हिंदी मीडिया को अपनी ताकत का नशा हो गया

ram bahadur rai

राम बहादुर राय, संपादक, प्रथम प्रवक्ता

पेड न्यूज को लेकर प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया ने दो लोगों की एक कमेटी बनाई है। इसने 70 पेज की रिपोर्ट तैयार की है। इस रिपोर्ट में पेड न्यूज की समस्या से निपटने पर विचार होगा।
 
मेरा मानना है कि पेड न्यूज से निपटने के लिए व्यवस्था में कुछ बदलाव की जरुरत है। सबसे पहले जनप्रतिनिधित्व कानून में संशोधन की आवश्यकता है। निर्वाचन आयोग को यह अधिकार होना चाहिए कि उसके पास जो शिकायतें आती हैं उसपर कार्रवाई भी कर सके।  जब मैं नवभारत टाइम्स का संवाददाता था उस समय राजीव गांधी का नाम बोफोर्स घोटाले में आया था। विश्वनाथ प्रताप सिहं इस मुद्दे को लेकर देश भर में अभियान चला रहे थे। वी पी सिहं जहां भी जाते थे  उस समय मैं कुछ अन्य अखबारों के संवाददाताओं से साथ वहां-वहां जाता था। मीडिया ने बेफोर्स  को लेकर राजीव गांधी जैसे इमानदार व्यक्ति के खिलाफ जनमत तैयार कर दिया, एक ऐसा मुद्दा जिसकी जांच अभी भी चल रही है।  बोफोर्स को लेकर राजीव गांधी के खिलाफ  जो अभियान चला उससे भाषाई पत्रकारिता में एक बदलाव आया। 1989 में हिंदी की भाषाई पत्रकारिता ने यह बात समझ ली कि वह जनमत भी बना सकती है। उसके पहले जनमत बनाने का ठेका अंग्रेजी का था। यह पहला चुनाव था जब भारत की हिंदी मीडिया को अपनी ताकत का एहसास हुआ था। जिस दिन भारत की मीडिया ने इस बात को समझ लिया उसको नशा हो गया। उसको लगा कि हम चाहें तो सरकार बना सकते हैं, प्रधानमंत्री बना सकते हैं उसे हटा सकते हैं। इस नशे ने जो विकृति पैदा की उससे मीडिया रास्ते से भटक गयी। उसके नतीजें ने हमको चौंका दिया है।
 
आजकल अखबारों में राज्य सरकारों द्रारा दिये जा रहे विज्ञापन  भी न्यूज की तरह आ रहें। लेकिन उसमें कहीं भी पाठक को इस बात की सूचना नही दी जा रही है कि वह विज्ञापन है। संकट व्यक्ति का नहीं पत्रकारिता की साख का है। अब इसे बचाने लिए सरकार के दरबार में खटखटाना होगा। कानून से जितना हो सके वह ठीक है, वरना सड़क पर भी उतरना होगा। पत्रकारिता बचेगी तो लोकतंत्र बचेगा वरना लोकतंत्र नहीं बचेगा तो पत्रकारिता भी नहीं बचेगी।
 
(लेख राम बहादुर राय द्वारा संवाद-2010 में दिए गए भाषण पर आधारित)
 
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  • 04/09/2010

    अनंत नाथ, डायरेक्टर, दिल्ली प्रेस

     

    सर्वेक्षण की अनुसंधान प्रणाली में पिछली विषंगितयों और दोषों को दूर करने के लिए कुछ नहीं किया गया है। काफी लंबे समय से बोर्ड भर में प्रकाशकों के डेटा प्रक्रिया के संग्रह की विश्वसनीयता और प्रक्रिया के बारे में सवाल उठाया जा रहा है

  • 26/08/2010
    मनजीत घोषाल, एमडी और सीईओ, मिड-डे इंफोमीडिया 
    मैं मीडिया में पिछले दस सालों से हूं और मैं ऐसे किसी व्यक्ति के संपर्क में नहीं आया जिसने आईआरएस फॉर्म भरा हो, मुझे कोई आश्चर्य नहीं होता है। मैं ऐसे व्यक्तियों को भी जानता हूं जो मीडिया इंडस्ट्री में 40 वर्षों से हैं और वे सभी किसी ऐसे व्यक्ति से नहीं मिले, जिन्होंने आईआरएस फॉर्म भरा हो
  • 23/08/2010
    मृणाल पाण्डे, वरिष्ठ पत्रकार
    देश की राष्ट्रपति, मुख्य चुनाव आयुक्त तथा मीडिया व राजनीति के पुरोधाओं की तरफ से मीडिया में बढ़ते छिछोरेपन, गहराते भ्रष्टाचार तथा मीडिया संस्थानों द्वारा पैसा लेकर खबरें छापने पर, इधर लगातार कई गंभीर टिप्पणियां जारी हुई हैं।
  • 19/08/2010

    जय प्रकाश चौकसे, वरिष्ठ फिल्म समीक्षक

    इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की आत्मा का तोता टीआरपी नामक पिंजरे में कैद है। टेलीविजन पर लोकप्रियता का आकलन करने वाली अंतरराष्ट्रीय ख्याति की कंपनी ने सांस्कृतिक विविधता वाले भारत में मात्र सात हजार घरों में उनके मीटर लगाए हैं और यह बताना कठिन है कि मीटर नौकर के कक्ष में लगा है या मालिक के टीवी में। कितने मीटर ग्रामीण क्षेत्र में हैं और कितने महानगरों में।

  • 10/08/2010

    सुनील जैन, सीनियर एसोसिएट एडिटर, बिजनेस स्टैंडर्ड

    प्रेस परिषद कहती है कि उसके पास सीमित अधिकार हैं जो उसे कदाचार के दोषियों पर दंड आरोपित करने की अनुमति नहीं देते और टेलीविजन न्यूज के मामले में ये सीमित अधिकार भी लागू नहीं होते। लेकिन वह किसी का नाम लेकर उसे आसानी से शर्मसार कर सकती थी। इससे संकेत मिलता है कि पेड न्यूज के कारोबार में शामिल अखबार कितने ताकतवर हैं कि उन्होंने प्रेस परिषद को अपना नाम सामने आने देने से भी रोक दिया।