संपादक कभी खत्म नहीं हो सकता। आज भी लोग मालिक को नहीं पढ़ते, संपादक को पढ़ते हैं। अखबार में जो कुछ छपता उसे एडिटोरियल के लोग ही तो लिखते हैं। इस इंस्टीस्यूशन को खत्म करके पत्रकारिता नहीं की जा सकती।
पत्रकारिता से जुड़े कई मुद्दों पर पी7 न्यूज के एडिटर-इन-चीफ सतीश जैकब से समाचार4मीडिया की बातचीत :-
अपनी पारिवारिक पृष्ठभूमि के बारे में बताएं और पत्रकारिता में कैसे आना हुआ?
जन्म मेरा लाहौर में हुआ, लेकिन जब मैं दो-ढाई साल का था तब मेरे पिताजी दिल्ली आ गए। यह सन 1943 की बात है। तब मैं तकरीबन चार साल का था। मेरे पिताजी भी पत्रकारिता में थे। लाहौर में ही अंग्रेजों द्वारा शुरू किया गया एक अंग्रेजी अखबार था, ‘सिविल ऐंड मिलिट्री गजेट’ मेरे पिताजी उस अखबार में बतौर पत्रकार जुड़े हुए थे। रुडयार्ड किपलिंग उस अखबार के संपादक रह चुके हैं। पिताजी मूलत: पूर्वी उत्तरप्रदेश के थे। मेरी पढ़ाई-लिखाई दिल्ली में हुई। पत्नी मेरी शिक्षक थीं और रिटायर होने के बाद भी एक इंटरनेशनल स्कूल के साथ बतौर कंसल्टेंट जुड़ी हुई हैं। मेरा एक बेटा है वह मैनेजमेंट एक्सपर्ट है और वह भी शौकिया पत्रकार है। ‘एशियन एज’ के लिए कॉलम
लिखता है। मेरी बहू बोस्निया की हैं और वह हेल्थ एक्सपर्ट हैं और अपने क्षेत्र में काफी मशहूर हैं।
पिताजी आपके पत्रकार थे, लेकिन जब आप जर्निलज्म में आ रहे थे तब वे काफी निराश हुए और उनका मानना था कि इस पेशे में वह जाता है जिसे कहीं रोजगार नहीं मिलता। ऐसा क्यों?
उनकी अपनी सोच थी। मेरे पिताजी चाहते थे कि मैं अधिकारी बनूं। आईएएस में आऊं। लेकिन मेरा रुझान पत्रतारिता में था। मेरे पिताजी इससे बहुत नाराज थे। इतने नाराज की जब मुझे पहली नौकरी ‘स्टेट्समैन’ में 1965 में मिली तब वे मुझसे बात नहीं करते थे। उन्होंने मेरा अप्वाइनमेंट लेटर तक फेंक दिया। उनका कहना था कि यह पत्रकार बनेगा और मुझसे पैसे मांगेगा, तो मैं दूंगा नहीं।
जब मेरी शादी होने वाली हुई तो मैं अपनी होने वाली धर्मपत्नी को अपने पिताजी से मिलवाने ले गया तो पिताजी ने मेरी धर्म पत्नी से कहा कि बेटा तुम किसी अच्छे लड़के से शादी करो। किसी डॉक्टर या इंजीनियर से शादी करो। यह तो जर्नलिस्ट है, आधे पैसे तो यह प्रेस क्लब में ही खर्च कर देता है। तुम्हें क्या खिलाएगा और खुद क्या खायेगा?
मेरी पत्नी को लगा कि शायद मेरे पिताजी को वे पसंद नहीं आई इसलिए सीधे मना करने के बजाय इस तरह से समझा दिया। मैंने अपनी पत्नी से कहा कि ऐसी बात नहीं है इसके पीछे एक अलग कहानी है। वह मैं तुम्हें कभी बाद में समझाऊंगा। खैर मुझे दुख है कि मेरे पिताजी मुझे तरक्की करते हुए नहीं देख पाए। इस बात का मुझे हमेशा मलाल रहेगा।
अपने पिता से आपने पत्रकारिता में क्या सीखा?
(हंसते हुए) कुछ नहीं। मेरी तो उनसे पूरी अनबन थी इस मामले में। दूसरा एक जेनरेशन गैप भी था। वे आजादी के दौर की पत्रकारिता का हिस्सा थे। तब आधे-आधे पन्ने के बड़े-बड़े लेख छपते थे। अब उन्हें कौन पढ़ेगा? मैंने जो कुछ भी सीखा वह मार्क तुली से सीखा। पत्रकारिता में वे ही मेरे गुरु हैं। वह मुझसे चार-पांच साल वरिष्ठ हैं। मार्क मेरे सबसे अच्छे दोस्त हैं और मेरे गुरु भी। उन्होंने कभी मुझसे यह नहीं कहा कि तुम यह करो या यह मत करो। मैं उन्हें हमेशा देखता रहता था कि वे कैसे काम करते हैं और हमेशा ही उन्हें फॉलो करने की कोशिश करता। लिखने का इतना बढ़िया स्टाइल मैंने और किसी में नहीं देखा।
भारतीय पत्रकारों में किसे वरीयता देते हैं?
भारतीय संपादकों में एमजे अकबर मेरी नजर में नंबर वन हैं। उनके अलावा शेखर गुप्ता, विनोद मेहता और प्रभाष जोशी। प्रभाष जोशी ने हिंदी पत्रकारिता को एक नई दिशा दी। उनकी भाषा अलग थी आम आदमी की भाषा।
आपने मार्क तुली का जिक्र किया एक इंटरव्यू में उन्होंने मुझसे कहा था कि जब वे सक्रिय पत्रकार थे तब जो पत्रकारिता में धार थी वह आज के दौर में खत्म सी हो चली है। आप इससे कितना इत्तेफाक रखते हैं?
सही बात है। इसमें पत्रकारों का कोई दोष नहीं है। मैं इसके लिए तकनीक को दोषी मानता हूं। तकनीक ने हमारा काम इतना आसान कर दिया है कि आपका संपादक कहेगा इस पर स्टोरी करिए, तो आप अपनी सीट पर आएंगे गूगल में सर्च करेंगे और आपको संबंधित सारी सूचनाएं मिल जाएगी।
तब हमें न्यूज क्रिएट करनी पड़ती थीं। चार आदमियों से मिलकर उस खबर की पुष्टि करते थे। दिन भर एक स्टोरी पर काम करते थे फिर जाकर शाम को फाइल करते थे। अब इसका एक घाटा और दिखता है कि पत्रकार के कॉन्टैक्ट भी खत्म हो रहे हैं और वह खबरों की पुष्टि भी नहीं करता है। जो मिल गया छाप दिया। आज ही मैंने देखा कि एक खबर को लेकर दो अखबारों ने दो बिल्कुल अलग सूचनाएं दी हैं। अब यह प्रवृत्ति कम हो रही है कि खबर की पुष्टि की जाए।
तकनीक के अलावा एक और चिंता जताई जाती है प्रबंधन के दबाव को लेकर लाभ के दबाव को लेकर। इन दबावों ने पत्रकारों को और पत्रकारिता के स्वरूप को कितना बदला है।
देखिए जो लोग मालिक हैं, वे अगर कुछ बदलाव करना चाहते हैं तो यह उनकी मर्जी। अगर मालिक अखबार को एक नया रूप देना चाहते हैं तो यह उनका अपना आइडिया है, लेकिन अगर मालिक यह दावा करें कि मैंने संपादक को ही खत्म कर दिया तो यह संभव नहीं है। संपादक कभी खत्म नहीं हो सकता। आज भी लोग मालिक को नहीं पढ़ते, संपादक को पढ़ते हैं। अखबार में जो कुछ छपता उसे एडिटोरियल के लोग ही तो लिखते हैं। मार्केटिंग के लोग तो नहीं लिख रहे हैं न। इस इंस्टीस्यूशन को खत्म करके पत्रकारिता नहीं की जा सकती।
एक चिंता आपकी और है कि पत्रकारिता अब कॉरपोरेट घरानों के चंगुल में फंसती जा रही है। तो क्या मौजूदा हालात में पत्रकारिता और कॉरपोरेट को अलग किया जा सकता है?
देखिए, बड़ी तेजी से समाज मे बदलाव आ रहा है। बीस साल पहले तक हमारे यहां चार पहिया वाहन के नाम पर केवल अम्बेसडर और फिएट थी। आज आपके पास कई सारे विकल्प हैं और उन विकल्पों को पूरा करने के लिए बैंक लोन देने को तैयार बैठे हैं। आज हम और आप तनख्वाह पर नहीं क्रेडिट कार्ड पर जिंदगी जी रहे हैं। और ये ग्लोबल फिनोमिना है। ऐसे में कॉरपोरेट फैक्टर्स तो लाज़िमी हैं। पत्रकारिता पर भी कॉरपोरेट का असर दिख रहा है। पी साईंनाथ ने हाल ही में पेड न्यूज का खुलासा किया था यह कॉरपोरेट का पत्रकारिता में घुसने का ही असर है। मैं इसको लेकर चिंतित इसलिए हूं क्योंकि इससे पत्रकारिता की विश्वसयनीयता को चोट पहुंचेगी। इनसे हमें बचना होगा।
आपने कई ऐसी घटनाएं कवर की हैं। जो इतिहास के लिए टर्निंग प्वाइंट हैं। उनसे जुड़ी कुछ यादें जो आज भी आपके जहन में हैं।
ऐसी कई यादें हैं। एक सुनाता हूं जो ‘बीबीसी’ के दौर की है। जब पंजाब में भिंडरावाले मामले में हिंसा चल रही थी तब ज्यादात्तर मैं पंजाब में ही रिपोर्टिंग करता था। एक दिन, सुबह हम लोग अमृतसर से बाहर निकले। दोपहर में तकरीबन दो बजे जब वहां से लौट रहे थे तो मैंने देखा दूसरी ओर पुलिस की गाड़ियों का कापिला बड़ी तेजी से चला जा रहा है। वे भागे जा रहे थे तो हमने सोचा कोई बड़ा हादसा हुआ है और हमने भी गाड़ी उनके पीछे लगा दी। आगे जाकर एक चाय के ढ़ाबे पर मैं एसपी से मिला और पूछा क्या कहीं पर कुछ हुआ है? तो उनका जवाब था कि कंट्रोल रूम से उन्हें इन्फॉरमेशन मिली थी कि ‘बीबीसी’ पर खबर आई है कि बटाला के पास कोई बस रोक दी है। वहां पर उनको उतार कर मारा गया है। मैंने सोचा ‘बीबीसी’ की खबर तो मैंने तो नहीं दी लेकिन हो सकता है कि लंदन से आई हो या कहीं और से आई हो तो जब बटाला पहुंचे तो वहां पर कुछ भी नहीं हुआ तो वहां के लोग हंस रहे थे।
अब ‘पी7’ में आप क्या-क्या बदलाव लाएंगे? ‘पी7’ एक उम्मीद को लेकर आपकी क्या उम्मीदें हैं?
हम कुछ प्रोग्राम बनाने जा रहे हैं, जिसकी थीम ही होगी ‘एक उम्मीद’। जो लोग कठिन परिस्थतियों में हिम्मत और विश्वास के साथ काम कर रहे हैं, हम उन लोगों पर स्टोरी करेंगे। वह पूरे समाज के लिए प्रेरणा होगी। एक ‘उम्मीद के भरोसे’ हम उम्मीद जगाने की कोशिश करेंगे।
तो क्या टीआरपी के दौड़ में शामिल होते हुए यह कोशिश की जाएगी?
नहीं, हम सभी साथियों की कोशिश यह है कि इस भेड-चाल में नहीं पड़ना है। हम यह नहीं चाहते की हमें टीआरपी मिले। हमारी कोशिश होगी की हम जो प्राग्राम दिखाएं वह हमारे दर्शकों को पसंद आये। और उससे हमारी टीआरपी बढ़ेगी। हम चाहते हैं कि ‘पी7’ ऐसी खबरें दिखाए कि परिवार का हर सदस्य उसे बैठकर देख सकें। इसकी पीछे की सोच, मेरे ‘बीबीसी’ में बिताए गए 27 वर्षों के अनुभव से पैदा होती है। वहां सिखाया जाता है कि जब आप रिपोर्ट करते हैं तब यह मत भूलिए कि परिवार का हर सदस्य आपको देख रहा है। हम लोगों को इंफोरमेशन, एजुकेशन और इंटरटेनमेंट देंगे। यही हमारी कोशिश होगी।
वाइल्ड लाइफ का शौक है। पत्रकारिता के अलावा और क्या कुछ करते हैं?
हां, यह बात बिल्कुल सही है कि मुझे वाइल्ड लाइफ का बेहद शौक है। अगर आप दुनिया भर के देशों से तुलना करें तो वाइल्ड लाइफ की जो धरोहर हमारे पास है वह दुनिया के किसी भी देश के पास नहीं है। जितनी प्रकार पशुओं और पक्षियों की हमारे यहां है उतनी किसी और देश में नहीं। लेकिन बावजूद इसके अपने देश में वन्य जीवन के प्रति जागरूकता नहीं है। लोग कहते हैं की टाइगर एक खूंखार जानवर है। जो लोग ऐसा सोचते हैं वे बिल्कुल गलत हैं। मेरा मानना है कि टाइगर एक जैंटलमेन है। टाइगर को जब भूख लगी होती है तभी वो शिकार करता है। उसका पेट जब भरा रहता है तब तीन-चार दिन तक वह कोई शिकार नहीं करता।
अभी ‘बीबीसी’ ने फैसला किया है कि वह कई भाषाओं में अपनी सेवाएं बंद कर रही है, जिनमें हिंदी भी शामिल है। तो क्या यह कहा जाये की जिन भाषाओं का बाजार नहीं है उन्हें बाजार खा जायेगा?
ऐसा कुछ नहीं है। हिंदी हमारी भाषा है और इसके अस्तित्व के लिए हमें ब्रिटेन के सर्टिफिकेट की कोई जरूरत नहीं है। लेकिन अगर ‘बीबीसी हिंदी सेवा’ बंद होती है, तो यह बेहद चिंता का विषय है। हिंदी सेवा नहीं होती तो मार्क तुली और सतीश जैकेब को कोई नहीं जानता। लोग बड़ी संख्या में ‘बीबीसी हिंदी’ को सुनते थे। एक दफे का वाकया मैं बताना चाहूंगा। एक बार मैं ट्रेन से सफर कर रहा था। रात में एक पैसेंजर ट्रेन में चढा तो ट्रेन खचा-खच भरी थी और लाइट भी नहीं जल रही थी। मैंने कहा भाई अंधेरा है माफ करना अगर किसी का पैर दब जाए तो। तो किसी कोने से आवाज आई अरे ई सतीश जैकेब साहब हैं क्या। तो मैंने कहा हां भाई, तो बोले अरे साहब कहां जा रहे हैं आप? तो मैंने बोला बक्सर जा रहा हूं तो बोले बक्सर में आपसे मुलाकात होगी। जब सुबह हुई मैंने उनसे पूछा कि आप मेरी आवाज से मुझे कैसे पहचान गए तो उन साहब का कहना था कि भाई मैं आपको रोज सुनता हूं। तो क्या आपकी आवाज भी नहीं पहचानूंगा। एक बार में फैजाबाद में था। चुनाव का समय था मार्क तुली और सईद नकवी रोड पर ही एक दुकान पर चाय पी रहे थे। उन्होंने चायवाले से पूछा कि आप किसको वोट देंगे तो चाय वाला बोला हम किसको वोट डालेंगे इसका फैसला हम आज शाम ‘बीबीसी’ सुनने के बाद करेंगे। यह है ‘बीबीसी’ की ताकत। आज भी छोटे शहरों गांवों और सरहदी इलाकों में लोग ‘बीबीसी’ सुनते हैं।लेकिन ‘बीबीसी’ का जो मैनेजमेंट है उसे लगता है कि यह फिजूल का खर्च है।
पत्रकारिता के अलावा क्या कुछ कर रहे हैं?
जर्नलिज्म के अलावा मेरा एक बहुत बड़ा प्रोजेक्ट है। शीला सरकार ने पुरानी दिल्ली की दशा सुधारने के लिए एक संस्था बनाई है जिसका नाम है ‘शाहजनाबाद’। वो इसिलए है की दिल्ली का पुराना नाम ‘शाहजानाबाद’ है। और ‘शाहजानाबाद री डवलपमेंट कॉरपोरेशन’ का 12 लोगों को इसका डायरेक्टर बनाया गया है जिनमें से 9 लोग तो प्राशसनिक अधिकारी हैं और तीन लोग उन्होंने बाहर से लिये हैं। उनमें से एक मैं हूं। यह बहुत ही अच्छा प्रोजेक्ट है। इसके माध्यम से हम लोग पुरानी दिल्ली की शक्ल ही बदल देंगे। पुरानी दिल्ली की शक्ल सुधारने के लिए यह संस्था बनाई गई है। पांच साल में पुरानी दिल्ली के कुछ इलाके इतने सुंदर हो जाएंगे की सब लोग उसे पसंद करेंगे।
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