पत्रकारिता समाज का आइना है : मयंक सिंह
आज, पत्रकारिता की बात आती है तो पत्रकार के लेखन पर जोर दिया जाता है। पत्रकारिता भी इसी समाज का हिस्सा है जो समाज के तौर-तरीकों के लिए आइने का काम करता है। अच्छा हो या बुरा, पत्रकारिता समाज को सरल और आसान तरीकों में, उसे दिखाने की कोशिश करता है, और अपनी प्रस्तुति को बेहतर बनाने के लिए आधुनिक तकनीकों को अपना रहा है।
‘समय के साथ चलना है तो समय की नजाकत को समझना होगा’, 1990 के शुरूआती दौर तक भारत में दूरदर्शन का ही दबदबा रहा। लेकिन उदारीकरण और वैश्वीकरण के बाद से प्रसार भारती के अलावा, अन्य प्रसारको ने भारतीय संस्कृति और राजनीति पर गहरा असर छोड़ा है। इसके नुकसान भी हुए और फ़ायदे भी। नुकसान यह कि ज़्यादातर प्रसारक ऐसे हैं जिनके चैनल में विदेशी निवेश ज़्यादा है। जिस कारण इन चैनलों पर पाश्चात्य संस्कृति का असर रहता है। अब पाश्चात्य संस्कृति से कहने का मतलब है, विकसित देश। जैसा कि भारत एक विकासशील देश है जो कि विकसित बनने की होड़ में है, इस कारण भारत को कई बार ऐसी बातों को स्वीकार करना पड़ता है जो शायद उसकी संस्कृति और संप्रभुता के लिए ठीक न हो। फायदे को देखने के लिए हम हाल ही के मिसाल को लेते हैं, राष्ट्रमंडल खेलों में अंधाधुंध हुए घोटालों की जाँच के लिए मीडिया ने ही ज़्ाोर दिया अगर केवल दूरदर्शन होता तो शायद हम घोटाले के छोटे रुप से रुबरू होते और इससे जुड़ी हुई सारी घटनाएं भी सामने न आ पाती। अब एक चैनल अपनी क्षमता से अधिक कितनी खोजी पत्रकारिता करेगा।
आधुनिक संदर्भ में एक बात और ध्यान में आती है, जिसे हम ‘बजार' कहते हैं। कुछ विकास जैसे तकनीकी विकास, सांस्कृतिक विकास, आदि, प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से बाजार के माँग-पूर्ति पर निर्भर करते हैं। आज अगर इलेक्ट्रांनिक मशीन के रुप में सबसे ज़्यादा कम्प्यूटर और लैपटॉप का इस्तेमाल हो रहा है तो इसके पीछे बाज़ार में हो रही माँग-पूर्ति एक अहम कारण है। कल अगर ‘नैनो टैक्नोलॉजी’ बाजार की पहली माँग होगी तो शायद बडे़-बडे़ पत्रकारिता के केन्द्रों पर भी इसी तकनीक का इस्तेमाल होगा।
आधुनिक संदर्भ काफ़ी हद तक ‘मनोरंजन’ से भी जुड़ा है। आज से तीन से चार दशक पहले ‘पेज-3’ का मतलब केवल पृष्ठ संख्या तीन ही हुआ करता था। लेकिन जैसे-जैसे मनोरंजन की परिभाषा का विस्तार होता गया, नई-नई शब्दावली से भी परिचय होना शुरू हो गया । यहाँ तक कि पेज-3 नाम से फिल्म भी बन गई, जिसमें समाज के एक ऐसे तबके को दिखाया गया है, जिसके कई चेहरे हैं और वह परिस्थितियों के हिसाब से चेहरे बदलता रहता है और फ़िल्म में पत्रकारिता के संदर्भ में एक चेहरा ‘पीत पत्रकारिता’ का भी है।
आधुनिक संदर्भ से एक बात और ध्यान में आती है, ‘प्रतिस्पर्धा’। अगर आप इस प्रतिस्पर्धा के दौर में आगे रहना चाहते हैं तो आधुनिकता के मापदण्ड पर भी खरे उतरना होगा। अगर आपको इंजिनियरिंग की पढ़ाई करनी है तो भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आई.आई.टी.) से करें, डाॅक्टरी पढ़नी है तो एम्स से पढ़ें और मैनेजमेंट पढ़ना है तो आई.आई.एम. से पढ़ें और पत्रकारिता पढ़नी है तो आई.आई.एम.सी. से पढे़ं। आधुनिक संदर्भ में ‘शिक्षा’ भी एक अहम विषय है। वैसे तो हर दिन एक नया संदर्भ आधुनिकता के विषय में जुड़ता रहेगा और पत्रकारिता अपने आइने को चमकाती रहेगी। लेकिन गंदगी की परत इस आइने पर हमेशा चढे़गी, इसलिए इसे एक बार नहीं, बार-बार साफ़ करते रहना होगा।
यह लेख हमारी प्रतियोगिता4मीडिया में भाग लेने कि लिए आईआईएमसी के मयंक सिंह ने भेजा है।
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टिप्पणी
true indeed....well written
true indeed....well written and thought provoking.journalism should instead of catering to masses should also try and give them direction.