उमेश चतुर्वेदी, वरिष्ठ पत्रकार
1999 की तीखी गर्मियों के बीच देश के तमाम नेता आमचुनाव के प्रचार में धूल फांक रहे थे...तब दिल्ली के कांग्रेस मुख्यालय में कपिल सिब्बल ने अपनी पार्टी का पक्ष रखने और तत्कालीन वाजपेयी सरकार की बखिया उधेड़ने की कमान संभाल रखी थी। इन्हीं दिनों बतौर रिपोर्टर उनसे मिलने का मौका मिला...सार्वजनिक प्रेस ब्रीफिंग के बाद अपने कक्ष में कुछ चुनिंदा पत्रकारों को चाय पिलाते वक्त सिब्बल ये जरूर पूछते थे कि इस बार कांग्रेस की कितनी सीटें आएंगी। उत्साह में आकर दो – एक महिला पत्रकार और एक-दो बेनामी अखबारों के पत्रकार कांग्रेस को पूर्ण बहुमत या फिर बहुमत के करीब आने की जानकारी कपिल सिब्बल को देने लगते थे। एक महिला पत्रकार तो उंगलियों पर गिनाकर अपने दावे की पुष्टि भी करती थीं। उन दिनों इन पंक्तियों का लेखक चुपचाप इसे सुनता-देखता रहता था। एक दिन उन्होंने हमसे भी कांग्रेस की संभावनाएं पूछी थीं। हमने अपने अखबारों के जरिए मिल रही रिपोर्टों के हवाले से बताया था कि कांग्रेस की संभावना कम है। फिर हमने कपिल सिब्बल से ये सवाल पूछा कि क्या बाकी पत्रकारों के दावों पर आपको यकीन है।
कपिल सिब्बल ने जो जवाब दिया था, उसे इन पंक्तियों का लेखक आज तक नहीं भूला है। उन्होंने कहा था कि ये मित्र लोग उन्हें बेवकूफ समझते हैं या फिर खुद बेवकूफ हैं...राजनेता को अपनी संभावनाओं का अंदाज हो जाता है। सिब्बल प्रकारांतर से हकीकत को स्वीकार कर रहे थे। हालांकि सार्वजनिक प्रेस कांफ्रेंसों में वाजपेयी सरकार के खिलाफ उनके विपक्षी तेवर बरकरार रहे। इतिहास गवाह है..1999 के आम चुनावों में एनडीए और मजबूत होकर उभरा...यानी कपिल सिब्बल में ये साहस था कि वे सच्चाई को स्वीकार कर सकते थे। लेकिन अब कपिल सिब्बल बदल चुके हैं। पहले बाबा रामदेव के मामले में उन्होंने दिखाया कि वे अपने सरकारी चाबुक का कैसे इस्तेमाल कर सकते हैं और अब उनके निशाने पर सोशल मीडिया है।
ऐसे में सवाल उठता है कि क्या सत्ता में आते ही शासक सहिष्णुता के अपने सहज मानवीय गुणों से दूर होता जाता था। या फिर मौजूदा भारतीय लोकतांत्रिक सत्ता का चरित्र ही ऐसा है कि राजनीति और सत्ता के साथ आए व्यक्ति पर हावी हो जाती है। कपिल सिब्बल के मौजूदा अभियान को देखकर इन सवालों पर सोचने को मजबूर हो जाना पड़ता है। सोशल मीडिया को नियंत्रण के दायरे में लाने के लिए उन्होंने जिस तरह कमर कस ली है, उससे उनकी मंशा पर सवाल उठने लगे हैं। उन्होंने गूगल, याहू और फेसबुक के प्रतिनिधियों को बुलाकर कांग्रेस के आला नेताओं सोनिया गांधी, राहुल गांधी और मनमोहन सिंह के खिलाफ इंटरनेट पर जारी हो रही पत्रिक्रियाओं और फोटो को हटाने का आदेश दिया...और जब इन संगठनों के प्रतिनिधियों ने ऐसा करने में असमर्थता जाहिर की तो उन्होंने अमेरिकी कानूनों के हवाले से उन्हें नियंत्रित करने का फरमान भी सुना दिया।
यह सच है कि सोशल मीडिया पर सोनिया गांधी, राहुल गांधी , मनमोहन सिंह और खुद कपिल सिब्बल को लेकर तमाम तरह की टिप्पणियां हो रही हैं। कार्टूननुमा फेरबदल के बाद उनके फोटो भी लगातार इंटरनेट मीडिया पर लोड किए जा रहे हैं। इनमें कुछ ऐसे फोटो भी हैं, जो बेहद आपत्तिजनक हैं। जिन्हें लोकतांत्रिक समाज में स्वीकार नहीं किया जा सकता। उनमें एक फोटो खुद कपिल सिब्बल की भी है। हो सकता है, सिब्बल उससे भी नाराज हुए हों। लेकिन कुछ एक फोटो के लिए पूरी की पूरी सोशल मीडिया को ही प्रतिबंधित करने या नियंत्रित करना किसी भी नजरिए से लोकतांत्रिक नहीं कहा जा सकता। खबरों के मुताबिक सोशल मीडिया को नियंत्रित करने के लिए कपिल सिब्बल और उनके सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने चीन का हवाला भी दिया। कहा गया कि जिस तरह चीन में इंटरनेट को नियंत्रित किया गया है, वैसा यहां भी किया जा सकता है। चीन जैसा नियंत्रण यहां लागू किया भी जा सकता है। लेकिन ऐसा करने के बाद भारत सरकार को देश की सबसे बड़ी जम्हूरियत होने का दावा भी छोड़ना होगा।
उदारीकरण के बाद भारतीय समाज आह अमेरिका और वाह अमेरिका के बीच कभी झूलता है तो कभी उलझता है। लेकिन इनमें सबसे अहम बात यह है कि जब भी भारतीय व्यवस्था को आगे की राहें उलझती दिखती हैं, तो वह अमेरिकी परंपराओं-नीतियों और व्यवस्था में नई राहें तलाशने लगता है। सोशल मीडिया को नियंत्रित करने के मामले में भी ऐसा ही हुआ। लेकिन जिस तरह भारतीय समाज और व्यवस्था अमेरिकी समाज और व्यवस्था की अच्छाइयों को अपनाने में काफी पीछे रहता है, सोशल मीडिया के नियंत्रण के बारे में भी कुछ ऐसा ही हो रहा है। सिब्बल और उनके मंत्रालय को यह नहीं भूलना चाहिए कि सोशल मीडिया और ब्लॉगरों ने जितनी बराक ओबामा की जीत में भूमिका नहीं निभाई थी, उससे कहीं ज्यादा जॉर्ज बुश की नीतियों की बखिया उधेड़ने और रिपब्लिकन उम्मीदवार जॉन मैकेनेन को हराने में निभाई थी। लेकिन जार्ज बुश या रिपब्लिकन पार्टी ने ब्लॉगिंग या सोशल मीडिया पर नियंत्रण लगाने की कोई बात नहीं की।
हकीकत तो यह है कि अन्ना हजारे और बाबा रामदेव के आंदोलन सोशल मीडिया पर भारतीयों की सक्रियता ज्यादा बढ़ी है। इन निश्चित तौर पर मिस्र के तहरीर चौक के आंदोलन में भी सोशल मीडिया की भूमिका ज्यादा रही और उससे भी अन्ना हजारे और रामदेव के आंदोलन ने प्रेरणा ली। इन आंदोलनों के साथ सरकार ने जो सुलूक किया, उससे लोगों में सरकार के खिलाफ गुस्सा भड़क गया। जो सबसे ज्यादा सोशल मीडिया पर ही नजर आया। सोचिए जरा, अगर आज के युवाओं के पास सोशल मीडिया जैसा अभिव्यक्ति का मंच नहीं होता तो क्या होता..अगर यही युवा गुस्सा सड़कों पर उतर आता तो क्या क्या उसे इतनी आसानी से संभाला जा सकता था। इन अर्थों में तो कपिल सिब्बल को सोशल मीडिया का शुक्रगुजार होना चाहिए, कि गुस्से की अभिव्यक्ति कम से कम वर्चुअल दुनिया में ही हुई। सिब्बल का तर्क है कि सोशल मीडिया पर प्रसारित हो रहे चित्रों से धार्मिक भावनाएं आहत होंगी और दंगे भी भड़क सकते हैं। लेकिन इंटरनेट पर अभी तक बदनामी का ये दाग़ नहीं लग पाया है।
इंटरनेट और सोशल मीडिया के जरिए कुछ फोटो और कार्टून बेहद आपत्तिजनक तरीके से जरूर पेश किए जा रहे हैं। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर प्रसारित हो रहे इन फोटो और कार्टून को नियंत्रित किया जा सकता है। लेकिन इसके लिए पूरी की पूरी मीडिया को कठघरे में खड़ा करना सही नहीं होगा। इंटरनेट पर सबसे बड़ी खामी पोर्न का सहज प्रवाह है। यह पोर्न तो कम से कम कुछ एक चित्रों और कार्टूनों से कहीं ज्यादा भयावह हैं। लेकिन सिब्बल साहब का उनकी तरफ ध्यान नहीं गया। उनके अधिकारियों तक ने इसकी तरफ ध्यान नहीं दिया। जबकि खुलेपन के देश अमेरिका ने जब मंदी को लेकर जांच की तो पता चला कि जिम्मेदार अधिकारी तक पोर्न देखते रहे, जिससे बाजार और आर्थिक व्यवस्था का सही तरीके से नियमन नहीं हो सका। लिहाजा वहां दफ्तरों में पोर्न पर पाबंदी लगा दी गई। लेकिन अमेरिकी कानूनों का हवाला देने वाली अपनी व्यवस्था का इस तरफ ध्यान भी नहीं है। होना तो यह चाहिए कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम प्रसारित और लोड हो रहे आपत्तिजनक फोटो और पोर्न पर पाबंदी लगाने के लिए सिब्बल और उनका दफ्तर उपाय करता। एक खतरा और भी है कि अगर बिना किसी मुकम्मल व्यवस्था के सोशल मीडिया को नियंत्रित किए जाने की परिपाटी शुरू हुई तो व्यवस्था अपने खिलाफ उठने वाली सारी आवाजों को दबाने के लिए इसी बहाने का इस्तेमाल करेंगी।
भारतीय राजनीति की सबसे बड़ी खामी यह है कि सत्ता में आने के बाद उसका आम जन से संवाद लगातार कम होता जाता है। संचार की प्रक्रिया एक तरफा हो जाती है। कपिल सिब्बल को मानना ही होगा कि अगर जनता से सरकार का संवाद बना रहा तो ऐसी छोटी-मोटी समस्याएं या तो उठेंगी ही नहीं या फिर पानी के बुलबुले की तरह उठकर लुप्त हो जाएंगी। अव्वल तो होना यह चाहिए था कि सोशल मीडिया पर अपने खिलाफ उठ रही आवाजों का सोशल मीडिया के जरिए राजनीति और राजनेता भी प्रतिवाद करते। इससे संवाद दोतरफा होगा, हो सकता है कि सिब्बल साहब अपनी बात लोगों तक पहुंचाने में कामयाब हो जाएं। हो सकता है, लोग उनकी बातों सहमत ना हों, लेकिन दोतरफा संवाद शक और शुबह की गुंजाइशें कम कर सकता है। 1999 के चुनावों में साहस के साथ आपसी बातचीत में अपनी पार्टी के प्रभाव को स्वीकार करने वाले सिब्बल से उसी साहस की इन दिनों भी दरकार है।
लेखक टेलीविजन पत्रकार हैं।