टीवी न्यूज की दुनिया बहुत सीमित है

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दिल्ली कालेज ऑफ इंजीनियरिंग से मैकेनिकल इंजीनियर की पढ़ाई कर चुके राजीव वर्मा पिछले 25 वर्षों से उद्योग जगत में सक्रिय हैं। हिन्दुस्तान लीवर, नेस्ले और वर्लपूल जैसी कंपनियो में कई वरिष्ठ जिम्मेदारियां निभा चुके राजीव वर्मा अक्टूबर 2004 में एचटी मीडिया के सीईओ बने। उनके दिशा-निर्देश में आज हिन्दुस्तान टाइम्स दिल्ली में नंबर वन है,  हिंदी  दैनिक हिन्दुस्तान सफलता की  नयी राह पर है और बिजनेस अखबारो में सबसे बाद में कदम रखने वाला मिंट दूसरे नंबर पर है। उन्हीं की पहल पर कंपनी ने शाइन डॉट काम जैसा चर्चित जॉब पोर्टल शुरू किया। वर्मा ने एचटी मीडिया में आने के बाद कई इनोवेटिव कार्यों को अंजाम दिया, जिसमें वाल स्ट्रीट जर्नल, रेड मैच और वर्जिन रेडियो से समझौता भी शामिल है।

 मीडिया में इनोवेशन और अन्य मुद्दो पर  उनसे विस्तार से  बात की एक्सचेंज4मीडिया समूह के ग्रुप चीफ एडिटर प्रद्युमन माहेश्वरी और संवाददाता शिखा ने

अक्टूबर 2004 में जब आपने हिन्दुस्तान टाइम्स ज्वाइन किया, तब आपके बारे में प्रमोटरों की क्या राय थी ?

उस समय हम दिल्ली में पिछड़ रहे थे, इसलिए हमें संसाधनों की जरूरत थी। हमने कंपनी में प्राइवेट ईक्विटी के जरिए इन्वेस्टमेंट किया। लांग टर्म के रूप में हम भारत की सबसे सफल मीडिया कंपनी बनना चाहते थे। हमने यह तय किया कि कैसे इस लक्ष्य को प्राप्त कर सकते हैं। देखा जाए, तो काफी हद तक यह आपके संसाधनों और सहयोगियों पर भी निर्भर करता है। हमने हर उस दिशा में काम किया जहां से भी सफलता को पाना संभव दिख रहा था। और हम लगातार यह जानने की कोशिश करते रहे कि कैसे इस लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकता है।

लॉन्ग टर्म लक्ष्य के सन्दर्भ में अब तक जो आपने हासिल किया है, उससे आप कितना संतुष्ट हैं ?

यह एक सतत यात्रा है, लिहाजा यह कभी पूरी नहीं हो सकती है। अगर आप ऐसा सोचते हैं कि आपने इसे पूरा कर लिया, तो आप गंभीर गलती कर रहें हैं, क्योंकि यहां लक्ष्य बदलते रहते हैं। बहरहाल, हमने शुरुआत  से लेकर अब तक एक लंबी दूरी तय की है। सफलता के रास्ते पर  हमें कई बार लगता है कि हम जहां पहुंचना चाहते थे, वहां पहुंच गये। लेकिन मैं ऐसा नहीं सोचता, क्योंकि जब तक आप अपने लक्ष्य पर पहुंचते हैं, तब तक दुनिया में कुछ बदलाव आ चुके होते हैं और तब एक नया लक्ष्य आपका इंतजार कर रहा होता है।

शायद यह प्रश्न उचित नहीं है, लेकिन लॉन्ग टर्म और शॉर्ट टर्म लक्ष्यों के लिहाज से आपने अपनी रेटिंग कैसे की क्या उपलब्धियों के लिहाज से टीम ने परफॉर्म किया ?

अगर आप हमारी उपलब्धियों को देखें तो हमने कई क्षेत्रों में ऊंचाइयों को छुआ है, लेकिन सवाल उठता है कि क्या हम अपनी इन उपलब्धियों से खुश हैं, तो मैं कहूंगा कि शायद नहीं। अभी हमें लंबी दूरी तय करनी है और एक नयी ऊंचाई हमारा इंतजार कर रही है।

परिर्वतन की इस कोशिश में आपके सहयोगियों का रवैया कैसा रहा ?

देखिए! आपके साथ हमेशा कुछ इस तरह के लोग होते हैं जो आपके दिशा-निर्देशों में सहभागी बनना चाहेंगे और वे बदलते लक्ष्यों के साथ आपके साथ चलना चाहते हैं। लेकिन इसी समय कुछ ऐसे लोग भी होते हैं, जो आगे की यात्रा में साथ चलने में विश्वास नहीं करते है। सही लोगों को साथ रखें और गलत लोंगों को बाहर करें  और आप जानते हैं कि तभी बाकी लोग साथ चलने को तैयार होंगे। सफलता पाने के लिए महत्वपूर्ण है कि आप  लोगों से खुली चर्चा करें कि हम कहां जाने की कोशिश कर रहे हैं। मैं जब यहां आया तो मैनेजमेंट और पूरी टीम से काफी सकारात्मक सहयोग मिला। मैने कंपनी के  विजन और नये आइडिया के बारे में लोगों से बात की साथ ही उन्हें यह समझाने की कोशिश की और कहा कि हम क्या कर सकते  हैं और हमें कंपनी को कहां ले जाना है। जो इसे समझ गए वे हमारे साथ हैं, लेकिन जो चेंज का हिस्सा बनने को तैयार नहीं थे हमने उन्हें जाने को कह दिया।

एचटी मीडिया के बारे में  अगर आपसे  कहा जाए तो आप इसे बेहतर काम कर रही कंपनी कहना पसंद करेंगे या ऐसी कंपनी  जिसमें  काम करने का बेहतर माहौल है?

मैं काम करने के माहौल को थोड़ा और बेहतर बनाना चाहूंगा, लेकिन इस समय हमारी कंपनी बेहतर काम कर रही है। एक कंपनी के रूप में हम ड्राइवेन,  इफिसिएंट और इफिसिएंसी ओरिएंटेड हैं। यहां काम करने वाले अधिकतर लोगों के पास ऑपरेशनल बैकग्राउंड हैं साथ ही संतुलित और सुलझा हुआ रणनीतिक दिमाग भी। काम करने के बेहतर माहौल के बारे में जहां तक बात है मैं कह  सकता हूं कि हम कंपनी में और खुला माहौल बनाना चाहते हैं।

आप एचटी की तुलना भारत की अन्य मीडिया कंपनियों से कैसे करते हैं। जिस तरह यह काम करती है, उस लिहाज से भारत में  आपको कोई मीडिया कंपनी दिखती है ?

हर कंपनी का अपना मिशन होता है, अपनी स्ट्रेटजी होती है, अपनी संस्कृति होती है जो अपने आप में अलग होती है। एचटी का विजन क्या है यह अपने आप में अलग है। हम  इसे भारत की सबसे सफल मीडिया कंपनी के रूप में देखना चाहते हैं, जो टैलेंटेड लोगों को आकर्षित कर सके।हमारी स्ट्रेटजी अपने आप में अलग है। अब तक जो भी परिर्वतन हुआ है इसी का परिणाम है। हमारे पास जो  कल्चर और  लीडरशिप मॉडल है वह यूनिक है। लिहाजा मेरा मानना है कि हमारे कल्चर, हमारी स्ट्रैटजी, और हमारे मिशन  की तुलना अन्य मीडिया कंपनियों से करना सही नहीं है। लेकिन ऐसा भी नहीं है कि दूसरी मीडिया कंपनियां बेहतर काम नहीं कर रही हैं।

किसी ऐसी कंपनी का नाम लेना चाहेंगे जिसकी कार्य़शैली से आप प्रभावित हों

बेनेट कोलमेन एण्ड कंपनी जिस तरीके से काम रही है, उससे मैं बड़ा प्रभावित हूं। पाठकों के साथ उनका रिश्ता बेहद मजबूत है और मैं इसका सम्मान करता हूं।  हिंदी में  दैनिक जागरण ने बिजनेस में जो मानक बनाया है और जो विस्तार किया है, उससे मैं बहुत प्रभावित हूं। डीएनए ने जिस तरह मुंबई के मार्केट में प्रवेश करने की कोशिश की है, वह तारीफ के काबिल है क्योंकि शुरू से ही  मुंबई का मार्केट बहुत आसान नहीं रहा है। लेकिन जैसा कि मैंने कहा कि हम अपने लिए एक बिजनेस मॉडल बनाने की  कोशिश कर रहें है जो हमारे लिए यूनीक होगा, एक कल्चर जो बिलकुल अलग होगा। विविधता हमारी कंपनी की ताकत है जिसकी बदौलत हम इंडस्ट्री और देश के टैलेंट को अपने साथ जोड़ पाए है। हमने बाहर से भी क्रिएटिव और एडिटोरियल टैलेंट लिया है। हम इनोवेशन में विश्वास करने वाले लोग हैं।

ऐसा कोई इनोवेशन जो आपने किया हो और जिस पर  आपको गर्व हो और ऐसा कोई इनोवेशन जो असफल रहा हो?

ऐसे दो वाकये मेरे जेहन में हैं। मिंट को लेकर मुझे गर्व होता है। करीब ढेड़ साल तो इसी बात को लेकर माथापच्ची होती रही कि हम ऐसे क्षेत्र में कैसे प्रवेश कर रहे हैं, जहां मार्केट चार-पांच अखबारों  मे ही सिमटा है और जहां आखिरी प्लेयर कई साल पहले आया है। हमने इस क्षेत्र में काफी देर से प्रवेश किया, लिहाजा इनोवेशन के साथ प्रवेश करना ही एकमात्र रास्ता हो सकता था। और यह इनोवेशन इस अखबार के हर पहलू में दिखता है।

लोगों ने यहां आकर इसके ऑपरेटिंग मॉडल के साथ काम करना पसंद किया।  एक मजेदार किस्सा बताता हूं। मैं अखबार को मिंट नाम देने के पक्ष में नहीं था मैं इसे ऑरेंज नाम देना चाहता था।  लेकिन टीम मुझसे लड़ गयी। तो मैंने तर्क दिया कि हांगकांग में चीनी भाषा का एक बिजनेस अखबार है ’द एपल डेली ‘, जब वे लोग अपने अखबार को “एपल डेली” कह सकते हैं, तो हम अपने बिजनेस अखबार को  ऑरेंज क्यों नहीं कह सकते।  मेरी टीम ने कहा कि हम इसे मिंट कहेंगें यह बहुत “कैची”  है और इससे करीब से जुड़ा है। इसलिए यह नाम दिया और मुझे बहुत गर्व है कि मैं अपनी टीम से हार गया।

एक दूसरा वाकया जो मुझे याद आ है वह मेरे गलत साबित होने को लेकर है और मुझे गलत साबित होने पर भी अच्छा लगा- मुझे चुनौतियां पसंद है- उस समय कंपनी में इनोवेशन  शरद सक्सेना  के जिम्मे था। जर्मनी की एक कंपनी थी हुबर्ट बुर्ड, उन्होंने भारत  में नई टेक्नॉलाजी की प्रिटिंग मशीन के जरिए इनोवेटिव बिजनेस मॉडल और उसके एक्सपोर्ट  के लिए हमसे संपर्क किया। मैं नहीं जानता था कि यह काम कैसे कर सकता है। लेकिन तब शरद ने इसे देखा और समझा और कहा कि नहीं यह एक बेहतरीन इनोवेशन है और हमें यह करना चाहिए- हम जर्मनी से मशीन लाकर प्रिंट कर सकते है और यह बिजनेस  मॉडल काम कर सकता है। इनोवेशन की जरुरत केवल प्रोडक्ट में ही नहीं होती है, बिजनेस मॉडल और प्रॉसेस में भी इसका महत्व है। यह दर्शाता है कि कंपनी कैसे काम करती है।

आपकी नजर में किसी भी अखबार में पाठकों को संतुष्ट रखने और उन्हें खुश रखने के लिहाज से सबसे महत्वपूर्ण चीज क्या है ?

हम एक ऐसी कंपनी में काम करते है, जहां हमारे मूल्य और उद्यमियों के मूल्य में समानता है। एक पुरानी यहूदी कहावत है ‘ आप ऐसी कोई चीज नही बेच सकेंगे जिसे आप खुद नहीं खरीदना चाहेंगे‘ और मैं इस बात में बहुत यकीन करता हूं। आपको अगर मैं झूठ बोलकर कुछ बेचता हूं कि यह ओरिजनल है तो आपको कैसा लगेगा? आप बेहद ठगा हुआ महसूस करेंगे। मेरा मानना है कि यह बात किसी भी प्रोडक्ट यहां तक की न्यूज के लिए भी उतनी ही सही है। मेरा तो यहां तक  मानना है कि यह प्रोडक्ट नहीं, जिम्मेवारी है। जब आप पाठकों को किसी चीज के बारे में इनफॉर्म कर रहे होते हैं, तो आपका नजरिया बिल्कुल स्पष्ट होता है कि आप जो रिपोर्ट देंगे वह सच्चाई के करीब है और इमानदारी भरी है। हमेशा संभव नहीं है कि यह 100 फीसदी सही हो, लेकिन सच कहने की कोशिश तो करनी ही चाहिए। लिहाजा एक न्यूज पेपर के लिए बेहद महत्वपूर्ण है कि उसमें सच्चाई हो। जब आप न्यूज रिपोर्ट करते हैं तो यह न्यूज की तरह होनी चाहिए। आप एडवरटाइजिंग की तरह न्यूज रिपोर्टिंग नहीं कर सकते हैं। अखबार के लिए दूसरी महत्वपूर्ण बात है कि न्यूज पेपर को केवल न्यूज की गठरी मात्र नहीं होना चाहिए और केवल यह सूचना देना कि  कौन सी घटना हुई है इसका पुलिंदा भर नहीं। इसमें यह भी होना चाहिए कि घटना क्यों हुई, पाठको के लिए इसका क्या महत्व है, और इसमें हमेशा पाठकों के लिए कुछ ऐसा होना चाहिए जिससे उसकी जानकारी बढ़े और सूचना से बढ़कर कुछ हो। इसलिए एक न्यूज पेपर की भूमिका केवल यह सूचना मात्र देना नहीं है कि कहां क्या हो रहा है, बल्कि सच्चाई से यह बताना कि क्या घटित हुआ और वैसी जानकारी देना जो पाठको को कहीं और नहीं मिलती हो। लिहाजा एनॉलसिस बहुत महत्वपूर्ण है।

क्या आप मानते हैं कि इनोवेशन को लेकर न्यूज पेपर इंडस्ट्री का नजरिया व्यापक  नहीं है? यह मैं आपसे इसलिए पूछ रहा हूं क्योंकि इस इंडस्ट्री में ऐसे लोग हैं जो पुरातनपंथी है और अलग तरह से सोचते है ?

जब मैं इस इंडस्ट्री में आया, तब  मैने दो बातों पर गौर किया जो यहां हो रही थी। हम जिस तरह की कंपनी बनाना चाहते थे, उसके लिए पारदर्शिता और बदलाव की जरूरत थी। लेकिन इसको करने के लिए इच्छाशक्ति की जरूरत थी यहां तक कि असफल होने के डर के बावजूद भी जोखिम लेने की जरूरत थी। लोग कई कंपनियो से आते है उनके पास वहां का अनुभव होता है आपको उनके अनुभव का इस्तेमाल करना चाहिए। जब आप औरों की सफलता का एक बेंचमार्क बनाते हैं, तो आपके पास कई बेहतरीन मॉडल्स आते हैं।

एचटी में पिछले पांच वर्षो में बहुत जल्दी-जल्दी एडिटर बदले गये? इसकी पीछे कोई सोच थी ?

दुर्भाग्य से कोई भी हमारे मानकों पर सही नहीं बैठ पा रहा था। लिहाजा हमने यह कोशिश तब तक जारी रखी जब तक ऐसा कोई नहीं मिल गया जो दिल से यहां काम करने को तैयार हो। साथ ही जो परिर्वतन  आप करना चाहते हों उसमें सहयोगी भी हो। कई बार होता है कि आपके साथ कई ऐसे लोग जुड़ते हैं जो कुछ मानकों पर तो खरे उतरते हैं, लेकिन कई जगहों पर असफल हो जाते हैं। यह बदलाव इसी क्रम में कई बार हुआ, लेकिन अब मुझे बेहद खुशी है कि हमारी कंपनी में बेहतरीन लीडर हैं जो हिन्दुस्तान, हिन्दुस्तान टाइम्स और मिंट में लीड कर रहें हैं।

कंपनी में वीर सांघवी की भूमिका क्या है ?

बेहतर!  वीर हमारे लिए लिखते हैं, उनका पाठको से स्थाई संबंध है। वे हमें लागातार सलाह देते रहते हैं कि  कैसे  यह पेपर चुनौतियों का सामना करते हुए आगे बढ़ सकता है। उनके लेखन, लीडरशिप और उनके विचारों को पसंद करने वाले लोगों का बड़ा समूह हमसे जुड़ा है। एक लीडरशिप सम्मेलन हुआ था जिसमें दुनिया भर से जाने-माने लोग आए थे। उसमें लोगों ने विश्व में भारत की भूमिका पर चर्चा और बहस की थी  और तब वीर ने ही  मंच पर केन्द्रीय भूमिका निभाई थी।

आप अपना नंबर वन प्रतिद्दंदी किसे मानते हैं?

मैं भारत की कई मीडिया कंपनियों से प्रभावित हूं। हमने उनको लेकर  कुछ मामलों में बेंचमार्क तय किया है, लेकिन हम कंपिटिशन-फोकस्ड कंपनी नहीं हैं,  हम कस्टमर और कंज्यूमर फोकस्ड कंपनी हैं। हम अपने पाठकों का ध्यान रखते हैं, अपने एडवरटाईजर्स का ध्यान रखते हैं और अपना बेंचमार्क बनाने की कोशिश करते हैं। जब हम बेंचमार्किंग में कंपिटीशन करते हैं, तो हमें क्या करना है इसके लिए नया स्टैंडर्ड बनाते हैं। यह हमने मिंट के लिए किया। यही मानक हमने हिन्दुस्तान टाइम्स की रीलॉन्च में भी रखा और अपने रेडियो के लिए भी। लिहाजा इस आधार पर मैं उन्हें प्रतिद्दंदी नहीं कह सकता, जिसे हमने बेंचमार्क बना रखा है। लेकिन हमारी स्ट्रेटजी यूनिक है, हमारा कल्चर यूनिक है, लीडरशिप मॉडल यूनिक है, हमारी मीडिया कंपनी अलग हट कर है।

आप जब से न्यूज की दुनिया में आए हैं कभी ऐसा लगा कि टीवी न्यूज की दुनिया में भी जाना चाहिए?

इमानदारी से कहूं तो टीवी की दुनिया बहुत सीमित है और इसको बहुत कॉनसोलिडेशन की जरूरत है। और मुझे निकट भविष्य में ऐसा कुछ होता हुआ नहीं दिखाई दे रहा है। प्रिंट की दुनिया में हमारे लिए बहुत संभावनाए हैं जैसा कि हम न्यू कॉरपोरेट इनोवेशन की कोशिश कर रहें हैं।

कई संस्थानों में ऐसे लोग हैं जो मीडिया क्षेत्र से नहीं हैं, न्यू कंज्यूमर इनवायरमेंट में  मीडिया को आउटसाइडर द्वारा लीड करना आपकी नजर में सही है?

देखिए यह हो सकता है कि आप जिस प्रोडक्ट के लिए काम कर रहे हों शुरुआत से उससे जुड़े न हों, लेकिन आपको यह समझना होगा कि प्रोडक्ट कंज्यूमर्स द्वारा ही कंज्यूम किया जाता है। और यह क्षेत्र तो ज्ञान के प्रोडक्ट से जुड़ा हुआ है। यह कोई जेनरेटर, क्रेन, कंक्रीट या कॉमेडिटी की तरह का इंडस्ट्रीयल प्रोडक्ट नहीं है। लिहाजा मैं मानता हूं कि जो लोग कंज्यूमर के व्यवहार को समझते हैं और जो कंज्यूमर को समझने के टूल्स और टेक्निक्स को जानते हैं वे हर क्षेत्र में सफल होते हें।

( इंटरव्यू समूह की पत्रिका इंम्पैक्ट में प्रकाशित)

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  • 30/01/2012

    नीरज सनन, एक्जीक्यूटिव वाइस प्रेसिडेंट (मार्केटिंग एंड डिस्ट्रीब्यूशन), एमसीसीएस

    अगर आपका कंटेंट गाजर-मूली की तरह है तो गाजर-मूली के ही पैसे मिलेंगे। आपको प्रीमियम पैसा लेना है तो कंटेंट भी प्रीमियम देना होगा। दर्शक पागल नहीं है कि वह आपको गाजर-मूली कंटेंट के प्रीमियम पैसे दे

  • 23/01/2012

    यशवंत व्यास, समूह सलाहकार संपादक, अमर उजाला

    हमने तीसरी तिमाही में कोई विस्तार नहीं किया। आप जब नए एडिशन शुरू करेंगे, रीलॉन्च करेंगे तो पाठक तो बढ़ते ही हैं। मेरा मानना है कि मार्केट की लड़ाई को मार्केट की तरह लड़ना चाहिए। उतार-चढ़ाव तो आते ही रहते हैं।

  • 09/01/2012

    उर्मिलेश, एग्जीक्यूटिव एडिटर, राज्यसभा टीवी

    एक पार्लियामेंट्री चैनल के लिहाज से जितना कंटेंट हो सकता है, हम रख रहे हैं। हमारा कॉन्सेप्ट पूरी तरह से क्लीयर है। हम बाकी चैनलों की तरह सनसनी फैलाकर अपने आपको स्थापित करने में विश्वास नहीं रखते

  • 02/01/2012

    मुकेश कुमार, सीईओ एंड एडिटर इन चीफ, न्यूज एक्सप्रेस 

    मीडिया इंडस्ट्री जरूर है, लेकिन यह फटाफट नोट छापने वाली मशीन की तरह नहीं है। आपको पैसे के लिए धैर्यपूर्वक इंतजार करना पड़ता है, लंबे समय तक लगे रहना होता है। इसमे वर्षों लग जाते है, तब जाकर इस वृक्ष से फल खाने को मिलते हैं
  • 20/12/2011

    पंकज पचौरी, मैनेजिंग एडिटर(स्पेशल प्रोजेक्ट), एनडीटीवी इंडिया 

    आप मीडिया में इसलिए आए हैं, क्योंकि आपका समाज से लेना-देना है। इसलिए यह तर्क बेमानी है कि जो लोग देखना चाहते हैं वह हम दिखा रहे हैं।जो लोग देखते हैं और आप दिखा रहे हैं ठीक है। लेकिन आप चूरन नहीं बना रहे है, बल्कि समाज में एक बड़ी जिम्मेदारी निभा रहे हैं।