यह अदालत मेरी नहीं जनता की ही है

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यह जनता की ही अदालत है और मैं जनता का ही वकील हूं. आपने देखा होगा कि मैं जो सवाल करता हूं वह एक संपादक की तरह या पत्रकार की तरह नहीं, बल्कि एक आम आदमी की तरह
 
आपकी अदालत के सत्रह साल पूरे होने पर रजत शर्मा से समाचार4मीडिया की विशेष बातचीत
 
आपकी अदालत का आइडिया पहली बार आपके दिमाग में कब आया और इस सफर के कुछ ऐसे माइल स्टोन जो आपके जेहन से कभी न उतरते हों ?
यह तकरीबन सत्रह साल पहले की बात है। तब मैं मुंबई में ‘द डेली’ न्यूजपेपर का एडिटर था। एक बार मैं किसी काम के सिलसिले में मुंबई से दिल्ली आ रहा था। उसी फ्लाइट में सुभाष चंद्रा और फिल्म अभिनेता गुलशन ग्रोवर भी सफर कर रहे थे। उस समय जी टीवी की नई-नई शुरुआत हुई थी। गुलशन ने मुझसे कहा कि आप सुभाष चंद्रा से कहकर जी में मेरा इंटरव्यू करा दीजिए। जब मैंने सुभाष चंद्रा से गुलशन की इच्छा जताई, तो वे कहने लगे कि आप ही कर दीजिए। मैंने कहा कि टीवी में दो आदमी बैठकर इंटरव्यू करेंगे, तो कौन देखेगा ? इससे अच्छा है कि आप एक अदालत बैठाइए वहां पर ऐसे लोगों को घेरिए जो भ्रष्टाचार करते हों, नियम तोड़ते हों वगैरह-वगैरह. काफी देर मैं इसी बात पर बोलता रहा. कई दिनों बाद सुभाष चंद्रा का फोन आया और वे कहने लगे कि आप जो अदालत बैठाने वाली बात कह रहे थे, वह मुझे काफी पसंद आई है। उसे शुरू करते हैं। मैंने कहा, “अरे मैं तो ऐसे ही टाइमपास कर रहा था, ऐसी मेरी कई योजना नहीं है” फिर कई बार इस संदर्भ में बातें हुई। आखिर में उन्होंने सुभाष घई के स्क्रिप्ट राइटर कमलेश पांडे को मेरे पास भेजा, उन्होंने पूरी योजना पर बात की। इस तरह से 12 फरवरी 1993 को पहली बार ‘आपकी अदालत’ के नाम से इस कार्यक्रम की शुरुआत हुई, जिसमें लालू प्रसाद यादव को कठघरे में खड़ा किया गया। प्रोमो दिखाए जाने से ही इसकी लोकप्रियता चरम पर थी और प्रसारण के बाद तो आप की अदालत टीवी की दुनिया में स्थापित ही हो गया.
 
आपने कुछ माइल स्टोन की बात की। बाल ठाकरे साहब को जब मैंने इंटरव्यू के लिए बुलाया, तो मुंबई में उनका इंटरव्यू के लिए स्टूडियो में आना ही बड़ी बात थी और दूसरे उन्होंने जितनी बेबाकी से जवाब दिए वह देखने लायक था। जो उन्होंने कहा, उससे मुझे भी काफी कुछ सीखने को मिला।
 
पाक अधिकृत कश्मीर के प्रधानमंत्री सरदार कयूम के इंटरव्यू की रिकार्डिंग दुबई में हुई। चूंकि वे भारत नहीं आ सकते थे, इसलिए दुबई जाकर यह शो किया गया। मैंने उनसे कश्मीर औऱ दोनों मुल्कों के संबंधों पर सवाल किए और उन्होंने बड़ी ही सहजता से सौहार्दपूर्ण जवाब दिए। शाहरुख खान का इंटरव्यू भी खास था। शाहरुख खान ने आम वालीवुड परंपरा की तरह यह नहीं कहा कि पहले सवाल बताइये औऱ यह शो का नियम भी है कि पहले सवाल नहीं बताए जाते। इसी कड़ी में आमिर खान का इंटरव्यू भी माइलस्टोन की तरह हैं।
 
आपका मानना है कि आप की अदलात केवल एक इंटरव्यू शो नहीं, बल्कि एक मिशन है, यह मिशन किन मायनों में है.
ऐसे लोग जिन्हें जनता प्यार देती है, सम्मान देती है मेरा उद्देश्य इस शो के माध्यम से उन लोगों की एकाउंटबिलिटी तय करना है। इस तरह यह शो जनता औऱ नेता के बीच पुल बन कर आया है. नेता से मेरा मतलब सिर्फ राजनेताओं से नहीं है, उन सभी से है जिन्हें जनता कहीं न कहीं अपना आदर्श मानती है।
 
फिर इस शो का नाम जनता की अदालत इस मिशन के ज्यादा करीब था, आपकी अदालत की वजह क्या रही।
इस शो की शुरुआत आप की अदालत नाम से ही हुई थी।  वहां से जब मैं स्टार गया तो इसका नाम जनता की अदालत रखा गया। इंडिया टीवी में इसकी शुरुआत दुबारा से आपकी अदालत नाम से करनी चाही। चुकिं यह शो ज़ी में मैं आपकी अदालत नाम से ही कर रहा था इसलिए यह नाम लेने की अनुमति के लिए सुभाष चंद्रा से बात की तो उन्होंने कहा कि यह शो तुम्हारा ही है मुझे इसमें कोई आपत्ति नहीं।   
 
सत्रह साल लगभग 850 से ज्यादा गेस्ट, ऐसा कोई गेस्ट जिसके साथ आपको लगा हो कि आप उसे घेर नहीं पा रहे हों, बल्कि वो आपको कठघरे में खड़ा कर रहा हो ?
देखिए, जब सवाल-जवाब का दौर शुरू होता है, तो कई बार अलग-अलग तरह की स्थितियां बनती हैं. जो कठघरे में खड़ा है अगर वह आपके सवालों का जवाब देता रहे, तब तो कोई मुश्किल नही होती लेकिन कई बार ऐसा होता है कि लोग चुप हो जाते हैं, जवाब ही नहीं देते तब समस्या हो जाती है. मेरी कोशिश होती है कि मैं ऐसे सवाल पूछूं कि जो वे न बताना चाहते हों फिर भी बताएं. प्रवीण तोगड़िया जब अदालत में आए तो मेरे सवालों से वे इतने गुस्से में आ गए कि चिल्लाकर कहने लगे कि अगर आप मुझसे ऐसे सवाल करेंगे, तो मैं आपके खिलाफ केस कर दूंगा आपको अदालत में ले जाऊंगा. और वे जितना ही चिल्ला रहे थे मैंने उतना ही सहज होकर औऱ मुस्कराते हुए जवाब दे रहा था. तो जैसा मैंने पहले कहा कि अलग-अलग तरह की स्थितियां बनती हैं उनमें सामंजस्य बिठाना होता है.  
 
एक वेबसाइट ने पापुलर सर्च के आधार पर आपकी अदालत के पापुलर इंटरव्यू में 10 नाम नरेंद्र मोदी, बाबा रामदेव, राखी सावंत, राजू श्रीवास्तव, आमिर खान, शशि थरूर, शिल्पा शेट्टी, अजहरुद्दीन, शत्रुध्न सिन्हा, फाऱुख अबदुल्ला, गिनाए हैं। आप इस लिस्ट से कितना सहमत हैं
काफी हद तक यह लिस्ट सही है। शुरू के पांच नाम तो वही हैं जिन्हें मैं भी गिनाता। बाद के पांच नाम में कुछ फेरबदल किया जा सकता है। मुझे लगता है कि यह लिस्ट हाल ही में बनाई गई है, क्योंकि इसमें बाल ठाकरे, अटल बिहारी वाजपेयी और इमरान खान जैसे नाम नहीं हैं, जिन्हें मैं जरूर जोड़ना चाहूंगा।
 
जगदीश टाइटलर को हमने आपकी अदालत में रोते हुए देखा उसके बाद दिल्ली का राजनीति में बड़ा-उलट फेर हुआ. अदालत में हुई कोई और ऐसी कार्यवाही जिसका बड़ा सामाजिक प्रभाव पड़ा हो।
दलेर मेंहदी जब अदालत में आए तो यह बताते-बताते रोने लगे कि जब उनके खिलाफ ह्यूमन ट्रैफिकिंग का आरोप लगा था तो किस तरह से पटियाला पुलिस उन्हें थाने में प्रताड़ित करती थी और उनके कपड़े उतार कर उन्हें गाने को कहती थी. इस शो के बाद उन्होंने बताया कि जनता में जो मेरा प्यार और विश्वास खोया था वह फिर से मुझे वापस मिल गया है। ऐसे कई उदाहरण हैं। राजनीतिक लोगों की बात की जाए, तो महमोहन सिंह जब विपक्ष में थे तो कहा जाता था कि वे कभी कुछ बोलते ही नहीं है, लेकिन जब वे आपकी अदलात में आए औऱ जिस तरह से अटल जी सरकार की धज्जियां उड़ाई तो उनकी यह छवि पूरी तरह से बदल गई।
 
कई बार ऐसा होता है कि आपके जो जज होते हैं, उनकी छवि ऐसी होती कि उन्हें जज के रूप मे स्वीकार करने में थोड़ी हिचक होती है। ऐसे कम पहचान वाले जज नियुक्त करने की पीछे आपकी क्या सोच है ?
मेरी कोशिश रहती है कि जो लोग जज के रूप में कार्यक्रम में आएं, वे मीडिया के वरिष्ठ लोग हों। लेकिन दिल्ली में जितने संपादक हैं उन्हें ही रिपीट तो किया नहीं जा सकता. कई बार उपलब्धता की भी समस्या होती है. वैसे भी इस शो में जज की भूमिका सीमित है. जो भी लोग आते हैं किसी न किसी क्षेत्र में वे चर्चित चेहरे रहते हैं।
 
आपके जज जनता के जज होते हैं, फिर आप खुद को जनता का वकील क्यों नहीं कहते ?
यह जनता की ही अदालत है और मैं जनता का ही वकील हूं। आपने देखा होगा कि मैं जो सवाल करता हूं वह एक संपादक की तरह या पत्रकार की तरह नहीं, बल्कि एक आम आदमी की तरह। अगर मैं आमिर खान से सवाल करता हूं कि आपने अपने ब्लॉग पर लिखा कि शाहरुख मेरे पास बैठा है औऱ मेरे पैर चाट रहा है...। तो यह जनता का ही सवाल है जो आमिर से पूछना चाहती है कि यह शाहरुख कौन है।
 
आपकी अदालत के जज आर्डर-आर्डर क्यों नहीं बोलते ?
अब यह सवाल तो आप उन्हीं से पूछिए। मेरी तरफ से उन्हें कोई रोक नहीं होती है। मैं तो सभी निर्णायकों से कहता हूं कि आप अपनी भूमिका को जिस तरह से भी निभाना चाहें निभा सकते हैं।
 
इंडिया टीवी के कंटेट को लेकर कई बार सवाल उठते हैं रजत शर्मा इस मुद्दे को आपकी अदालत में क्यों नहीं लाते ?
ऐसा नहीं है कि इन मुद्दों पर चर्चा नहीं होती। कई बार लोगों ने मुझसे ऐसे सवाल किए। स्वामी रामदेव ने पूछा, संजय दत्त ने पूछा। और मैंने अपनी तरफ से उन्हें माकूल जवाब भी दिया
 
अगर इस मुद्दे को लाते हैं, तो आप खुद को कठघरे में पाएंगे या जनता के वकील के रूप में ?
मैं जहां भी जाता हूं किसी भी सेमिनार या गोष्ठी में तो मैं लोगों से कहता हूं कि मैं आपकी अदालत में हूं आप मुझसे सवाल करिए। अभी हाल ही मैं एमिटी के मॉस कॉम डिपार्टमेंट की ओर से आयोजित एक सेमिनार में गया तो वहां पर 900 बच्चों ने ‘ओपन अदालत’ में मुझसे हर तरह के सवाल किए और मैंने उनकी अदालत में सारे जवाब दिए। तो मैं हमेशा खुद को जनता की अदालत में ही महसूस करता हूं। यह अदालत मेरी नहीं जनता की ही है।
 
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टिप्पणी

आप की अदालत

रजत शर्मा जी आप की अदालत प्रोग्राम के लिए बधाई के पात्र हैं जब इन्होने ये कार्यक्रम शुरू किया था तो वाकई देश की जनता ने इस प्रोग्राम के अंदर अपनी आवाज को महसूस किया था। इस कार्यक्रम के जरिए रजत शर्मा लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के एक मजबूत सिपाही बन कर देश के सामने आये... लेकिन समय के साथ पत्रकारिता का सिपाही बदल गया है और इंडिया टीवी पर दिखाए जाने वाले कार्यक्रमों को देखकर यही लगता है कि रजत जी के अंदर कभी पत्रकार या सामाजिक जिम्मेदारी जैसी भावनाएं थी ही नहीं, जो एक पत्रकार का मजबूत शस्त्र होता है.. दरअसल उन्हे तो उद्योगपति बनना था या अपने राजनीतिक महत्वकांक्षाएं पूरी करनी थी जिसे वे चौथे स्तंभ का मुखौटा पहनकर बेशर्मी के साथ साध रहे हैं। क्या सांप छुंछुदर, धरती फट जाएगी!,उड़ने वाला इंसान! पानी पर दौड़ने वाला आदमी, दो सेकेंड में आप हो जाएंगे मालामाल, आज आप बनेंगे करोड़पति! जैसे शब्दों का इस्तेमाल कर सनसनीखेज प्रोग्राम बनाकर लोग और समाज को गुमराह करना यही पत्रकारिता है। अगर यही पत्रकारिता है तो रजतजी दर्शक किस पर भरोसा करे? चैनलों को महंगाई जैसे मुद्दे से बड़ी खबर धोनी की शादी लगती है जिसपर वो पूरे दिन तक बने रहते हैं... क्या यही पत्रकारों की समाजिक जिम्मेदारी है? अगर आप पत्रकार हैं तो सच बोलने और सच दिखाने की हिम्मत रखिए? अब तो ऐसा लगने लगा है कि चैनलों पर परोसे जाने वाले मिलावट या कालाबाजारी की खबरों में भी मिलावट है। अगर धंधेबाज रिपोर्टरों या संस्थान को पैसा खिलाते हैं तो सब ठीक है नहीं तो फिर मिलावट ही मिलावट.....

आपकी अदालत चरित्रहीनों को बनाती है सेलेब्रेटी।

रजत जी,
जैसा आपने कहा कि यह जनता की अदालत है यहां पर मेरा आपसे एक सवाल है कि जब यह जनता की अदालत है तो इस अदालत में राखी सावंत को दर्जनों बार पेश करने का क्या औचित्य है। मैं यह समझ नहीं पा रहा, कि राखी सावंत, कश्मीरा, संभावना सेठ जैसे चरित्रहीन लोगों को एक सेलेब्रेटी बना कर पेश करके आप लोकतंत्र का कौनसा खंबा बनने का सपना देख रहे हैं। मुझे नहीं लगता कि आप एक पत्रकार हैं, यह हो सकता है कि बीते समय में आप कभी पत्रकार रहे हों लेकिन वर्तमान समय में आप एक बनिये की तरह है जो अपने दुकान चलाने के लिए तरह-तरह के हथकंडे अपनाता है।

ये लोकतंत्र के खम्भा नहीं हैं, ये धंधा चला रहे हैं

पवन जी, मैं आपकी बात से पूरी तरह से सहमत हूं कि आपकी अदालत चरित्रहीन लोगों को एक सेलेब्रेटी बना कर पेश करता है। यह बात आपकी अदालत में ही नहीं। सीधी बात वाले प्रभू चावला जी भी लागू होता है, जिनका राखी सावंत से मन ही नहीं भरता हर तीसरे दिन राखी सावंत को सीधी बात में ले आते हैं। राखी सावंत को ऐसे शो में लाकर ये क्या दिखाना चाहते हैं समझ में ही नहीं आता। आपने जो खंबे वाली बात कहीं है ये किसी भी तरह का खम्भा हीं बनना चाहते बल्कि अपना धंधा चलाना चाहते हैं जो आपने भी कही है। इनको अपने धंधे से मतलब है समाज और सेवा की कौन सोचता है।

इंडिया टीवी में केवल आपकी अदालत ही देखते है कुछ लोग ऐसा क्यो ?

इन 17 सालों में बहुत कुछ बदला लेकिन रजत शर्मा नही बदले क्या कोई ऐसा समय भी आयेगा जब रजत शर्मा की जगह कोई और वकिल हो आपकी अदालत का । शो अच्छा है अपनी तरह का एक अलग शो है । कुछ लोग ऐसे है जो इंडिया टीवी में केवल आपकी अदालत ही देखते है । ऐसा क्यो है यह दुख की बात है ।