चरित्र और इमोशन के सहारे बिजनेस जुटा रहे हैं, जबकि पिछले दस वर्षों में बहुत बड़ा बदलाव आया है। टेलीविजन डेमोक्रेसी बड़े महानगरों से दूसरे दर्जे के शहरों और अब तीसरे दर्जे को शहरों की ओर जा रही है, लेकिन कंटेंट, मार्केटिंग आदि की अवधारणा में कोई बदलाव नहीं आ रहा है। हमारा बदलाव इसी दिशा में है।

 
चैनल की इस ‘रीफ्रेशिंग’ के बारे आपने कब सोचा ?
पिछले साल के मध्य से ही हम इस बारे में सोच रहे थे। जब हमने इसको लेकर चर्चा शुरू की तो शुरुआत में मुद्दा लुक को लेकर नहीं था। शुरुआत में हम कई साल तक स्टार के नंबर वन बने रहने पर चर्चा कर रहे थे, फिर हमने लुक पर बातें शुरू की। इसके पीछे एक वजह यह भी थी कि अब स्टार ने काफी विस्तार किया है, रीजनल चैनल हैं, साउथ इंडियन चैनल हैं, इन सभी को हम स्टार नेटवर्क के एक नए बैनर के नीचे लाना चाह रहे थे। स्टार के चीफ ऑपरेटिंग ऑफिसर संजय गुप्ता पिछले साल बोर्ड में आए तो इस पर पहली बार चर्चा हुई। धीरे-धीरे हमने बदलाव की वजह महसूस की। लुक एण्ड फील में बदलाव इसका एक हिस्सा मात्र था। मैं महज लुक और फील में चेंज करने का हिमायती नहीं हूं। दर्शक इसको बहुत अधिक नोटिस नहीं करते हैं। जिस दिन आप चेंजिंग के प्रोमोज देंगे, आउटडोर मीडिया की सहायता से होर्डिंग लगा देंगे। तो लोग बस यही कहेंगे कि उन्होंने अपना लुक बदल दिया।दर्शकों की दुनिया अब बदल रही है, इसलिए बदलाव केवल लुक और फील में ही नहीं कंटेट में भी होना चाहिए। नया लुक और फील महज उस बदलाव का प्रतीक नहीं है जो हमने चैनल में किया है। हम जहां खड़े हैं वह स्टार प्लस का रीइंनवेंशन है।

तो क्या यह परिवर्तन समूचे नेटर्वक में होने जा रहा है ?

मैं इससे इनकार नहीं कर रहा हूं। स्टार प्लस हमारा फ्लैगशिप है, जहां से हमने शुरुआत की है, लेकिन यह नेटर्वकिंग के पहचान की रीडिस्कवरी का हिस्सा है।

एकता कपूर की वापसी के साथ क्या इंटरटेनमेंट की पुरानी वैल्यू वापस आ रही है ?

एकता कपूर का वापस आना हमारी थीम ‘रिस्ता वही सोच नयी’ के साथ बहुत अच्छा मेल है।
 
2009 के मध्य से इस साल की शुरुआत तक स्टार प्लस काफी बेहतर कर रहा था तो क्या आपको लगता है कि बदलाव के लिए यह बेहतर समय है ?

मैं यह नहीं मानता कि ऐसे समय में बदलाव नहीं किया जा सकता। ऐसा नहीं है कि जो चीजें आपको सफल बनाती हैं उनमें सीमित योग्यता होती है। सफलता के लिए बदलाव जरूरी है। इसके पहले कि आपकी पुरानी सफलता की चमक कमजोर पड़े नई सफलता की राह ढूढ़नी शुरू कर देनी चाहिए। अपने प्रयोगों और बदलावों की वजह से ही हम लोगों से अलग और सफल हैं।
 

स्टार के कार्यक्रमों में उसकी टैगलाईन’ नयी सोच की छाप किस तरह दिखाई देगी ?

हमारे समाज में महिलाओं के बारे में जो पारंपरिक सोच है, वह बदल रही है और नई सोच आधुनिक नारी का प्रतिनिधित्व कर रही है। आगे चलकर स्त्री छवि में और भी सकारात्मक बदलाव आयेगा। साथ ही आधुनिक परिवारों और रिश्तों में जो बदलाव हो रहा है। नयी सोच उसी पर केन्द्रित है।
 
इसका मतलब कि अब आपके पास ज्यादा माडर्न मुद्दे दिखेंगें
मैं इससे सहमत हूं, लेकिन माडर्न शब्द के प्रयोग को लेकर मैं थोड़ा असहमत हूं। यह बहुत ही गलतफहमी वाला शब्द है। मैं इसे कंटेंपररी कह सकता हूं। हम पब में बैठकर पीने वाली महिलाओं को बढावा देने नहीं जा रहें हैं, लेकिन यह सही है या गलत हम इसके निर्णायक भी नहीं हैं।

आपका एक्सपोजर उत्तर भारत पर ज्यादा क्यों रहता है ?
नहीं! ऐसा नहीं है। और मैं यह भी नहीं मानता कि लोग वही शो देखना पसंद करते हैं, जो उनकी पृष्ठभूमि से जुड़े होते हैं। पिछले साल ब्राजील के टेलीविजन जगत के सबसे सफल धारावाहिक की कहानी भारत के एक छोटे से शहर पर आधारित थी। मेरा मानना है कि आप सभी इमोशन को बहुत प्रभावी तरीके से कम्यूनिकेट कर सकते है इस बात की परवाह किये बगैर की स्टोरी का मूल कहां पर है।

क्या आप इससे सहमत हैं कि भारत में सनसनीखेज नाटकों (मेलॉड्रामा) की शुरुआत स्टार प्लस ने ही की।

हां, यह बात सही है और मुझे इसमें कुछ गलत भी नहीं लगता। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि मेलॉड्रामा के नाम पर आप कुछ भी दिखाना शुरू कर दें। अगर आप कोई धारावाहिक कर रहें है जो कि पूरी तरह ड्रामा के बारे में है, तो आपको ऐसा करने की स्वतंत्रता है। अगर आप ऐसा नहीं करते हैं तो कई बार ऐसा लगता है कि आप चरित्रों के साथ न्याय नहीं कर रहे हैं। लिहाजा मुझे मेलॉड्रामा से कोई परेशानी नहीं है। लेकिन अगर किसी गंभीर मसले पर भी सनसनी हावी होने लगे तो यह आपत्तिजनक है क्योंकि यह दर्शकों को संतुष्ट नहीं कर पाता।

अपने प्रतिस्पर्धी चैनलों का कोई ऐसा प्रोग्राम जो आप स्टार प्लस पर देखना चाहें ?
हूं...। एकदम निश्चित रूप से तो नहीं कह सकता, लेकिन ‘डांस इंडिया डांस’ से मैं प्रभावित हूं। मेरा मानना है कि जब सिंगिंग कम्पटीशन को आम लोगों से जोड़कर देखा जा रहा है तो डांसिंग कम्पटीशन केवल स्टार से जोड़ कर क्यों देखा जाता है ? 

अपना प्रतिस्पर्धी आप किसे मानते हैं ?
सच कहूं तो मैं कम्पटीटर की ओर नहीं देखता। बहुत पहले मुझसे किसी ने कहा था कि जब आप रेस लगा रहे हों तो बगल वाली लेन में यह मत देखिए कि आप के बराबर में कौन दौड़ रहा है क्योंकि यह आपको डाइवर्ट कर सकता है।  
 

आप स्टार प्लस के लिए कितनी जीआरपी प्राप्त करना चाहेंगे?

यह बिलकुल स्पष्ट है कि हम नंबर वन बन सकते हैं, लेकिन मैं जीआरपी के संदर्भ में इसे नहीं बता सकता क्योंकि मैं नहीं मानता कि लीडरशिप केवल जीआरपी से आ सकती है। आपकी जीआरपी अधिक हो सकती है और आप कंटेंट का एजेंडा तय करने में सक्षम नहीं हैं तो आप यह महसूस नहीं कर सकते कि कितने लोग या दर्शक आपकी इन चीजों पर निगाह रखते हैं। अगर आपके पास ऐसी कोई स्टोरी नहीं है जिसे अन्य फॉलो करें और नकल करें तब आपकी लीडरशिप वास्तव में संदेहास्पद हो जाएगी। इंटरटेनमेंट के लिहाज से लीडरशिप के बारे में मेरी सोच है कि आप जिस एजेंडे को लेकर चल रहे हैं उसमें लीडर बनें।

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  • 30/01/2012

    नीरज सनन, एक्जीक्यूटिव वाइस प्रेसिडेंट (मार्केटिंग एंड डिस्ट्रीब्यूशन), एमसीसीएस

    अगर आपका कंटेंट गाजर-मूली की तरह है तो गाजर-मूली के ही पैसे मिलेंगे। आपको प्रीमियम पैसा लेना है तो कंटेंट भी प्रीमियम देना होगा। दर्शक पागल नहीं है कि वह आपको गाजर-मूली कंटेंट के प्रीमियम पैसे दे

  • 23/01/2012

    यशवंत व्यास, समूह सलाहकार संपादक, अमर उजाला

    हमने तीसरी तिमाही में कोई विस्तार नहीं किया। आप जब नए एडिशन शुरू करेंगे, रीलॉन्च करेंगे तो पाठक तो बढ़ते ही हैं। मेरा मानना है कि मार्केट की लड़ाई को मार्केट की तरह लड़ना चाहिए। उतार-चढ़ाव तो आते ही रहते हैं।

  • 09/01/2012

    उर्मिलेश, एग्जीक्यूटिव एडिटर, राज्यसभा टीवी

    एक पार्लियामेंट्री चैनल के लिहाज से जितना कंटेंट हो सकता है, हम रख रहे हैं। हमारा कॉन्सेप्ट पूरी तरह से क्लीयर है। हम बाकी चैनलों की तरह सनसनी फैलाकर अपने आपको स्थापित करने में विश्वास नहीं रखते

  • 02/01/2012

    मुकेश कुमार, सीईओ एंड एडिटर इन चीफ, न्यूज एक्सप्रेस 

    मीडिया इंडस्ट्री जरूर है, लेकिन यह फटाफट नोट छापने वाली मशीन की तरह नहीं है। आपको पैसे के लिए धैर्यपूर्वक इंतजार करना पड़ता है, लंबे समय तक लगे रहना होता है। इसमे वर्षों लग जाते है, तब जाकर इस वृक्ष से फल खाने को मिलते हैं
  • 20/12/2011

    पंकज पचौरी, मैनेजिंग एडिटर(स्पेशल प्रोजेक्ट), एनडीटीवी इंडिया 

    आप मीडिया में इसलिए आए हैं, क्योंकि आपका समाज से लेना-देना है। इसलिए यह तर्क बेमानी है कि जो लोग देखना चाहते हैं वह हम दिखा रहे हैं।जो लोग देखते हैं और आप दिखा रहे हैं ठीक है। लेकिन आप चूरन नहीं बना रहे है, बल्कि समाज में एक बड़ी जिम्मेदारी निभा रहे हैं।